भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 859

८१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चतुर्दशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ चौदहवाँ अध्याय [ तेहरवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे और दूसरी बार सांख्यकी दृष्टिसे बतलाया है, एवं उसीमें प्रतिपादन किया है, कि सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है, पुरुष अर्थात् क्षेत्रज्ञ उदासीन रहता है । परंतु इस बातका विवेचन अब तक नहीं हुआ, कि प्रकृतिका यह कर्तृत्व क्यों कर चला करता है ? अतएव इस अध्यायमें बतलाते हैं, कि एकही प्रकृतिसे विविध सृष्टि, विशेषतः सजीव सृष्टि, कैसे उत्पन्न होती है ? केवल मानवी सृष्टिकाही विचार करें, तो यह विषय क्षेत्रसंबंधी अर्थात् शरीरका होता है, इसलिये उसका समावेश क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें हो सकता है । परंतु जब स्थावर सृष्टिभी त्रिगुणात्मक प्रकृतिकाही फैलाव है, तब प्रकृतिके गुणभेदका यह विवेचन क्षर-अक्षर-विचारकाभी भाग हो सकता है । अत- एव 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार' इस संकुचित नामको छोड़कर सातवें अध्यायमें जिस ज्ञान- विज्ञानके बतलानेका आरंभ किया था, उसी ज्ञान-विज्ञानको अधिक स्पष्ट रीतिसे फिरभी बतलानेका आरंभ भगवानने अब इस अध्यायमें किया है । सांख्यशास्त्रकी दृष्टिसे इस विषयका विस्तृत निरूपण गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें किया गया है । त्रिगुणके विस्तारका यह वर्णन अनुगीता और मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमेंभी है । ] श्रीभगवानने कहा :- (१) और फिर सब ज्ञानोंसे उत्तम ज्ञान बतलाता हूँ, कि जिसको जानकर सब मुनि इस लोकसे परम सिद्धि पा गये हैं। (२) इस ज्ञानका आश्रय करके मुझसे एकरूपता पाये हुए लोग सृष्टिके उत्पत्ति-कालमेंभी नहीं जन्मते और प्रलय-कालमेंभी व्यथा नहीं पाते; ( अर्थात् जन्म-मरणसे एकदम छुटकारा पा जाते हैं । ) | [ यह हुई प्रस्तावना । अब पहले बतलाते हैं, कि प्रकृति मेराही स्वरूप | है; फिर सांख्योंके द्वैतको अलगकर, वेदान्तशास्त्रके अनुकूल यह निरूपण करते | हैं, कि प्रकृतिके सत्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे सृष्टिके नाना प्रकारके | व्यक्त पदार्थ किस प्रकार निर्मित होते हैं :- ]