श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
तेरहवाँ अध्याय ८०३ ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ § § महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ (४) ब्रह्मसूत्रके पदोंसेभी, यह विषय गाया गया है, कि जिन्हें बहुत प्रकारसे, विविध छंदोंमें, पृथक् पृथक् ( अनेक ) ऋषियोंने ( कार्यकारणरूप ) हेतु दिखला कर पूर्ण निश्चित किया है। । [ गीतारहस्यके परिशिष्ट प्रकरणमें ( गीतार. पृ. ५३३-५३८ ) हमने । विस्तारपूर्वक दिखलाया है, कि इस श्लोकमें ब्रह्मसूत्र शब्दसे वर्तमानवेदान्त । सूत्र उद्दिष्ट हैं। उपनिषद् किसी एकही ऋषिका कोई एक ग्रंथ नहीं है, । अनेक ऋषियोंको भिन्न भिन्न काल या स्थानमें जिन अध्यात्म-विचारोंका स्फुरण । हो आया, वे विचार बिना किसी पारस्परिक संबंधके भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें । वर्णित हैं, इसलिये उपनिषद् संकीर्ण हो गये हैं, और कई स्थानोंपर वे परस्पर- । विरुद्धसे जान पडते हैं। ऊपरके श्लोकके पहले चरणमें जो 'विविध' और 'पृथक्' । शब्द हैं, वे उपनिषदोंके इस संकीर्ण स्वरूपकाही बोध कराते हैं। इस प्रकार । इन उपनिषदोंके संकीर्ण और परस्परविरुद्ध होनेके कारण, आचार्य बादरायणने । उनके सिद्धान्तोंकी एकवाक्यता करनेके लिये ब्रह्म-सूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंकी रच- । नाकी है, और उस सूत्रोंमें उपनिषदोंके सब विषयोंको लेकर प्रमाणसहित अर्थात् । कार्यकारण आदि हेतु दिखलाकरके, पूर्ण रीतिसे सिद्ध किया है, कि प्रत्येक । विषयके संबंधमें सब उपनिषदोंसे एकही सिद्धान्त कैसे निकाला जाता है; फलतः । अर्थात् उपनिषदोंका रहस्य समझनेके लिये वेदान्त-सूत्रोंकी सदैव ज़रूरत पडती । है, अतः इस श्लोकमें दोनोंकाभी उल्लेख किया गया है। ब्रह्मसूत्रके दूसरे । अध्यायके तीसरे पादके पहले १६ सूत्रोंमें क्षेत्रका विचार और फिर उस पादके । अंततक क्षेत्रज्ञका विचार किया गया है। ब्रह्मसूत्रोंमें यह विचार है, इसलिये । उन्हें 'शारीरक सूत्र' अर्थात् शरीर या क्षेत्रका विचार करनेवाले सूत्रभी कहते । हैं। यह बतला चुके, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार किसने और कहां किया है; । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र क्या है :-] ( ५ ) ( पृथिवी आदि पाँच स्थूल ) महाभूत, अहंकार, बुद्धि ( महान् ), अव्यक्त ( प्रकृति ), दश ( सूक्ष्म ) इंद्रियाँ और एक ( मन ); तथा ( पाँच ) इंद्रियोंके पाँच ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - ये सूक्ष्म ) विषय, ( ६ ) इच्छा,
८०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥ द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना अर्थात् प्राण आदिका व्यक्त व्यापार और धृति याने धैर्य, इस (३१ तत्त्वोंके) समुदायको सविकार क्षेत्र कहते हैं। | [ यह क्षेत्र और उसके विकारोंका लक्षण है। पाँचवे श्लोकमें सांख्य-मत- | वालोंके पच्चीस तत्त्वोंमेंसे पुरुषको छोड़ शेष चौबीस तत्त्व आ गये हैं। इन्ही | चौबीस तत्त्वोंमें मनका समावेश होनेके कारण इच्छा, द्वेष आदि मनोधर्मोंको | अलग बतलानेकी जरूरत न थी। परंतु कणाद-मतानुयायियोंके मतसे ये धर्म | आत्माके हैं और इस मतको मान लेनेमे शंका होती है, कि, इन गुणोंका क्षेत्रमेंही | समावेश होता है या नहीं ? अतः क्षेत्र शब्दको व्याख्याको निःसंदिग्ध करनेके | लिये यहाँ स्पष्ट रीतिसे क्षेत्रमेंही इच्छा-द्वेष आदि द्वंद्वोंका समावेश कर लिया | है, और उसीमें भय-अभय आदि अन्य द्वंद्वोंकाभी लक्षणासे समावेश हो जाता | है। यह दिखलानेके लिये, कि सबका संघात अर्थात् समूह क्षेत्रसे स्वतंत्र कर्ता | नहीं है, उसकी गणना क्षेत्रमेंही की गई है। कई बार 'चेतना' शब्दकाही 'चैतन्य' | अर्थ होता है। परंतु यहाँ चेतनासे “जड़ देहमें प्राण आदिके दीख पड़नेवाले | व्यापार, अथवा जीवितावस्थाकी चेष्टाएँ इतनाही अर्थ विवक्षित है; और ऊपर | दूसरे श्लोकमें कहा है, कि जड़ वस्तुमें यह चेतना जिससे उत्पन्न होती है, वह | चिच्छक्ति अथवा चैतन्य, क्षेत्रज्ञ-रूपसे, क्षेत्रसे अलग रहता है। 'धृति' शब्दकी | व्याख्या आगे गीतामेंही (१८. ३३) की है, उसे देखो। छठे श्लोकके 'समासेन' | पदका अर्थ “इन सबका समुदाय” है। अधिक विवरण गीतारहस्यके आठवें | प्रकरणके अंतमें (पृ. १४४, १४५) मिलेगा। पहले 'क्षेत्रज्ञ'के माने 'परमेश्वर' | बतलाकर फिर स्पष्ट किया है, कि 'क्षेत्र' क्या है ? अब मनुष्यके स्वभावपर | ज्ञानके जो परिणाम होते हैं, उनका वर्णन करके यह बतलाते हैं, कि ज्ञान किसको | कहते हैं; और आगे ज्ञेयका स्वरूप बतलाया है। ये दोनों विषय दीखनेमें भिन्न | दीख पड़ते हैं अवश्य; पर वास्तविक रीतिसे वे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारकेही दो भाग | हैं। क्योंकि, प्रारंभमेंही बतला चुके हैं, कि क्षेत्रज्ञका अर्थ परमेश्वर है। अतएव | क्षेत्रज्ञका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है, और उसीका स्वरूप अगले श्लोकोंमें | वर्णित है - बीचमेंही कोई मनमाना विषय नहीं धर घुसेड़ा है।] (७) मानहीनता, दंभहीनता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, पवित्रता, स्थिरता, मनोनिग्रह, (८) इंद्रियोंके विषयोंमे वैराग्य, अहंकारहीनता, और
