श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
८१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्त्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥ § § अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ § § क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ (२९) जिसने यह जान लिया, कि (सब) कर्म सब प्रकारसे केवल प्रकृति- सेही किये जाते हैं, और आत्मा अकर्ता है, अर्थात् कुछभी नहीं करता, कहना चाहिये कि उसने (सच्चे तत्त्वको) पहचान लिया । (३०) जब सब भूतोंका पृथक्त्व अर्थात् नानात्व एकतासे (दीखने लगे), और इस (एकता) सेही (सब) विस्तार दीखने लगे, तब ब्रह्म प्राप्त होता है। । [ अब बतलाते हैं, कि आत्मा निर्गुण, अलिप्त और अक्रिय कैसे है :- ] (३१) हे कौंतेय ! अनादि और निर्गुण होनेके कारण यह अव्यक्त परमात्मा शरीरमें रह करभी कुछ करता-धरता नहीं है, और उसे (किसीभी कर्मका) लेप अर्थात् बंधन नहीं लगता । (३२) जैसे आकाश चारों ओर भरा हुआ है, परंतु सूक्ष्म होनेके कारण उसे (किसीकाभी) लेप नहीं लगता, वैसेही देहमें सर्वत्र रहने- परभी आत्माको (किसीकाभी) लेप नहीं लगता । (३३) हे भारत ! जैसे अकेला सूर्य इस सारे जगतको प्रकाशित करता है, वैसेही क्षेत्रज्ञ सब क्षेत्रको अर्थात् शरीरको प्रकाशित करता है । (३४) इस प्रकार ज्ञान-चक्षुसे अर्थात् ज्ञानरूप नेत्रसे, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको, एवं सब भूतोंकी (मूल) प्रकृतिके मोक्षको, जो जानते हैं, वे परब्रह्मको पाते हैं।
तेरहवाँ अध्याय ८१३ [ यह पूरे प्रकरणका उपसंहार है। 'भूतप्रकृतिमोक्ष' शब्दका अर्थ हमने सांख्यशास्त्रके सिद्धान्तानुसार किया है। सांख्योंका सिद्धान्त यह है, कि मोक्षका मिलना या न मिलना आत्माकी अवस्थाएँ नहीं हैं, क्योंकि वह तो सदैव अकर्ता और असंग है। परंतु प्रकृतिके गुणोंके संगसे वह अपनेमें कर्तृत्वका आरोप किया करता है, इसलिये जब उसका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब उसके साथ लगी हुई प्रकृति छूट जाती है, अर्थात् उसीका मोक्ष हो जाता है, और इसके पश्चात् उसका पुरुषके आगे नाचना बंद हो जाता है। अतएव सांख्य-मतवाले प्रतिपादन किया करते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे बंध और मोक्ष, ये दोनों अवस्थाएँ प्रकृतिकीही हैं (सांख्यकारिका ६२; गीतारहस्य प्र. ७, पृ. १६५-१६६ ) हमें जान पड़ता है, कि सांख्यके ऊपर लिखे हुए सिद्धान्तके अनुसारही इस श्लोकमें 'प्रकृतिका मोक्ष' ये शब्द आये हैं। परंतु कुछ लोग इन शब्दोंका यह अर्थभी लगाते हैं, कि “भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षः" - पंचमहाभूतोंसे और प्रकृतिसे अर्थात् मायात्मक कर्मोंसे आत्माका मोक्ष होता है। नवें, ग्यारहवें और तेरहवें अध्यायके ज्ञान-विज्ञान निरूपण का भेद ध्यान देनेयोग्य है, कि यह क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विवेक ज्ञान-चक्षुसे विदित होनेवाला है (गीता १३. ३४)। तो नवें अध्यायकी राजविद्या प्रत्यक्ष अर्थात् चर्मचक्षुसे ज्ञात होनेवाली है (गीता ९. २), और विश्वरूप-दर्शन परम भगवद्भक्तकोभी केवल दिव्य-चक्षुसेही होनेवाला है (गीता ११. ८) । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, प्रकृति-पुरुष-विवेक अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
