श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥ द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना अर्थात् प्राण आदिका व्यक्त व्यापार और धृति याने धैर्य, इस (३१ तत्त्वोंके) समुदायको सविकार क्षेत्र कहते हैं। | [ यह क्षेत्र और उसके विकारोंका लक्षण है। पाँचवे श्लोकमें सांख्य-मत- | वालोंके पच्चीस तत्त्वोंमेंसे पुरुषको छोड़ शेष चौबीस तत्त्व आ गये हैं। इन्ही | चौबीस तत्त्वोंमें मनका समावेश होनेके कारण इच्छा, द्वेष आदि मनोधर्मोंको | अलग बतलानेकी जरूरत न थी। परंतु कणाद-मतानुयायियोंके मतसे ये धर्म | आत्माके हैं और इस मतको मान लेनेमे शंका होती है, कि, इन गुणोंका क्षेत्रमेंही | समावेश होता है या नहीं ? अतः क्षेत्र शब्दको व्याख्याको निःसंदिग्ध करनेके | लिये यहाँ स्पष्ट रीतिसे क्षेत्रमेंही इच्छा-द्वेष आदि द्वंद्वोंका समावेश कर लिया | है, और उसीमें भय-अभय आदि अन्य द्वंद्वोंकाभी लक्षणासे समावेश हो जाता | है। यह दिखलानेके लिये, कि सबका संघात अर्थात् समूह क्षेत्रसे स्वतंत्र कर्ता | नहीं है, उसकी गणना क्षेत्रमेंही की गई है। कई बार 'चेतना' शब्दकाही 'चैतन्य' | अर्थ होता है। परंतु यहाँ चेतनासे “जड़ देहमें प्राण आदिके दीख पड़नेवाले | व्यापार, अथवा जीवितावस्थाकी चेष्टाएँ इतनाही अर्थ विवक्षित है; और ऊपर | दूसरे श्लोकमें कहा है, कि जड़ वस्तुमें यह चेतना जिससे उत्पन्न होती है, वह | चिच्छक्ति अथवा चैतन्य, क्षेत्रज्ञ-रूपसे, क्षेत्रसे अलग रहता है। 'धृति' शब्दकी | व्याख्या आगे गीतामेंही (१८. ३३) की है, उसे देखो। छठे श्लोकके 'समासेन' | पदका अर्थ “इन सबका समुदाय” है। अधिक विवरण गीतारहस्यके आठवें | प्रकरणके अंतमें (पृ. १४४, १४५) मिलेगा। पहले 'क्षेत्रज्ञ'के माने 'परमेश्वर' | बतलाकर फिर स्पष्ट किया है, कि 'क्षेत्र' क्या है ? अब मनुष्यके स्वभावपर | ज्ञानके जो परिणाम होते हैं, उनका वर्णन करके यह बतलाते हैं, कि ज्ञान किसको | कहते हैं; और आगे ज्ञेयका स्वरूप बतलाया है। ये दोनों विषय दीखनेमें भिन्न | दीख पड़ते हैं अवश्य; पर वास्तविक रीतिसे वे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारकेही दो भाग | हैं। क्योंकि, प्रारंभमेंही बतला चुके हैं, कि क्षेत्रज्ञका अर्थ परमेश्वर है। अतएव | क्षेत्रज्ञका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है, और उसीका स्वरूप अगले श्लोकोंमें | वर्णित है - बीचमेंही कोई मनमाना विषय नहीं धर घुसेड़ा है।] (७) मानहीनता, दंभहीनता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, पवित्रता, स्थिरता, मनोनिग्रह, (८) इंद्रियोंके विषयोंमे वैराग्य, अहंकारहीनता, और