तेरहवाँ अध्याय ८०५ असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥ जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, व्याधि एवं दुःखोंको ( अपने पीछे लगे हुए ) दोष समझना; (९) कर्ममें अनासक्ति, बाल-बच्चों और घर-गृहस्ती आदिमें लंपट न होना, इष्ट या अनिष्टकी प्राप्ति हो, चित्तकी सर्वदा एकहीसी वृत्ति रखना, (१०) और मुझमें अनन्य भावसे अटल भक्ति, 'विविक्त' अर्थात् चुने हुए अथवा एकान्त स्थानमें रहना, साधारण लोगोंके जमावको पसंद न करना, (११) अध्यात्म- ज्ञानको नित्य समझना, और तत्त्वज्ञानके सिद्धान्तोंका परिशीलन – इनको ज्ञान कहते हैं; इसके व्यतिरिक्त जो कुछ है, वह सब अज्ञान है। । [ सांख्योंके मतमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञका ज्ञानही प्रकृति-पुरुषके विवेकका ज्ञान है, । और उसे इसी अध्यायमें आगे बतलाया है (गीता १३.१९-२३; १४.१९)। । इसी प्रकार अठारहवें अध्यायमें (गीता १८.२०) ज्ञानके स्वरूपका यह । व्यापक लक्षण बतलाया है–"अविभक्तं विभक्तेषु"। परंतु मोक्षशास्त्रम । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानका अर्थ केवल बुद्धिसे यही जान लेना विवक्षित नही होता, । कि अमुक अमुक बातें अमुक प्रकारकी हैं। अध्यात्म शास्त्रका सिद्धान्त यह है, । कि उस ज्ञानकाका देहके स्वभावपर साम्य-बुद्धिरूप परिणाम होना चाहिये, । अन्यथा वह ज्ञान अपूर्ण या कच्चा है। अतएव यह बतलाकर, कि बुद्धिसे । अमुक अमुक जान लेनाही ज्ञान है, ऊपरके पाँच श्लोकोंमें ज्ञानकी व्याख्या इस । प्रकार की गई है, कि जब उक्त श्लोकोंमें बतलाये हुए मान और दंभका छूट । जाना, अहिंसा, अनासक्ति, समबुद्धि इत्यादि बीस गुण मनुष्यके स्वभावमें दीख । पड़ने लगें, तब उसे ज्ञान कहना चाहिये, (गीतार. प्र. ९, पृ. २४९, २५०) । दसवें श्लोकमें "विविक्त-स्थानमें रहना और जमावको नापसंद करना" भी । ज्ञानका एक लक्षण कहा है, उससे कुछ लोगोंने यह दिखानेका प्रयत्न किया है, । कि गीताको संन्यास-मार्गही अभीष्ट है। किंतु हम पहलेही बतला चुके हैं । (गीता १२. १९ की टिप्पणी; गीतार. प्र. १०, पृ. २८५), कि यह मत ठीक । नहीं है, और ऐसा अर्थ करना उचितभी नहीं है। यहाँ इतनाही विचार किया । है, कि ज्ञान क्या है; और इस विषयमें कोई वादभी नहीं है, वह ज्ञान बाल- । बच्चोंमें, घरगृहस्तीमें अथवा लोगोंके जमावमें अनासक्ति है। अब अगला प्रश्न
८०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥ बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥ | यह है, कि इस ज्ञानके हो जानेपर इसी अनासक्त-बुद्धिसे बालबच्चोंमें अथवा | गृहस्तीमें रहकर प्राणिमात्रके हितार्थ जगत्के व्यवहार किये जायें अथवा न | किये जायें; और केवल ज्ञानकी व्याख्यासेही इसका निर्णय करना उचित नहीं | है। क्योंकि भगवानने गीतामें अनेक स्थलोंपर कहा है, कि ज्ञानी पुरुष कर्मोंमें | लिप्त न होकर, उन्हें अनासक्त-बुद्धिसे लोकसंग्रहके निमित्त करता रहे और | इसकी सिद्धिके लिये जनकके बर्तावका और अपने व्यवहारका उदाहरणभी | दिया है ( गीता ३. १९-२५; ४. १४) । समर्थ श्रीरामदास स्वामीके चरितसे | यह बात प्रकट होती है, कि शहरमें रहनेकी लालसा न रहनेपरभी जगत्के | व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर कैसे किये जा सकते हैं? ( दासबोध | १९. ६. २९; १९. ९. ११) । यह ज्ञानका लक्षण हुआ; अब ज्ञेयका स्वरूप | बतलाते हैं:- ] ( १२ ) ( अब तुझे ) वह बतलाता हूँ, ( कि ), जिसे जान लेनेसे 'अमृत' अर्थात् मोक्ष मिलता है। ( वह ) अनादि ( सबसे ) परेका ब्रह्म ( है )। न उसे 'सत्' कहते हैं, और न 'असत्'भी । ( १३ ) उसके, सब ओर हाथ-पैर हैं, सब ओर आँखें, सिर और मुंह हैं, सब ओर कान हैं; और वही इस लोकमें सबको व्याप रहा है। ( १४ ) ( उसमें ) सब इंद्रियोंके गुणोंका आभास है, पर उसके कोईभी इंद्रिय नहीं है; वह ( सबसे ) असक्त अर्थात् अलग होकरभी सबका पालन करता है; और निर्गुण होनेपरभी गुणोंका उपभोग करता है। ( १५ ) ( वह ) सब भूतोंके भीतर और बाहरभी है; अचर है और चरभी है; सूक्ष्म होनेके कारण वह अविज्ञेय है; और दूर होकरभी समीप है। ( १६ ) वह ( तत्त्वतः ) 'अविभक्त' अर्थात् अखंडित ( होकरभी ) सब भूतोंमें मानो ( नानात्वसे ) विभक्त हो रहा है;
तेरहवाँ अध्याय ८०७ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥ १७ ॥ और (सब) भूतोंका पालन करनेवाला, ग्रसनेवाला एवं उत्पन्न करनेवालाभी उसेही समझना चाहिये। (१७) उसेही तेजकाभी तेज, और अंधकारसे परेका कहते हैं, ज्ञान, जो जानने योग्य है, वह (ज्ञेय), और ज्ञानगम्य अर्थात् ज्ञानसे (ही) विदित होनेवालाभी (वही) है, और सबके हृदयमें वही अधिष्ठित है। | [ अचिंत्य और अक्षर परब्रह्म जिसे कि क्षेत्रज्ञ अथवा परमात्माभी कहते | हैं, (गीता १३. २२), का जो वर्णन ऊपर है, वह आठवें अध्यायवाले अक्षर- | ब्रह्मके वर्णनके समान (गीता ८. ९-११) उपनिषदोंके आधारपर किया गया | है। पूरा तेरहवाँ श्लोक (श्वे. ३. १६) और अगले श्लोकका यह अर्धांश कि | “सब इंद्रियोंके गुणोंका भास होनेवाला, तथापि सब इंद्रियोंसे विरहित” | श्वेताश्वतर उपनिषदमें (श्वे. ३. १७) ज्यों-का-त्यों है; एवं “दूर होनेपरभी | समीप” ये शब्द ईशावास्य (५) और मुंडक (मुं. ३. १. ७) उपनिषदोंमें | पाये जाते हैं। ऐसेही ‘तेजका तेज’ ये शब्द बृहदारण्यकके (बृ. ४. ४. १६) | हैं; और ‘अंधकारसे परेका’ ये शब्द श्वेताश्वतरके (३. ८) हैं। इसी | भाँति यह वर्णन कि “जो सत्भी नहीं है और असत्भी नहीं कहा जा | सकता है।” ऋग्वेदके “नासदासीन्नो सदासीत्” इस ब्रह्मविषयक प्रसिद्ध | सूक्तको (ऋ. १०. १२९) लक्ष्य कर किया गया है। ‘सत्’ और ‘असत्’ | शब्दोंके अर्थोंका विचार गीतारहस्य प्र. ९, पृ. २४५-२४६ में विस्तारसहित | किया गया है; और फिर गीताके ९. १९वें श्लोककी टिप्पणीमेंभी किया है। | गीता ९. १९ में कहा है, कि ‘सत्’ और ‘असत्’ मैंही हूँ, अतः अब यह वर्णन | विरुद्ध-सा जंचता है, कि सच्चा ब्रह्म न ‘सत्’ है और