८१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चतुर्दशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ चौदहवाँ अध्याय [ तेहरवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे और दूसरी बार सांख्यकी दृष्टिसे बतलाया है, एवं उसीमें प्रतिपादन किया है, कि सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है, पुरुष अर्थात् क्षेत्रज्ञ उदासीन रहता है । परंतु इस बातका विवेचन अब तक नहीं हुआ, कि प्रकृतिका यह कर्तृत्व क्यों कर चला करता है ? अतएव इस अध्यायमें बतलाते हैं, कि एकही प्रकृतिसे विविध सृष्टि, विशेषतः सजीव सृष्टि, कैसे उत्पन्न होती है ? केवल मानवी सृष्टिकाही विचार करें, तो यह विषय क्षेत्रसंबंधी अर्थात् शरीरका होता है, इसलिये उसका समावेश क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें हो सकता है । परंतु जब स्थावर सृष्टिभी त्रिगुणात्मक प्रकृतिकाही फैलाव है, तब प्रकृतिके गुणभेदका यह विवेचन क्षर-अक्षर-विचारकाभी भाग हो सकता है । अत- एव 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार' इस संकुचित नामको छोड़कर सातवें अध्यायमें जिस ज्ञान- विज्ञानके बतलानेका आरंभ किया था, उसी ज्ञान-विज्ञानको अधिक स्पष्ट रीतिसे फिरभी बतलानेका आरंभ भगवानने अब इस अध्यायमें किया है । सांख्यशास्त्रकी दृष्टिसे इस विषयका विस्तृत निरूपण गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें किया गया है । त्रिगुणके विस्तारका यह वर्णन अनुगीता और मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमेंभी है । ] श्रीभगवानने कहा :- (१) और फिर सब ज्ञानोंसे उत्तम ज्ञान बतलाता हूँ, कि जिसको जानकर सब मुनि इस लोकसे परम सिद्धि पा गये हैं। (२) इस ज्ञानका आश्रय करके मुझसे एकरूपता पाये हुए लोग सृष्टिके उत्पत्ति-कालमेंभी नहीं जन्मते और प्रलय-कालमेंभी व्यथा नहीं पाते; ( अर्थात् जन्म-मरणसे एकदम छुटकारा पा जाते हैं । ) | [ यह हुई प्रस्तावना । अब पहले बतलाते हैं, कि प्रकृति मेराही स्वरूप | है; फिर सांख्योंके द्वैतको अलगकर, वेदान्तशास्त्रके अनुकूल यह निरूपण करते | हैं, कि प्रकृतिके सत्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे सृष्टिके नाना प्रकारके | व्यक्त पदार्थ किस प्रकार निर्मित होते हैं :- ]
चौदहवाँ अध्याय ८१५ § § मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ § § सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ (३) हे भारत ! महद्ब्रह्म अर्थात् प्रकृति मेरीही योनि है और मैं उसमें गर्भ रखता हूँ; फिर उससे समस्त भूत उत्पन्न होने लगते हैं। (४) हे कौंतेय । (पशुपक्षी आदि) सब योनियोंमें जो जो मूर्तियाँ जन्मती हैं, उनकी योनि महत् ब्रह्म है और मैं बीजदाता पिता हूँ । (५) हे महाबाहु ! प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्व, रज और तम गुण देहमें रहनेवाले अव्यय अर्थात् निर्विकार आत्माको देहमें बाँध लेते हैं। (६) हे निष्पाप अर्जुन ! इन गुणोंमेंसे निर्मलताके कारण प्रकाश डालनेवाला और निर्दोष सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके साथसे (प्राणीको) बाँधता है। (७) रजोगुणका स्वभाव रागात्मक है और उससे तृष्णा और आसक्तिकी उत्पत्ति होती है। हे कौंतेय ! वह प्राणीको कर्म करनेके (प्रवृत्तिरूप) संगसे बाँध डालता है। (८) किंतु तमोगुण अज्ञानसे उपजता है और वह सब प्राणियोंको मोहमें डालता है। हे भारत ! वह प्रमाद, आलस्य, और निद्रासे (प्राणी)को बाँध लेता है। (९) सत्त्वगुण सुखमें, और रजोगुण कर्ममें, आसक्ति उत्पन्न करता है। परंतु हे भारत! तमोगुण ज्ञानको ढँक- कर प्रमाद अर्थात् कर्तव्यमूढतामें, या कर्तव्यके विस्मरणमें, आसक्ति उत्पन्न करता है। | [ सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणोंके ये पृथक् लक्षण बतलाये गये | हैं। किंतु ये गुण कभीभी पृथक् पृथक् नहीं रहते, तीनों सदैव एकत्र रहा करते हैं।
