श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ § § ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥ (२२) (प्रकृतिके गुणोंके इस) उपद्रष्टा अर्थात् समीप बैठकर देखनेवाले, अनुमोदन करनेवाले, भर्ता अर्थात् (प्रकृतिके गुणोंको) बढ़ानेवाले, और उपयोग करनेवालेकोही इस देहका परपुरुष, महेश्वर और परमात्मा कहते हैं। (२३) इस प्रकार पुरुष (निर्गुण) और प्रकृतिको (ही) जो गुणोंसमेत जानता है, वह कैसाभी बर्ताव क्यों न किया करे, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। | [ २२ वें श्लोकमें जब यह निश्चय हो चुका, कि पुरुषही देहका परमात्मा | है, तब सांख्यशास्त्रके अनुसार पुरुषका जो उदासीनत्व और अकर्तृत्व है, वही | अब आत्माका अकर्तृत्व हो जाता है और इस प्रकार सांख्योंकी उपपत्तिसे वेदान्त- | की एकवाक्यता हो जाती है। वेदान्तवाले कुछ ग्रंथकारोंकी समझ है, कि सांख्य- | वादी वेदान्तके शत्रु हैं, अतः बहुतेरे वेदान्ती सांख्य-उपपत्तिको सर्वथा त्याज्य | मानते हैं। किंतु गीतामें ऐसा न करके क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारका एक-ही विषय | एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे, और दूसरी बार (वेदान्तके अद्वैत मतको बिना | छोड़े) सांख्य-दृष्टिसे, प्रतिपादन किया है, इससे गीताशास्त्रकी सम-बुद्धि प्रकट | हो जाती है। यहभी कह सकते हैं, कि उपनिषदोंके और गीताके विवेचनमें | यह एक महत्त्वका भेद है (गीतार. परिशिष्ट, पृ. ५२८)। इससे प्रकट होता है, | कि यद्यपि गीताको सांख्योंका द्वैतवाद मान्य नहीं है, तथापि उनके प्रतिपादनमें | जो कुछ युक्तिसंगत जान पड़ता है, वह गीताको अमान्य नहीं है। दूसरेही | श्लोकमें कह दिया है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है। अब | पिंडका ज्ञान और देहके परमेश्वरका ज्ञान संपादनकर मोक्ष प्राप्त करनेके मार्ग | प्रसंगके अनुसार संक्षेपसे बतलाते हैं :- ] (२४) कुछ लोग ध्यानसे स्वयंही अपने आपमें आत्माको देखते हैं; (कोई सांख्ययोगसे देखते हैं और कोई कर्मयोगसे (२५) परंतु इस प्रकार जिन्हें (अपने