न ‘असत्भी’। परंतु | वास्तवमें यह विरोध सच्चा नहीं है। क्योंकि ‘व्यक्त’ (क्षर) सृष्टि और | ‘अव्यक्त’ (अक्षर) सृष्टि, ये दोनों यद्यपि परमेश्वरकेही स्वरूप हों, तथापि यह | सिद्धान्त गीतामेंही पहले “भूतभृन्न च भूतस्थो” (गीता ९. ५) श्लोकमें और | आगे फिर (१५. १६, १७) पुरुषोत्तम-लक्षणमेंभी स्पष्टतया बतलाया गया है। | सच्चा परमेश्वर-तत्त्व इन दोनोंसे परे अर्थात् पूर्णतया अज्ञेय है। निर्गुण ब्रह्म | किसे कहते हैं, और जगत्में रहकरभी वह जगतमे बाहर कैसे है, अथवा वह | ‘विभक्त’ अर्थात् नानारूपात्मक दीख पड़े, तोभी मूलमें ‘अविभक्त’ अर्थात् एक-ही | कैसे हैं, इत्यादि प्रश्नोंका विचार गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २०९ से आगे) | किया जा चुका है। सोलहवें श्लोकके ‘विभक्तमिव’का अनुवाद यह है-“मानो | विभक्त हुआ-सा-दीख पड़ता है।” यह ‘इव’ शब्द उपनिषदोंमें अनेक वार | इसी अर्थमें आया है, कि ‘जगत्का’ नानात्व भ्रांतिकारक है और एकत्वही
८०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥ § § प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥ | सत्य है। उदाहरणार्थ, “द्वैतमिव भवति”, “य इह नानेव पश्यति” इत्यादि | (बृ. २. ४. १४; ४. ४. १९; ४. ३. ७) । अतएव प्रकट है, कि गीतामें यह | अद्वैत सिद्धान्तही प्रतिपाद्य है, कि नाना-नामरूपात्मक माया भ्रष्ट है, और | उसमें अविभक्त रहनेवाला ब्रह्मही सत्य है। गीता १८. २० में फिर बतलाया | है, कि “अविभक्तं विभक्तेषु” अर्थात् नानात्वमें एकत्व देखना सात्त्विक ज्ञानका | लक्षण है। गीतारहस्यके अध्यात्म प्रकरणमें वर्णन है, कि यह सात्त्विक ज्ञानही | ब्रह्म है। गीतार. प्र. ९, पृ. २१५, २१६; (प्र. ६, पृ. १३२-१३३) । ] (१८) इस प्रकार संक्षेपसे बतला दिया, कि क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय किसे कहते हैं? मेरा भक्त इसे जानकर मेरे स्वरूपको पाता है। | [अध्यात्म या वेदान्तशास्त्रके आधारसे अब तक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका | विचार किया गया। इनमेंसे 'ज्ञेय' ही क्षेत्रज्ञ अथवा परब्रह्म है और- 'ज्ञान', दूसरे | श्लोकमें बतलाया हुआ, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान है, इस कारण यही परमेश्वरके सब | ज्ञानका संक्षेपमें निरूपण है। १८ वें श्लोकमें यही सिद्धान्त बतला दिया है, कि | जब क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारही परमेश्वरका ज्ञान है, तब आगे यह आपही सिद्ध है, | कि उसका फलभी मोक्षही होना चाहिये। वेदान्तशास्त्रका क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार यहाँ | समाप्त हो गया। परंतु प्रकृतिसेही पाचभौतिक विकारवान् क्षेत्र उत्पन्न हुआ है, | इसलिये और सांख्य जिसे 'पुरुष' कहते हैं, उसेही अध्यात्मशास्त्रमें 'आत्मा' कहते | हैं, इसलिये; सांख्यकी दृष्टिसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारही प्रकृति-पुरुषका विवेक होता | है। गीताशास्त्र प्रकृति और पुरुषको सांख्यके समान दो स्वतंत्र तत्त्व नहीं मानता; | और सातवें अध्यायमें (गीता ७. ४, ५) कहा है, कि ये एकही परमेश्वरके, | कनिष्ठ और श्रेष्ठ, दो रूप हैं। परंतु सांख्योंके द्वैतके बदले गीताशास्त्रके इस | द्वैतको एकबार स्वीकारकर लेनेपर, फिर प्रकृति और पुरुषके परस्परसंबंधका | सांख्योंका ज्ञान गीताको अमान्य नहीं है। और यहभी कह सकते हैं, कि | क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानकाही रूपांतर प्रकृति-पुरुषका विवेक है (गीतार. प्र. ७) | इसीलिये अबतक उपनिषदोंके आधारसे जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञान बतलाया, | उसेही अब सांख्योंकी परिभाषामें किंतु सांख्योंके द्वैतको अस्वीकार करके प्रकृति- | पुरुष-विवेकके रूपसे बतलाते हैं:- (१९) प्रकृति और पुरुष, दोनोंकोही अनादि समझ। विकार और गुणोंको | प्रकृतिसेही उपजा हुआ जान।
तेरहवाँ अध्याय ८०९ कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥ | [ सांख्यशास्त्रके मतमें प्रकृति और पुरुष, दोनों न केवल अनादिही हैं, | प्रत्युत स्वतंत्र और स्वयंभूभी हैं। वेदान्ती समझते हैं, कि प्रकृति परमेश्वरसेही | उत्पन्न हुई है, अतएव वह न स्वयंभू है, और न स्वतंत्रभी है (गीता ४. ५. ६) । | परंतु यह नहीं बतलाया जा सकता, कि परमेश्वरसे प्रकृति कब उत्पन्न हुई | और पुरुष (जीव) परमेश्वरकाही अंश है। (गीता. १५. ७) ; इस कारण | वेदान्तियोंको इतना मान्य है, कि दोनों अनादि हैं। इस विषयका अधिक | विवेचन गीतारहस्यके ७ वें प्रकरणमें और विशेषतः पृ. १६२-१६८ में, एवं १० | वें प्रकरणके पृ. २६४-२६९ में किया है । ] (२०) कार्य अर्थात् देहके और करण अर्थात् इंद्रियोंके कर्तृत्वके लिये प्रकृति कारण कही जाती है; और. (कर्ता न होनेपरभी) सुखदुःखोंको भोगनेके लिये पुरुष (क्षेत्रज्ञ) कारण कहा जाता है । | [ इस श्लोकमें 'कार्यकरण'के स्थानमें 'कार्यकारण'भी पाठ है; और तब | उसका यह अर्थ होता है : - सांख्योंके महत् आदि तेईस तत्त्व एकसे दूसरा, दूसरेसे | तीसरा, इस कार्यकारण-क्रमसे उपजकर सारी व्यक्त-सृष्टि प्रकृतिसे बनती | है। यह अर्थभी बेजा नहीं है; परंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारमें क्षेत्रकी उत्पत्ति बतलाना | प्रसंगानुसार नहीं है। प्रकृतिसे जगत्के उत्पन्न होनेका वर्णन तो पहलेही | सातवें और नवें अध्यायमें हो चुका है। अतएव 'कार्यकरण' पाठही यहाँ अधिक | प्रशस्त दीख पड़ता है। शांकरभाष्यमें यही 'कार्यकरण' पाठ है।] (२१) क्योंकि पुरुष प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है; और '(प्रकृतिके) गुणोंको यह संयोग पुरुषको भली-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेके लिये कारण होता है। | [ प्रकृति और पुरुषके पारस्परिक संबंधका और भेदका यह वर्णन | सांख्यशास्त्रका है, (गीतार. प्र. ७, पृ. १५५-१६२) । अब यह कहकर कि | वेदान्ती लोग पुरुषको परमात्मा कहते हैं, सांख्य और वेदान्तका मेल कर दिया | गया है; और ऐसा करनेसे प्रकृति-पुरुष-विचार एवं क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारकी पूरी | एकवाक्यता हो जाती है।]
