श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 854, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ८०९ कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥ | [ सांख्यशास्त्रके मतमें प्रकृति और पुरुष, दोनों न केवल अनादिही हैं, | प्रत्युत स्वतंत्र और स्वयंभूभी हैं। वेदान्ती समझते हैं, कि प्रकृति परमेश्वरसेही | उत्पन्न हुई है, अतएव वह न स्वयंभू है, और न स्वतंत्रभी है (गीता ४. ५. ६) । | परंतु यह नहीं बतलाया जा सकता, कि परमेश्वरसे प्रकृति कब उत्पन्न हुई | और पुरुष (जीव) परमेश्वरकाही अंश है। (गीता. १५. ७) ; इस कारण | वेदान्तियोंको इतना मान्य है, कि दोनों अनादि हैं। इस विषयका अधिक | विवेचन गीतारहस्यके ७ वें प्रकरणमें और विशेषतः पृ. १६२-१६८ में, एवं १० | वें प्रकरणके पृ. २६४-२६९ में किया है । ] (२०) कार्य अर्थात् देहके और करण अर्थात् इंद्रियोंके कर्तृत्वके लिये प्रकृति कारण कही जाती है; और. (कर्ता न होनेपरभी) सुखदुःखोंको भोगनेके लिये पुरुष (क्षेत्रज्ञ) कारण कहा जाता है । | [ इस श्लोकमें 'कार्यकरण'के स्थानमें 'कार्यकारण'भी पाठ है; और तब | उसका यह अर्थ होता है : - सांख्योंके महत् आदि तेईस तत्त्व एकसे दूसरा, दूसरेसे | तीसरा, इस कार्यकारण-क्रमसे उपजकर सारी व्यक्त-सृष्टि प्रकृतिसे बनती | है। यह अर्थभी बेजा नहीं है; परंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारमें क्षेत्रकी उत्पत्ति बतलाना | प्रसंगानुसार नहीं है। प्रकृतिसे जगत्के उत्पन्न होनेका वर्णन तो पहलेही | सातवें और नवें अध्यायमें हो चुका है। अतएव 'कार्यकरण' पाठही यहाँ अधिक | प्रशस्त दीख पड़ता है। शांकरभाष्यमें यही 'कार्यकरण' पाठ है।] (२१) क्योंकि पुरुष प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है; और '(प्रकृतिके) गुणोंको यह संयोग पुरुषको भली-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेके लिये कारण होता है। | [ प्रकृति और पुरुषके पारस्परिक संबंधका और भेदका यह वर्णन | सांख्यशास्त्रका है, (गीतार. प्र. ७, पृ. १५५-१६२) । अब यह कहकर कि | वेदान्ती लोग पुरुषको परमात्मा कहते हैं, सांख्य और वेदान्तका मेल कर दिया | गया है; और ऐसा करनेसे प्रकृति-पुरुष-विचार एवं क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारकी पूरी | एकवाक्यता हो जाती है।]