भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 856

तेरहवाँ अध्याय ८११ § § यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥ समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥ आपही ) ज्ञान नहीं होता, वे दूसरेसे सुनकर ( श्रद्धासे ) परमेश्वरका भजन करते हैं। सुनी हुई बातको प्रमाण मान बर्तनेवाले ये पुरुषभी मृत्युको पारकर जाते हैं। | [ इन दो श्लोकोंमें पातंजलयोगके अनुसार ध्यान, सांख्य-मार्गके अनुसार | ज्ञानोत्तर कर्मसंन्यास, कर्मयोग-मार्गके अनुसार निष्काम बुद्धि परमेश्वरार्पण- | पूर्वक कर्म करना और ज्ञान न हो, तोभी श्रद्धासे आप्तोंके वचनोंका विश्वास- | कर परमेश्वरकी भक्ति करना ( गीता ४. ३९ ), ये आत्मज्ञानके भिन्न भिन्न | मार्ग बतलाये गये हैं। कोई किसीभी मार्गसे जावे, अंतमें उसे भगवानका ज्ञान | होकर मोक्ष मिलही जाता है। तथापि पहले जो यह सिद्धान्त किया गया है, | कि लोकसंग्रहकी दृष्टिसे कर्मयोग श्रेष्ठ है, वह इससे खंडित नहीं होता । इस | प्रकार साधन बतलाकर अगले श्लोकमें समग्र विषयका सामान्य रीतिसे उपसंहार | किया है; और उसमेंभी वेदान्तसे कापिल-सांख्यका मेल मिला दिया है। ] (२६) हे भरतश्रेष्ठ ! स्मरण रख, कि स्थावर या जंगम, किसीभी वस्तुका निर्माण क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे होता है। (२७) सब भूतोंमें एक-सा रहनेवाला, और सब भूतोंका नाश हो जानेपरभी जिसका नाश नहीं होता, ऐसे परमेश्वरको जिसने देख लिया, कहना होगा, कि उसीने ( सच्चे तत्त्वको) पहचाना। (२८) ईश्वरको सर्वत्र एक-सा व्याप्त समझकर ( जो पुरुष ) अपने आपकाही घात नहीं करता, अर्थात् अपने आप अच्छे मार्गमें लग जाता है, उस कारणसे वह उत्तम गतिही पाता है। | [ २७ वें श्लोकमें परमेश्वरका जो लक्षण बतलाया है, वह पीछे गीताके | ८. २० वें श्लोकमें आ चुका है, और उसका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके नवें | प्रकरणमें किया गया है, ( गीतार. प्र. ९, पृ. २१९, २५७ ) । ऐसेही २८ वें | श्लोकमें फिर वही बात कही है, जो पीछे ( गीता ६. ५-७ ) कही जा चुकी | है, कि आत्मा अपना बंधु है, और वही अपना शत्रु है। इस प्रकार २६, २७ | और २८ वें श्लोकोंमें सब प्राणियोंके विषयमें साम्य-बुद्धिरूप भावका वर्णन कर | चुकनेपर बतलाते हैं, कि इसके जान लेनेसे क्या होता है :- ]