८१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ § § ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥ (२२) (प्रकृतिके गुणोंके इस) उपद्रष्टा अर्थात् समीप बैठकर देखनेवाले, अनुमोदन करनेवाले, भर्ता अर्थात् (प्रकृतिके गुणोंको) बढ़ानेवाले, और उपयोग करनेवालेकोही इस देहका परपुरुष, महेश्वर और परमात्मा कहते हैं। (२३) इस प्रकार पुरुष (निर्गुण) और प्रकृतिको (ही) जो गुणोंसमेत जानता है, वह कैसाभी बर्ताव क्यों न किया करे, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। | [ २२ वें श्लोकमें जब यह निश्चय हो चुका, कि पुरुषही देहका परमात्मा | है, तब सांख्यशास्त्रके अनुसार पुरुषका जो उदासीनत्व और अकर्तृत्व है, वही | अब आत्माका अकर्तृत्व हो जाता है और इस प्रकार सांख्योंकी उपपत्तिसे वेदान्त- | की एकवाक्यता हो जाती है। वेदान्तवाले कुछ ग्रंथकारोंकी समझ है, कि सांख्य- | वादी वेदान्तके शत्रु हैं, अतः बहुतेरे वेदान्ती सांख्य-उपपत्तिको सर्वथा त्याज्य | मानते हैं। किंतु गीतामें ऐसा न करके क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारका एक-ही विषय | एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे, और दूसरी बार (वेदान्तके अद्वैत मतको बिना | छोड़े) सांख्य-दृष्टिसे, प्रतिपादन किया है, इससे गीताशास्त्रकी सम-बुद्धि प्रकट | हो जाती है। यहभी कह सकते हैं, कि उपनिषदोंके और गीताके विवेचनमें | यह एक महत्त्वका भेद है (गीतार. परिशिष्ट, पृ. ५२८)। इससे प्रकट होता है, | कि यद्यपि गीताको सांख्योंका द्वैतवाद मान्य नहीं है, तथापि उनके प्रतिपादनमें | जो कुछ युक्तिसंगत जान पड़ता है, वह गीताको अमान्य नहीं है। दूसरेही | श्लोकमें कह दिया है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है। अब | पिंडका ज्ञान और देहके परमेश्वरका ज्ञान संपादनकर मोक्ष प्राप्त करनेके मार्ग | प्रसंगके अनुसार संक्षेपसे बतलाते हैं :- ] (२४) कुछ लोग ध्यानसे स्वयंही अपने आपमें आत्माको देखते हैं; (कोई सांख्ययोगसे देखते हैं और कोई कर्मयोगसे (२५) परंतु इस प्रकार जिन्हें (अपने
तेरहवाँ अध्याय ८११ § § यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥ समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥ आपही ) ज्ञान नहीं होता, वे दूसरेसे सुनकर ( श्रद्धासे ) परमेश्वरका भजन करते हैं। सुनी हुई बातको प्रमाण मान बर्तनेवाले ये पुरुषभी मृत्युको पारकर जाते हैं। | [ इन दो श्लोकोंमें पातंजलयोगके अनुसार ध्यान, सांख्य-मार्गके अनुसार | ज्ञानोत्तर कर्मसंन्यास, कर्मयोग-मार्गके अनुसार निष्काम बुद्धि परमेश्वरार्पण- | पूर्वक कर्म करना और ज्ञान न हो, तोभी श्रद्धासे आप्तोंके वचनोंका विश्वास- | कर परमेश्वरकी भक्ति करना ( गीता ४. ३९ ), ये आत्मज्ञानके भिन्न भिन्न | मार्ग बतलाये गये हैं। कोई किसीभी मार्गसे जावे, अंतमें उसे भगवानका ज्ञान | होकर मोक्ष मिलही जाता है। तथापि पहले जो यह सिद्धान्त किया गया है, | कि लोकसंग्रहकी दृष्टिसे कर्मयोग श्रेष्ठ है, वह इससे खंडित नहीं होता । इस | प्रकार साधन बतलाकर अगले श्लोकमें समग्र विषयका सामान्य रीतिसे उपसंहार | किया है; और उसमेंभी वेदान्तसे कापिल-सांख्यका मेल मिला दिया है। ] (२६) हे भरतश्रेष्ठ ! स्मरण रख, कि स्थावर या जंगम, किसीभी वस्तुका निर्माण क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे होता है। (२७) सब भूतोंमें एक-सा रहनेवाला, और सब भूतोंका नाश हो जानेपरभी जिसका नाश नहीं होता, ऐसे परमेश्वरको जिसने देख लिया, कहना होगा, कि उसीने ( सच्चे तत्त्वको) पहचाना। (२८) ईश्वरको सर्वत्र एक-सा व्याप्त समझकर ( जो पुरुष ) अपने आपकाही घात नहीं करता, अर्थात् अपने आप अच्छे मार्गमें लग जाता है, उस कारणसे वह उत्तम गतिही पाता है। | [ २७ वें श्लोकमें परमेश्वरका जो लक्षण बतलाया है, वह पीछे गीताके | ८. २० वें श्लोकमें आ चुका है, और उसका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके नवें | प्रकरणमें किया गया है, ( गीतार. प्र. ९, पृ. २१९, २५७ ) । ऐसेही २८ वें | श्लोकमें फिर वही बात कही है, जो पीछे ( गीता ६. ५-७ ) कही जा चुकी | है, कि आत्मा अपना बंधु है, और वही अपना शत्रु है। इस प्रकार २६, २७ | और २८ वें श्लोकोंमें सब प्राणियोंके विषयमें साम्य-बुद्धिरूप भावका वर्णन कर | चुकनेपर बतलाते हैं, कि इसके जान लेनेसे क्या होता है :- ]
