भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 858

तेरहवाँ अध्याय ८१३ [ यह पूरे प्रकरणका उपसंहार है। 'भूतप्रकृतिमोक्ष' शब्दका अर्थ हमने सांख्यशास्त्रके सिद्धान्तानुसार किया है। सांख्योंका सिद्धान्त यह है, कि मोक्षका मिलना या न मिलना आत्माकी अवस्थाएँ नहीं हैं, क्योंकि वह तो सदैव अकर्ता और असंग है। परंतु प्रकृतिके गुणोंके संगसे वह अपनेमें कर्तृत्वका आरोप किया करता है, इसलिये जब उसका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब उसके साथ लगी हुई प्रकृति छूट जाती है, अर्थात् उसीका मोक्ष हो जाता है, और इसके पश्चात् उसका पुरुषके आगे नाचना बंद हो जाता है। अतएव सांख्य-मतवाले प्रतिपादन किया करते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे बंध और मोक्ष, ये दोनों अवस्थाएँ प्रकृतिकीही हैं (सांख्यकारिका ६२; गीतारहस्य प्र. ७, पृ. १६५-१६६ ) हमें जान पड़ता है, कि सांख्यके ऊपर लिखे हुए सिद्धान्तके अनुसारही इस श्लोकमें 'प्रकृतिका मोक्ष' ये शब्द आये हैं। परंतु कुछ लोग इन शब्दोंका यह अर्थभी लगाते हैं, कि “भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षः" - पंचमहाभूतोंसे और प्रकृतिसे अर्थात् मायात्मक कर्मोंसे आत्माका मोक्ष होता है। नवें, ग्यारहवें और तेरहवें अध्यायके ज्ञान-विज्ञान निरूपण का भेद ध्यान देनेयोग्य है, कि यह क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विवेक ज्ञान-चक्षुसे विदित होनेवाला है (गीता १३. ३४)। तो नवें अध्यायकी राजविद्या प्रत्यक्ष अर्थात् चर्मचक्षुसे ज्ञात होनेवाली है (गीता ९. २), और विश्वरूप-दर्शन परम भगवद्भक्तकोभी केवल दिव्य-चक्षुसेही होनेवाला है (गीता ११. ८) । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, प्रकृति-पुरुष-विवेक अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।