८१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र §§ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ §§ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ | उदाहरणार्थ, कोईभी भला काम करना यद्यपि सत्त्वका लक्षण है, तथापि भले | कामको करनेकी प्रवृत्ति होना रजका धर्म है, इस कारण सात्त्विक स्वभावमेंभी | थोड़े-से रजका मिश्रण सदैव रहताही है। इसीसे अनुगीतामें इन गुणोंका इस | प्रकार मिथुनात्मक वर्णन है, कि तमका मिथुन अर्थात् जोड़ा सत्त्व है, और | सत्त्वका जोड़ा रज है (मभा. अश्व. ३६), और कहा है, कि इनके अन्योन्य | अर्थात् पारस्परिक आश्रयसे अथवा झगड़ेसे सृष्टिके सब पदार्थ बनते हैं (सां.का. | १२; गीतार. प्र. ७, पृ. १५८, १५९)। अब पहले इसी तत्त्वको बतलाकर | फिर सात्त्विक, राजस और तामस स्वभावके लक्षण बतलाते हैं :- ] (१०) रज और तमको दबाकर सत्त्व (बलवान्) हो जाता है, (तब उसे सात्त्विक कहना चाहिये); एवं इसी प्रकार सत्त्व और तमको दबाकर रज, तथा सत्त्व और रजको दबाकर तम (बलवान् हुआ करता है) (११) जब इस देहके सब द्वारोंमें (इंद्रियोंमें) प्रकाश अर्थात् निर्मल ज्ञान उत्पन्न होता, है, तब समझना चाहिये, कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है। (१२) हे भरतश्रेष्ठ ! रजोगुणके बढ़नेसे लोभ, कर्मकी प्रवृत्ति और उसका आरंभ अतृप्ति एवं इच्छा उत्पन्न होती हैं। (१३) और हे कुरुनंदन ! तमोगुणकी वृद्धि होनेपर अंधेरा, कुछभी न करनेकी प्रवृत्ति, प्रमाद, अर्थात् कर्तव्यकी विस्मृति और मोहभी उत्पन्न होता है। | [ यह बतला दिया, कि मनुष्यकी जीवितावस्थामें त्रिगुणोंके कारण | उसके स्वभावमें कौन कौन-से फ़र्क पड़ते हैं। अब बतलाते हैं, कि इन तीन | प्रकारके मनुष्योंको कौन-सी गति मिलती है :- ] (१४) सत्त्वगुणके उत्कर्ष-कालमें यदि प्राणी मर जावे, तो उत्तम तत्त्व जाननेवालोंके, अर्थात् देवता आदिके, निर्मल (स्वर्ग प्रभृति) लोक उसको प्राप्त
चौदहवाँ अध्याय ८१७ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ होते हैं। (१५) रजोगुणकी प्रबलतामें यदि मरे, तो जो कर्मोंमे आसक्त हों, उनमें (जनोंमें) जन्म लेता है; और तमोगुणमें मरे, तो (पशुपक्षी आदि) मूढ योनियोंमें उत्पन्न होता है। (१६) कहा है, कि पुण्य कर्मका फल निर्मल और सात्त्विक होता है, परंतु राजस कर्मका फल दुःख, और तामस कर्मका फल अज्ञान होता है। (१७) सत्त्वसे ज्ञान, तो रजोगुणसे केवल लोभ उत्पन्न होता है। तमोगुणसे न केवल प्रमाद और मोहही उपजता है, प्रत्युत अज्ञानकीभी उत्पत्ति होती है। (१८) सात्त्विक पुरुष ऊपरके अर्थात् स्वर्ग आदि लोकोंको जाते हैं। राजस मध्यम लोकमें अर्थात् मनुष्यलोकमें रहते हैं और कनिष्ठगुणवृत्तिके तामस अधोगति पाते हैं। | [ सांख्यकारिकामेंभी यह वर्णन है, कि धार्मिक और पुण्य कर्म-कर्ता होनेके | कारण सत्त्वस्थ मनुष्य स्वर्ग पाता है, और अधर्माचरण करके तामस पुरुष | अधोगति पाता है (सां. का. ४४) । इसी प्रकार यह १८ वाँ श्लोक अनुगीताके | त्रिगुण-वर्णनमेभी