भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 850

तेरहवाँ अध्याय ८०५ असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥ जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, व्याधि एवं दुःखोंको ( अपने पीछे लगे हुए ) दोष समझना; (९) कर्ममें अनासक्ति, बाल-बच्चों और घर-गृहस्ती आदिमें लंपट न होना, इष्ट या अनिष्टकी प्राप्ति हो, चित्तकी सर्वदा एकहीसी वृत्ति रखना, (१०) और मुझमें अनन्य भावसे अटल भक्ति, 'विविक्त' अर्थात् चुने हुए अथवा एकान्त स्थानमें रहना, साधारण लोगोंके जमावको पसंद न करना, (११) अध्यात्म- ज्ञानको नित्य समझना, और तत्त्वज्ञानके सिद्धान्तोंका परिशीलन – इनको ज्ञान कहते हैं; इसके व्यतिरिक्त जो कुछ है, वह सब अज्ञान है। । [ सांख्योंके मतमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञका ज्ञानही प्रकृति-पुरुषके विवेकका ज्ञान है, । और उसे इसी अध्यायमें आगे बतलाया है (गीता १३.१९-२३; १४.१९)। । इसी प्रकार अठारहवें अध्यायमें (गीता १८.२०) ज्ञानके स्वरूपका यह । व्यापक लक्षण बतलाया है–"अविभक्तं विभक्तेषु"। परंतु मोक्षशास्त्रम । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानका अर्थ केवल बुद्धिसे यही जान लेना विवक्षित नही होता, । कि अमुक अमुक बातें अमुक प्रकारकी हैं। अध्यात्म शास्त्रका सिद्धान्त यह है, । कि उस ज्ञानकाका देहके स्वभावपर साम्य-बुद्धिरूप परिणाम होना चाहिये, । अन्यथा वह ज्ञान अपूर्ण या कच्चा है। अतएव यह बतलाकर, कि बुद्धिसे । अमुक अमुक जान लेनाही ज्ञान है, ऊपरके पाँच श्लोकोंमें ज्ञानकी व्याख्या इस । प्रकार की गई है, कि जब उक्त श्लोकोंमें बतलाये हुए मान और दंभका छूट । जाना, अहिंसा, अनासक्ति, समबुद्धि इत्यादि बीस गुण मनुष्यके स्वभावमें दीख । पड़ने लगें, तब उसे ज्ञान कहना चाहिये, (गीतार. प्र. ९, पृ. २४९, २५०) । दसवें श्लोकमें "विविक्त-स्थानमें रहना और जमावको नापसंद करना" भी । ज्ञानका एक लक्षण कहा है, उससे कुछ लोगोंने यह दिखानेका प्रयत्न किया है, । कि गीताको संन्यास-मार्गही अभीष्ट है। किंतु हम पहलेही बतला चुके हैं । (गीता १२. १९ की टिप्पणी; गीतार. प्र. १०, पृ. २८५), कि यह मत ठीक । नहीं है, और ऐसा अर्थ करना उचितभी नहीं है। यहाँ इतनाही विचार किया । है, कि ज्ञान क्या है; और इस विषयमें कोई वादभी नहीं है, वह ज्ञान बाल- । बच्चोंमें, घरगृहस्तीमें अथवा लोगोंके जमावमें अनासक्ति है। अब अगला प्रश्न