भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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८१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्त्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥ § § अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ § § क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ (२९) जिसने यह जान लिया, कि (सब) कर्म सब प्रकारसे केवल प्रकृति- सेही किये जाते हैं, और आत्मा अकर्ता है, अर्थात् कुछभी नहीं करता, कहना चाहिये कि उसने (सच्चे तत्त्वको) पहचान लिया । (३०) जब सब भूतोंका पृथक्त्व अर्थात् नानात्व एकतासे (दीखने लगे), और इस (एकता) सेही (सब) विस्तार दीखने लगे, तब ब्रह्म प्राप्त होता है। । [ अब बतलाते हैं, कि आत्मा निर्गुण, अलिप्त और अक्रिय कैसे है :- ] (३१) हे कौंतेय ! अनादि और निर्गुण होनेके कारण यह अव्यक्त परमात्मा शरीरमें रह करभी कुछ करता-धरता नहीं है, और उसे (किसीभी कर्मका) लेप अर्थात् बंधन नहीं लगता । (३२) जैसे आकाश चारों ओर भरा हुआ है, परंतु सूक्ष्म होनेके कारण उसे (किसीकाभी) लेप नहीं लगता, वैसेही देहमें सर्वत्र रहने- परभी आत्माको (किसीकाभी) लेप नहीं लगता । (३३) हे भारत ! जैसे अकेला सूर्य इस सारे जगतको प्रकाशित करता है, वैसेही क्षेत्रज्ञ सब क्षेत्रको अर्थात् शरीरको प्रकाशित करता है । (३४) इस प्रकार ज्ञान-चक्षुसे अर्थात् ज्ञानरूप नेत्रसे, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको, एवं सब भूतोंकी (मूल) प्रकृतिके मोक्षको, जो जानते हैं, वे परब्रह्मको पाते हैं।