भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 851

८०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥ बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥ | यह है, कि इस ज्ञानके हो जानेपर इसी अनासक्त-बुद्धिसे बालबच्चोंमें अथवा | गृहस्तीमें रहकर प्राणिमात्रके हितार्थ जगत्के व्यवहार किये जायें अथवा न | किये जायें; और केवल ज्ञानकी व्याख्यासेही इसका निर्णय करना उचित नहीं | है। क्योंकि भगवानने गीतामें अनेक स्थलोंपर कहा है, कि ज्ञानी पुरुष कर्मोंमें | लिप्त न होकर, उन्हें अनासक्त-बुद्धिसे लोकसंग्रहके निमित्त करता रहे और | इसकी सिद्धिके लिये जनकके बर्तावका और अपने व्यवहारका उदाहरणभी | दिया है ( गीता ३. १९-२५; ४. १४) । समर्थ श्रीरामदास स्वामीके चरितसे | यह बात प्रकट होती है, कि शहरमें रहनेकी लालसा न रहनेपरभी जगत्के | व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर कैसे किये जा सकते हैं? ( दासबोध | १९. ६. २९; १९. ९. ११) । यह ज्ञानका लक्षण हुआ; अब ज्ञेयका स्वरूप | बतलाते हैं:- ] ( १२ ) ( अब तुझे ) वह बतलाता हूँ, ( कि ), जिसे जान लेनेसे 'अमृत' अर्थात् मोक्ष मिलता है। ( वह ) अनादि ( सबसे ) परेका ब्रह्म ( है )। न उसे 'सत्' कहते हैं, और न 'असत्'भी । ( १३ ) उसके, सब ओर हाथ-पैर हैं, सब ओर आँखें, सिर और मुंह हैं, सब ओर कान हैं; और वही इस लोकमें सबको व्याप रहा है। ( १४ ) ( उसमें ) सब इंद्रियोंके गुणोंका आभास है, पर उसके कोईभी इंद्रिय नहीं है; वह ( सबसे ) असक्त अर्थात् अलग होकरभी सबका पालन करता है; और निर्गुण होनेपरभी गुणोंका उपभोग करता है। ( १५ ) ( वह ) सब भूतोंके भीतर और बाहरभी है; अचर है और चरभी है; सूक्ष्म होनेके कारण वह अविज्ञेय है; और दूर होकरभी समीप है। ( १६ ) वह ( तत्त्वतः ) 'अविभक्त' अर्थात् अखंडित ( होकरभी ) सब भूतोंमें मानो ( नानात्वसे ) विभक्त हो रहा है;