भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 853

८०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥ § § प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥ | सत्य है। उदाहरणार्थ, “द्वैतमिव भवति”, “य इह नानेव पश्यति” इत्यादि | (बृ. २. ४. १४; ४. ४. १९; ४. ३. ७) । अतएव प्रकट है, कि गीतामें यह | अद्वैत सिद्धान्तही प्रतिपाद्य है, कि नाना-नामरूपात्मक माया भ्रष्ट है, और | उसमें अविभक्त रहनेवाला ब्रह्मही सत्य है। गीता १८. २० में फिर बतलाया | है, कि “अविभक्तं विभक्तेषु” अर्थात् नानात्वमें एकत्व देखना सात्त्विक ज्ञानका | लक्षण है। गीतारहस्यके अध्यात्म प्रकरणमें वर्णन है, कि यह सात्त्विक ज्ञानही | ब्रह्म है। गीतार. प्र. ९, पृ. २१५, २१६; (प्र. ६, पृ. १३२-१३३) । ] (१८) इस प्रकार संक्षेपसे बतला दिया, कि क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय किसे कहते हैं? मेरा भक्त इसे जानकर मेरे स्वरूपको पाता है। | [अध्यात्म या वेदान्तशास्त्रके आधारसे अब तक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका | विचार किया गया। इनमेंसे 'ज्ञेय' ही क्षेत्रज्ञ अथवा परब्रह्म है और- 'ज्ञान', दूसरे | श्लोकमें बतलाया हुआ, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान है, इस कारण यही परमेश्वरके सब | ज्ञानका संक्षेपमें निरूपण है। १८ वें श्लोकमें यही सिद्धान्त बतला दिया है, कि | जब क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारही परमेश्वरका ज्ञान है, तब आगे यह आपही सिद्ध है, | कि उसका फलभी मोक्षही होना चाहिये। वेदान्तशास्त्रका क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार यहाँ | समाप्त हो गया। परंतु प्रकृतिसेही पाचभौतिक विकारवान् क्षेत्र उत्पन्न हुआ है, | इसलिये और सांख्य जिसे 'पुरुष' कहते हैं, उसेही अध्यात्मशास्त्रमें 'आत्मा' कहते | हैं, इसलिये; सांख्यकी दृष्टिसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारही प्रकृति-पुरुषका विवेक होता | है। गीताशास्त्र प्रकृति और पुरुषको सांख्यके समान दो स्वतंत्र तत्त्व नहीं मानता; | और सातवें अध्यायमें (गीता ७. ४, ५) कहा है, कि ये एकही परमेश्वरके, | कनिष्ठ और श्रेष्ठ, दो रूप हैं। परंतु सांख्योंके द्वैतके बदले गीताशास्त्रके इस | द्वैतको एकबार स्वीकारकर लेनेपर, फिर प्रकृति और पुरुषके परस्परसंबंधका | सांख्योंका ज्ञान गीताको अमान्य नहीं है। और यहभी कह सकते हैं, कि | क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानकाही रूपांतर प्रकृति-पुरुषका विवेक है (गीतार. प्र. ७) | इसीलिये अबतक उपनिषदोंके आधारसे जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञान बतलाया, | उसेही अब सांख्योंकी परिभाषामें किंतु सांख्योंके द्वैतको अस्वीकार करके प्रकृति- | पुरुष-विवेकके रूपसे बतलाते हैं:- (१९) प्रकृति और पुरुष, दोनोंकोही अनादि समझ। विकार और गुणोंको | प्रकृतिसेही उपजा हुआ जान।