श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 852, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ८०७ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥ १७ ॥ और (सब) भूतोंका पालन करनेवाला, ग्रसनेवाला एवं उत्पन्न करनेवालाभी उसेही समझना चाहिये। (१७) उसेही तेजकाभी तेज, और अंधकारसे परेका कहते हैं, ज्ञान, जो जानने योग्य है, वह (ज्ञेय), और ज्ञानगम्य अर्थात् ज्ञानसे (ही) विदित होनेवालाभी (वही) है, और सबके हृदयमें वही अधिष्ठित है। | [ अचिंत्य और अक्षर परब्रह्म जिसे कि क्षेत्रज्ञ अथवा परमात्माभी कहते | हैं, (गीता १३. २२), का जो वर्णन ऊपर है, वह आठवें अध्यायवाले अक्षर- | ब्रह्मके वर्णनके समान (गीता ८. ९-११) उपनिषदोंके आधारपर किया गया | है। पूरा तेरहवाँ श्लोक (श्वे. ३. १६) और अगले श्लोकका यह अर्धांश कि | “सब इंद्रियोंके गुणोंका भास होनेवाला, तथापि सब इंद्रियोंसे विरहित” | श्वेताश्वतर उपनिषदमें (श्वे. ३. १७) ज्यों-का-त्यों है; एवं “दूर होनेपरभी | समीप” ये शब्द ईशावास्य (५) और मुंडक (मुं. ३. १. ७) उपनिषदोंमें | पाये जाते हैं। ऐसेही ‘तेजका तेज’ ये शब्द बृहदारण्यकके (बृ. ४. ४. १६) | हैं; और ‘अंधकारसे परेका’ ये शब्द श्वेताश्वतरके (३. ८) हैं। इसी | भाँति यह वर्णन कि “जो सत्भी नहीं है और असत्भी नहीं कहा जा | सकता है।” ऋग्वेदके “नासदासीन्नो सदासीत्” इस ब्रह्मविषयक प्रसिद्ध | सूक्तको (ऋ. १०. १२९) लक्ष्य कर किया गया है। ‘सत्’ और ‘असत्’ | शब्दोंके अर्थोंका विचार गीतारहस्य प्र. ९, पृ. २४५-२४६ में विस्तारसहित | किया गया है; और फिर गीताके ९. १९वें श्लोककी टिप्पणीमेंभी किया है। | गीता ९. १९ में कहा है, कि ‘सत्’ और ‘असत्’ मैंही हूँ, अतः अब यह वर्णन | विरुद्ध-सा जंचता है, कि सच्चा ब्रह्म न ‘सत्’ है और न ‘असत्भी’। परंतु | वास्तवमें यह विरोध सच्चा नहीं है। क्योंकि ‘व्यक्त’ (क्षर) सृष्टि और | ‘अव्यक्त’ (अक्षर) सृष्टि, ये दोनों यद्यपि परमेश्वरकेही स्वरूप हों, तथापि यह | सिद्धान्त गीतामेंही पहले “भूतभृन्न च भूतस्थो” (गीता ९. ५) श्लोकमें और | आगे फिर (१५. १६, १७) पुरुषोत्तम-लक्षणमेंभी स्पष्टतया बतलाया गया है। | सच्चा परमेश्वर-तत्त्व इन दोनोंसे परे अर्थात् पूर्णतया अज्ञेय है। निर्गुण ब्रह्म | किसे कहते हैं, और जगत्में रहकरभी वह जगतमे बाहर कैसे है, अथवा वह | ‘विभक्त’ अर्थात् नानारूपात्मक दीख पड़े, तोभी मूलमें ‘अविभक्त’ अर्थात् एक-ही | कैसे हैं, इत्यादि प्रश्नोंका विचार गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २०९ से आगे) | किया जा चुका है। सोलहवें श्लोकके ‘विभक्तमिव’का अनुवाद यह है-“मानो | विभक्त हुआ-सा-दीख पड़ता है।” यह ‘इव’ शब्द उपनिषदोंमें अनेक वार | इसी अर्थमें आया है, कि ‘जगत्का’ नानात्व भ्रांतिकारक है और एकत्वही