८१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्त्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥ § § अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ § § क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ (२९) जिसने यह जान लिया, कि (सब) कर्म सब प्रकारसे केवल प्रकृति- सेही किये जाते हैं, और आत्मा अकर्ता है, अर्थात् कुछभी नहीं करता, कहना चाहिये कि उसने (सच्चे तत्त्वको) पहचान लिया । (३०) जब सब भूतोंका पृथक्त्व अर्थात् नानात्व एकतासे (दीखने लगे), और इस (एकता) सेही (सब) विस्तार दीखने लगे, तब ब्रह्म प्राप्त होता है। । [ अब बतलाते हैं, कि आत्मा निर्गुण, अलिप्त और अक्रिय कैसे है :- ] (३१) हे कौंतेय ! अनादि और निर्गुण होनेके कारण यह अव्यक्त परमात्मा शरीरमें रह करभी कुछ करता-धरता नहीं है, और उसे (किसीभी कर्मका) लेप अर्थात् बंधन नहीं लगता । (३२) जैसे आकाश चारों ओर भरा हुआ है, परंतु सूक्ष्म होनेके कारण उसे (किसीकाभी) लेप नहीं लगता, वैसेही देहमें सर्वत्र रहने- परभी आत्माको (किसीकाभी) लेप नहीं लगता । (३३) हे भारत ! जैसे अकेला सूर्य इस सारे जगतको प्रकाशित करता है, वैसेही क्षेत्रज्ञ सब क्षेत्रको अर्थात् शरीरको प्रकाशित करता है । (३४) इस प्रकार ज्ञान-चक्षुसे अर्थात् ज्ञानरूप नेत्रसे, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको, एवं सब भूतोंकी (मूल) प्रकृतिके मोक्षको, जो जानते हैं, वे परब्रह्मको पाते हैं।
तेरहवाँ अध्याय ८१३ [ यह पूरे प्रकरणका उपसंहार है। 'भूतप्रकृतिमोक्ष' शब्दका अर्थ हमने सांख्यशास्त्रके सिद्धान्तानुसार किया है। सांख्योंका सिद्धान्त यह है, कि मोक्षका मिलना या न मिलना आत्माकी अवस्थाएँ नहीं हैं, क्योंकि वह तो सदैव अकर्ता और असंग है। परंतु प्रकृतिके गुणोंके संगसे वह अपनेमें कर्तृत्वका आरोप किया करता है, इसलिये जब उसका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब उसके साथ लगी हुई प्रकृति छूट जाती है, अर्थात् उसीका मोक्ष हो जाता है, और इसके पश्चात् उसका पुरुषके आगे नाचना बंद हो जाता है। अतएव सांख्य-मतवाले प्रतिपादन किया करते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे बंध और मोक्ष, ये दोनों अवस्थाएँ प्रकृतिकीही हैं (सांख्यकारिका ६२; गीतारहस्य प्र. ७, पृ. १६५-१६६ ) हमें जान पड़ता है, कि सांख्यके ऊपर लिखे हुए सिद्धान्तके अनुसारही इस श्लोकमें 'प्रकृतिका मोक्ष' ये शब्द आये हैं। परंतु कुछ लोग इन शब्दोंका यह अर्थभी लगाते हैं, कि “भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षः" - पंचमहाभूतोंसे और प्रकृतिसे अर्थात् मायात्मक कर्मोंसे आत्माका मोक्ष होता है। नवें, ग्यारहवें और तेरहवें अध्यायके ज्ञान-विज्ञान निरूपण का भेद ध्यान देनेयोग्य है, कि यह क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विवेक ज्ञान-चक्षुसे विदित होनेवाला है (गीता १३. ३४)। तो नवें अध्यायकी राजविद्या प्रत्यक्ष अर्थात् चर्मचक्षुसे ज्ञात होनेवाली है (गीता ९. २), और विश्वरूप-दर्शन परम भगवद्भक्तकोभी केवल दिव्य-चक्षुसेही होनेवाला है (गीता ११. ८) । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, प्रकृति-पुरुष-विवेक अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
८१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चतुर्दशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ चौदहवाँ अध्याय [ तेहरवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे और दूसरी बार सांख्यकी दृष्टिसे बतलाया है, एवं उसीमें प्रतिपादन किया है, कि सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है, पुरुष अर्थात् क्षेत्रज्ञ उदासीन रहता है । परंतु इस बातका विवेचन अब तक नहीं हुआ, कि प्रकृतिका यह कर्तृत्व क्यों कर चला करता है ? अतएव इस अध्यायमें बतलाते हैं, कि एकही प्रकृतिसे विविध सृष्टि, विशेषतः सजीव सृष्टि, कैसे उत्पन्न होती है ? केवल मानवी सृष्टिकाही विचार करें, तो यह विषय क्षेत्रसंबंधी अर्थात् शरीरका होता है, इसलिये उसका समावेश क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें हो सकता है । परंतु जब स्थावर सृष्टिभी त्रिगुणात्मक प्रकृतिकाही फैलाव है, तब प्रकृतिके गुणभेदका यह विवेचन क्षर-अक्षर-विचारकाभी भाग हो सकता है । अत- एव 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार' इस संकुचित नामको छोड़कर सातवें अध्यायमें जिस ज्ञान- विज्ञानके बतलानेका आरंभ किया था, उसी ज्ञान-विज्ञानको अधिक स्पष्ट रीतिसे फिरभी बतलानेका आरंभ भगवानने अब इस अध्यायमें किया है । सांख्यशास्त्रकी दृष्टिसे इस विषयका विस्तृत निरूपण गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें किया गया है । त्रिगुणके विस्तारका यह वर्णन अनुगीता और मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमेंभी है । ] श्रीभगवानने कहा :- (१) और फिर सब ज्ञानोंसे उत्तम ज्ञान बतलाता हूँ, कि जिसको जानकर सब मुनि इस लोकसे परम सिद्धि पा गये हैं। (२) इस ज्ञानका आश्रय करके मुझसे एकरूपता पाये हुए लोग सृष्टिके उत्पत्ति-कालमेंभी नहीं जन्मते और प्रलय-कालमेंभी व्यथा नहीं पाते; ( अर्थात् जन्म-मरणसे एकदम छुटकारा पा जाते हैं । ) | [ यह हुई प्रस्तावना । अब पहले बतलाते हैं, कि प्रकृति मेराही स्वरूप | है; फिर सांख्योंके द्वैतको अलगकर, वेदान्तशास्त्रके अनुकूल यह निरूपण करते | हैं, कि प्रकृतिके सत्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे सृष्टिके नाना प्रकारके | व्यक्त पदार्थ किस प्रकार निर्मित होते हैं :- ]
चौदहवाँ अध्याय ८१५ § § मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ § § सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ (३) हे भारत ! महद्ब्रह्म अर्थात् प्रकृति मेरीही योनि है और मैं उसमें गर्भ रखता हूँ; फिर उससे समस्त भूत उत्पन्न होने लगते हैं। (४) हे कौंतेय । (पशुपक्षी आदि) सब योनियोंमें जो जो मूर्तियाँ जन्मती हैं, उनकी योनि महत् ब्रह्म है और मैं बीजदाता पिता हूँ । (५) हे महाबाहु ! प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्व, रज और तम गुण देहमें रहनेवाले अव्यय अर्थात् निर्विकार आत्माको देहमें बाँध लेते हैं। (६) हे निष्पाप अर्जुन ! इन गुणोंमेंसे निर्मलताके कारण प्रकाश डालनेवाला और निर्दोष सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके साथसे (प्राणीको) बाँधता है। (७) रजोगुणका स्वभाव रागात्मक है और उससे तृष्णा और आसक्तिकी उत्पत्ति होती है। हे कौंतेय ! वह प्राणीको कर्म करनेके (प्रवृत्तिरूप) संगसे बाँध डालता है। (८) किंतु तमोगुण अज्ञानसे उपजता है और वह सब प्राणियोंको मोहमें डालता है। हे भारत ! वह प्रमाद, आलस्य, और निद्रासे (प्राणी)को बाँध लेता है। (९) सत्त्वगुण सुखमें, और रजोगुण कर्ममें, आसक्ति उत्पन्न करता है। परंतु हे भारत! तमोगुण ज्ञानको ढँक- कर प्रमाद अर्थात् कर्तव्यमूढतामें, या कर्तव्यके विस्मरणमें, आसक्ति उत्पन्न करता है। | [ सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणोंके ये पृथक् लक्षण बतलाये गये | हैं। किंतु ये गुण कभीभी पृथक् पृथक् नहीं रहते, तीनों सदैव एकत्र रहा करते हैं।
८१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र §§ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ §§ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ | उदाहरणार्थ, कोईभी भला काम करना यद्यपि सत्त्वका लक्षण है, तथापि भले | कामको करनेकी प्रवृत्ति होना रजका धर्म है, इस कारण सात्त्विक स्वभावमेंभी | थोड़े-से रजका मिश्रण सदैव रहताही है। इसीसे अनुगीतामें इन गुणोंका इस | प्रकार मिथुनात्मक वर्णन है, कि तमका मिथुन अर्थात् जोड़ा सत्त्व है, और | सत्त्वका जोड़ा रज है (मभा. अश्व. ३६), और कहा है, कि इनके अन्योन्य | अर्थात् पारस्परिक आश्रयसे अथवा झगड़ेसे सृष्टिके सब पदार्थ बनते हैं (सां.का. | १२; गीतार. प्र. ७, पृ. १५८, १५९)। अब पहले इसी तत्त्वको बतलाकर | फिर सात्त्विक, राजस और तामस स्वभावके लक्षण बतलाते हैं :- ] (१०) रज और तमको दबाकर सत्त्व (बलवान्) हो जाता है, (तब उसे सात्त्विक कहना चाहिये); एवं इसी प्रकार सत्त्व और तमको दबाकर रज, तथा सत्त्व और रजको दबाकर तम (बलवान् हुआ करता है) (११) जब इस देहके सब द्वारोंमें (इंद्रियोंमें) प्रकाश अर्थात् निर्मल ज्ञान उत्पन्न होता, है, तब समझना चाहिये, कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है। (१२) हे भरतश्रेष्ठ ! रजोगुणके बढ़नेसे लोभ, कर्मकी प्रवृत्ति और उसका आरंभ अतृप्ति एवं इच्छा उत्पन्न होती हैं। (१३) और हे कुरुनंदन ! तमोगुणकी वृद्धि होनेपर अंधेरा, कुछभी न करनेकी प्रवृत्ति, प्रमाद, अर्थात् कर्तव्यकी विस्मृति और मोहभी उत्पन्न होता है। | [ यह बतला दिया, कि मनुष्यकी जीवितावस्थामें त्रिगुणोंके कारण | उसके स्वभावमें कौन कौन-से फ़र्क पड़ते हैं। अब बतलाते हैं, कि इन तीन | प्रकारके मनुष्योंको कौन-सी गति मिलती है :- ] (१४) सत्त्वगुणके उत्कर्ष-कालमें यदि प्राणी मर जावे, तो उत्तम तत्त्व जाननेवालोंके, अर्थात् देवता आदिके, निर्मल (स्वर्ग प्रभृति) लोक उसको प्राप्त
चौदहवाँ अध्याय ८१७ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ होते हैं। (१५) रजोगुणकी प्रबलतामें यदि मरे, तो जो कर्मोंमे आसक्त हों, उनमें (जनोंमें) जन्म लेता है; और तमोगुणमें मरे, तो (पशुपक्षी आदि) मूढ योनियोंमें उत्पन्न होता है। (१६) कहा है, कि पुण्य कर्मका फल निर्मल और सात्त्विक होता है, परंतु राजस कर्मका फल दुःख, और तामस कर्मका फल अज्ञान होता है। (१७) सत्त्वसे ज्ञान, तो रजोगुणसे केवल लोभ उत्पन्न होता है। तमोगुणसे न केवल प्रमाद और मोहही उपजता है, प्रत्युत अज्ञानकीभी उत्पत्ति होती है। (१८) सात्त्विक पुरुष ऊपरके अर्थात् स्वर्ग आदि लोकोंको जाते हैं। राजस मध्यम लोकमें अर्थात् मनुष्यलोकमें रहते हैं और कनिष्ठगुणवृत्तिके तामस अधोगति पाते हैं। | [ सांख्यकारिकामेंभी यह वर्णन है, कि धार्मिक और पुण्य कर्म-कर्ता होनेके | कारण सत्त्वस्थ मनुष्य स्वर्ग पाता है, और अधर्माचरण करके तामस पुरुष | अधोगति पाता है (सां. का. ४४) । इसी प्रकार यह १८ वाँ श्लोक अनुगीताके | त्रिगुण-वर्णनमेभी ज्यों-का-त्यों आया है (मभा. अश्व. ३९. १०; मनु. १२. ४०) | सात्त्विक कर्मोंसे स्वर्ग-प्राप्ति भले हो जावे, पर स्वर्गसुख है तो अनित्य ही। इस | कारण परम पुरुषार्थकी सिद्धि उससे नहीं होती है। सांख्योंका सिद्धान्त है, कि | इस परम पुरुषार्थ या मोक्षकी प्राप्तिके लिये उत्तम सात्त्विक स्थिति तो रहेही, | उसके सिवा यह ज्ञान होनाभी आवश्यक है, कि प्रकृति अलग है और मैं (पुरुष) | जुदा हूँ। सांख्य इसीको त्रिगुणातीत अवस्था कहते हैं; और यद्यपि यह स्थिति | सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंसेभी परेकी है, तोभी यह सात्त्विक अवस्था- | कीही पराकाष्ठा है, इस कारण इसका समावेश सामान्यतः सात्त्विक वर्गमेंही | किया जाता है, उसके लिये एक नया चौथा वर्ग बनानेकी आवश्यकता नहीं है | (गीतार. प्र. ७; पृ. १६८) । परंतु गीताको प्रकृति-पुरुषवाला सांख्योंका यह | द्वैत मान्य नहीं है, इसलिये सांख्योंके उक्त सिद्धान्तका गीतामें इस प्रकार रूपां- | तर हो जाता है, कि प्रकृति और पुरुषसे परे जो एक आत्मस्वरूपी परमेश्वर | या परब्रह्म है। यही अर्थ अब अगले श्लोकोंमें वर्णित हैः- ] गी. र. ५२
८१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥ गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच । § § कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥ उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥ (१९) द्रष्टा अर्थात् उदासीनतामे देखनेवाला पुरुष, जब जान लेता है, कि (प्रकृतिसे) गुणोंके अतिरिक्त दूसरा कोई कर्ता नहीं है, और जब (तीनों) गुणोंसे परेके (तत्त्वको) पहचान लेता है, तब वह मेरे स्वरूपमें मिल जाता है। (२०) देहधारी मनुष्य देहकी उत्पत्तिके कारण स्वरूप उन तीनों गुणों जाकर जन्म, मृत्यु और बुढ़ापेके दुःखोंसे विमुक्त होता हुआ अमृतका अर्थात् मोक्षका अनुभव करता है। । [ वेदान्तमें जिसे माया कहते हैं, उसीको सांख्य-मतवाले त्रिगुणात्मक प्रकृति कहते हैं, इसलिये त्रिगुणातीत होनाही मायासे छूट कर परब्रह्मको पहचान लेना है (गीतार. ७. १४) ; और इसीको ब्राह्मी अवस्था कहते हैं (गीता २. ७२ ; १८. ५३ ) : अध्यात्मशास्त्रमे बतलाये हुए त्रिगुणातीतके इस लक्षणको सुनकर उसका और अधिक वृत्तान्त जाननेकी अर्जुनको इच्छा हुई, और पीछे द्वितीय अध्याय में ( गीता २. ५४ ) जैसा उसने स्थितप्रज्ञके संबंधमें प्रश्न किया था, वैसाही यहाँभी वह पूछता है :- ] अर्जुनने कहा :- (२१) हे प्रभो ! किन लक्षणोंसे ( जाना जाय, कि वह) इन तीनों गुणोंके परे चला जाता है ? (मुझे बतलाइये, कि) उसका (त्रिगुणातीतका) आचार क्या है और वह इन तीन गुणोंके परे कैसे जाता है ? श्रीभगवानने कहा :- (२२) हे पाण्डव ! प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह ( अर्थात् क्रमसे सत्त्व, रज और तम, इन गुणोंके कार्य अथवा फल) प्राप्त होनेसेभी जो उनका द्वेष नहीं करता, और प्राप्त न हों, तोभी उनकी आकांक्षा नहीं रखता; (२३) जो ( कर्मफलके संबंधमे ) उदासीन-सा रहता है; (सत्त्व, रज और तम ये गुण जिसे
चौदहवाँ अध्याय ८१९ समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकांचनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥ §§ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ चलविचल नहीं कर सकते; तो इतनाही मान कर स्थिर रहता है, कि गुण (अपना अपना) काम करते हैं; जो डिगता नहीं है अर्थात् विकार नहीं पाता है; (२४) जिसे सुख-दुःख एक-सेही हैं; जो स्व-स्थ है अर्थात् अपनेमेंही स्थिर हुआ; मिट्टी, पत्थर और सोना जिसे समानही हैं; प्रिय-अप्रिय, निंदा और अपनी स्तुति जिसे समसमान हैं; जो सदा धैर्यसे युक्त है; (२५) जिसे मान-अपमान या मित्र और शत्रुदल तुल्य हैं अर्थात् एक-से हैं; और (इस समझसे कि प्रकृति सब कुछ करती है) जिसके सब (काम्य) उद्योग छूट गये हैं, उस पुरुषको गुणातीत कहते हैं। | [ यह इन दो प्रश्नोंका उत्तर हुआ, कि त्रिगुणातीत पुरुषके लक्षण क्या | हैं, और उसका आचार कैसा होता है ? ये लक्षण, और दूसरे अध्यायमें बतलाये | हुए स्थितप्रज्ञके लक्षण (२. ५५-७२), एवं बारहवें अध्यायमें (१२. १३-२०) | बतलाये हुए भक्तिमान् पुरुषके लक्षण, सब एक-सेही हैं। अधिक क्या कहें ? | 'सर्वारंभपरित्यागी', 'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' और 'उदासीनः' प्रभृति कुछ | विशेषणभी दोनों या तीनों स्थानोंमें एकही हैं। इससे प्रकट होता है, कि पिछले | अध्यायमें बतलाये हुए (गीता १३. २४, २५) चार मागोंमेंसे किसीभी मार्गके | स्वीकारकर लेनेपरभी सिद्धि-प्राप्त पुरुषका आचार और उसके लक्षण सब मार्गोंमें | एकहीसे रहते हैं। तथापि पीछे तीसरे, चौथे और पांचवे आदि अध्यायोंमें जो यह | दृढ़ और अटल सिद्धान्त किया है, कि निष्काम कर्म किसीकेभी नहीं छूट सकते; | उसके अबाधित होनेसे, स्मरण रखना चाहिये, कि ये स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त या | त्रिगुणातीत, सभी कर्म-योगमार्गके हैं। 'सर्वारम्भपरित्यागी' का अर्थ १२ वें अध्यायके | १६ वें श्लोककी टिप्पणीमें बतला चुके हैं। सिद्धावस्थामें पहुँचे हुए पुरुषोंके इन | वर्णनोंको स्वतंत्र मान कर संन्यास-मार्गके टीकाकार अपनेही संप्रदायको गीतामें प्रति- | पाद्य बतलाते हैं। परंतु गीतारहस्यके ११ वें और १२ वें प्रकरणमें (पृ. ३२६-३२७ | और ३७६-३७७) हमने इस बातका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन कर दिया है, कि | यह अर्थ पूर्वापर संदर्भके विरुद्ध है; अतएव ठीक नहीं है। अर्जुनके दोनों प्रश्नोंके | उत्तर हो चुके। अब बतलाते हैं, कि ये पुरुष इन तीन गुणोंमें परे कैसे जाते हैं:-] (२६) और जो (मुझेही सब कर्म अर्पण करनेके) अव्यभिचार, अर्थात्
८२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ एकनिष्ठ भक्तियोगसे, मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणोंसे परे जाकर ब्रह्मभूत अवस्था पा लेनेमें समर्थ हो जाता है । | [ संभव है, इस श्लोकसे यह शंका हो, कि जब त्रिगुणातीत अवस्था | सांख्य-मार्गकी है, तब वही अवस्था कर्म-प्रधान भक्तियोगसे कैसे प्राप्त हो जाती | है ? इसीसे भगवान् कहते हैं :— ] (२७) क्योंकि, अमृत और अव्यय ब्रह्मका, शाश्वत धर्मका, एवं एकान्तिक अर्थात् परमावधिके अत्यंत सुखका अंतिम स्थान मैं ही हूँ । | [ इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि सांख्योंके द्वैतको छोड़ देनेपर सर्वत्र | एकही परमेश्वर रह जाता है, इस कारण उसीकी भक्तिसे त्रिगुणातीत | अवस्थाभी प्राप्त होती है । तथापि एकही परमेश्वर मान लेनेमे साधनोंके | संबंधमे गीताका कोईभी आग्रह नहीं है ( गीता १३. २४, २५) । गीतामें | भक्तिमार्गको सुलभ अतएव सब लोगोंके लिये ग्राह्य कहा है; यह कहींभी | नहीं कहा है, कि अन्यान्य मार्ग त्याज्य हैं । गीतामें केवल भक्ति, केवल ज्ञान | अथवा केवल योगही प्रतिपाद्य है, — ये मत भिन्न-भिन्न संप्रदायोंके अभिमानियोंने | पीछेसे गीतापर लाद दिये हैं । गीताका सच्चा प्रतिपाद्य विषय तो निरालाही | है : मार्ग कोईभी हो, गीताका मुख्य प्रश्न यही है, कि परमेश्वरका ज्ञान हो | चुकनेपर संसारके कर्म लोकसंग्रहार्थ किये जावे या छोड़ दिये जावें ? और | इसका साफ़ साफ़ उत्तर पहलेही दिया जा चुका है, कि कर्मयोग श्रेष्ठ है । ] इस प्रकार भगवानने गाये हुए – अर्थात् कहे हुए – उपनिषद्में, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग – अर्थात् कर्मयोग – शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवां अध्याय समाप्त हुआ ।
पंद्रहवाँ अध्याय ८२१ पंचदशोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ पंद्रहवाँ अध्याय [ क्षेत्रक्षेत्रज्ञके विचारके सिलसिलेमें तेरहवें अध्यायमें उसी क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- विचारके सदृश सांख्योंके प्रकृति-पुरुषका विवेक बतलाया है, और चौदहवें अध्यायमें कहा है, कि प्रकृतिके तीन गुणोंसे मनुष्य-मनुष्यमें स्वभाव-भेद कैसे उत्पन्न होता है और उससे सात्त्विक आदि गति-भेद क्योंकर होते हैं? फिर यह विवेचन किया है, कि त्रिगुणातीत अवस्था या अध्यात्म-दृष्टिसे ब्राह्मी स्थिति किसे कहते हैं और वह कैसे प्राप्त की जाती है। यह सब निरूपण सांख्योंकी भाषामें है अवश्य परंतु सांख्योंके द्वैतको स्वीकार न करते हुए, जिस एकही परमेश्वरकी विभूतियां प्रकृति और पुरुष दोनों हैं, उस परमेश्वरका ज्ञान-विज्ञान-दृष्टिसे निरूपण किया गया है। परमेश्वरके स्वरूपके इस वर्णनके अतिरिक्त आठवें अध्यायमें अधियज्ञ, अध्यात्म और अधिदैवत आदि भेद दिखलाये जा चुके हैं। और, यह पहलेही कह चुके हैं, कि सब स्थानोंमें एकही परमात्मा व्याप्त है, एवं क्षेत्रमें क्षेत्रज्ञभी वही है। अब इस अध्यायमें पहले यह बतलाते हैं, कि परमेश्वरकीही रची हुई सृष्टिके विस्तारका, अथवा परमेश्वरके नामरूपात्मक विस्तारकाही, कभी कभी वृक्षरूपसे या वनरूपसे जो वर्णन पाया जाता है, उसका बीज क्या है; फिर परमेश्वरके सभी रूपोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तमस्वरूपका वर्णन किया है ।] श्रीभगवानने कहा: (१) जिस अश्वत्थ वृक्षका ऐसा वर्णन करते हैं, कि जड़ (एक) ऊपर है, और शाखाएँ (अनेक) नीचे हैं, (जो) अव्यय अर्थात् कभी नाश नहीं पाता, (एवं) छन्दांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते हैं, उसे (वृक्षको) जिसने जान लिया, वह पुरुष (सच्चा), वेदवेत्ता (है)। | [ उक्त वर्णन ब्रह्मवृक्षका अर्थात् संसारवृक्षका है। यहाँपर संसारका यह | संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है, कि "स्त्री-बाल-बच्चोंमें रहकर नित्य व्यवहार | करते रहें", परंतु उसका यहाँ "आँखोंके सामने दिखाई देनेवाला जगत् अथवा | दृश्य-सृष्टि" अर्थ है। इस संसारकोही सांख्य-मतवादी "प्रकृतिका विस्तार" | और वेदान्ती "भगवान्की मायाका पसार" कहते हैं; एवं अनुगीतामे इसेही | "ब्रह्मवृक्ष या ब्रह्मवन" (ब्रह्मारण्य) कहा है (मभा. अश्व. ३५. ४३)।
८४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
यह कल्पना अथवा रूपक न केवल वैदिक धर्ममेही है, कि प्रत्युत अन्य प्राचीन धर्मोंमेंभी पाया जाता है. एक बिलकुल छोटे-से बीजमे जिस प्रकार बड़ा भारी गगनचुंबी वृक्ष निर्माण हो जाता है, उसी प्रकार एक अव्यक्त परमेश्वरसे दृश्य-सृष्टिरूप भव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ है। यूरोपकी पुरानी भाषाओंमें इसके नाम 'विश्ववृक्ष' या 'जगद्वृक्ष' है। ऋग्वेदमे (१. २४. ७) वर्णन है, कि वरुण- लोकमें एक ऐसा वृक्ष है, कि जिसकी किरणोंकी जड़ ऊपर (ऊर्ध्व) है और उसकी किरणें ऊपरसे नीचे (निचीना) फैलती हैं। विष्णुसहस्रनाममें 'वारुणो वृक्षः' (वरुणके वृक्ष) को परमेश्वरके हज़ार नामोंमेंसे एकही नाम कहा है। यम और पितर जिस 'सुपलाश वृक्ष' के नीचे बैठकर सहपान करते हैं (ऋ. १०. १३५. १), अथवा जिसके "अग्रभागमें स्वादिष्ट पीपल है, और जिसपर दो सुपर्ण अर्थात् पक्षी रहते हैं" (ऋ. १. १६४. २०), या "जिस पिप्पलको (पीपल) वायुदेवता (मरुद्गण) हिलाते हैं" (ऋ. ५. ५४. १२), वह वृक्षभी यही है. अथर्ववेदमें जो यह वर्णन है, कि "देवसदन अश्वत्थ वृक्ष तीसरे स्वर्गलोकमें (वरुणलोकमें) है" (अथर्व ५. ४. ३; १९. ३९. ६), वहभी इसी वृक्षके संबंधमें जान पड़ता है। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें (३. ८. १२. २) अश्वत्थ शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है :- पितृयाण-कालमें अग्नि अथवा यज्ञप्रजापति देवलोकसे नष्ट होकर इस वृक्षमें अश्वका (घोड़े) रूप धरकर एक वर्षतक छिपा रहा था, इसीसे इस वृक्षका अश्वत्थ नाम हो गया (महा. अनु. ८५); और कई एक नैरुक्तिकोंका यहभी मत है, कि पितृयाणकी लंबी रात्रिमें सूर्यके घोड़े यमलोकमें इस वृक्षके नीचे विश्राम किया करते हैं, इसलिये इसको अश्वत्थ (अर्थात् घोड़ेका स्थान) नाम प्राप्त हुआ होगा। 'अ' = नहीं, 'श्व' = कल और 'त्थ' = स्थिर - यह आध्यात्मिक निरुक्ति पीछेकी कल्पना है। नामरूपा- त्मक मायाका स्वरूप जब कि विनाशवान् अथवा हरघड़ीमें पलटनेवाला है, तब उसको "कलतक न रहनेवाला" तो कह सकेंगे; परंतु 'अव्यय', अर्थात् जिसका कभीभी व्यय नहीं होता, विशेषण स्पष्ट कर देता है, कि यह अर्थ यहाँ अभिमत नहीं है। पहले पीपलके वृक्षकोही अश्वत्थ कहते थे, और कठोप- निषद्में (६. १) जो यह ब्रह्ममय अमृत अश्वत्थवृक्ष कहा गया है :- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ वहभी यही है; और 'ऊर्ध्वमूलमधःशाख' इस पद-सादृश्यसेही व्यक्त होता है, कि भगवद्गीताका वर्णन कठोपनिषदके वर्णनसेही लिया गया है। परमेश्वर स्वर्गमें है, और उससे उपजा हुआ जगद्वृक्ष नीचे अर्थात् मनुष्य-लोकमें है, अतः वर्णन किया गया है, कि इस वृक्षका मूल (अर्थात् परमेश्वर) ऊपर है; और इसकी अनेक शाखाएं अर्थात् जगतका फैलाव नीचे विस्तृत है। परंतु