ज्यों-का-त्यों आया है (मभा. अश्व. ३९. १०; मनु. १२. ४०) | सात्त्विक कर्मोंसे स्वर्ग-प्राप्ति भले हो जावे, पर स्वर्गसुख है तो अनित्य ही। इस | कारण परम पुरुषार्थकी सिद्धि उससे नहीं होती है। सांख्योंका सिद्धान्त है, कि | इस परम पुरुषार्थ या मोक्षकी प्राप्तिके लिये उत्तम सात्त्विक स्थिति तो रहेही, | उसके सिवा यह ज्ञान होनाभी आवश्यक है, कि प्रकृति अलग है और मैं (पुरुष) | जुदा हूँ। सांख्य इसीको त्रिगुणातीत अवस्था कहते हैं; और यद्यपि यह स्थिति | सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंसेभी परेकी है, तोभी यह सात्त्विक अवस्था- | कीही पराकाष्ठा है, इस कारण इसका समावेश सामान्यतः सात्त्विक वर्गमेंही | किया जाता है, उसके लिये एक नया चौथा वर्ग बनानेकी आवश्यकता नहीं है | (गीतार. प्र. ७; पृ. १६८) । परंतु गीताको प्रकृति-पुरुषवाला सांख्योंका यह | द्वैत मान्य नहीं है, इसलिये सांख्योंके उक्त सिद्धान्तका गीतामें इस प्रकार रूपां- | तर हो जाता है, कि प्रकृति और पुरुषसे परे जो एक आत्मस्वरूपी परमेश्वर | या परब्रह्म है। यही अर्थ अब अगले श्लोकोंमें वर्णित हैः- ] गी. र. ५२
८१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥ गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच । § § कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥ उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥ (१९) द्रष्टा अर्थात् उदासीनतामे देखनेवाला पुरुष, जब जान लेता है, कि (प्रकृतिसे) गुणोंके अतिरिक्त दूसरा कोई कर्ता नहीं है, और जब (तीनों) गुणोंसे परेके (तत्त्वको) पहचान लेता है, तब वह मेरे स्वरूपमें मिल जाता है। (२०) देहधारी मनुष्य देहकी उत्पत्तिके कारण स्वरूप उन तीनों गुणों जाकर जन्म, मृत्यु और बुढ़ापेके दुःखोंसे विमुक्त होता हुआ अमृतका अर्थात् मोक्षका अनुभव करता है। । [ वेदान्तमें जिसे माया कहते हैं, उसीको सांख्य-मतवाले त्रिगुणात्मक प्रकृति कहते हैं, इसलिये त्रिगुणातीत होनाही मायासे छूट कर परब्रह्मको पहचान लेना है (गीतार. ७. १४) ; और इसीको ब्राह्मी अवस्था कहते हैं (गीता २. ७२ ; १८. ५३ ) : अध्यात्मशास्त्रमे बतलाये हुए त्रिगुणातीतके इस लक्षणको सुनकर उसका और अधिक वृत्तान्त जाननेकी अर्जुनको इच्छा हुई, और पीछे द्वितीय अध्याय में ( गीता २. ५४ ) जैसा उसने स्थितप्रज्ञके संबंधमें प्रश्न किया था, वैसाही यहाँभी वह पूछता है :- ] अर्जुनने कहा :- (२१) हे प्रभो ! किन लक्षणोंसे ( जाना जाय, कि वह) इन तीनों गुणोंके परे चला जाता है ? (मुझे बतलाइये, कि) उसका (त्रिगुणातीतका) आचार क्या है और वह इन तीन गुणोंके परे कैसे जाता है ? श्रीभगवानने कहा :- (२२) हे पाण्डव ! प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह ( अर्थात् क्रमसे सत्त्व, रज और तम, इन गुणोंके कार्य अथवा फल) प्राप्त होनेसेभी जो उनका द्वेष नहीं करता, और प्राप्त न हों, तोभी उनकी आकांक्षा नहीं रखता; (२३) जो ( कर्मफलके संबंधमे ) उदासीन-सा रहता है; (सत्त्व, रज और तम ये गुण जिसे
चौदहवाँ अध्याय ८१९ समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकांचनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥ §§ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ चलविचल नहीं कर सकते; तो इतनाही मान कर स्थिर रहता है, कि गुण (अपना अपना) काम करते हैं; जो डिगता नहीं है अर्थात् विकार नहीं पाता है; (२४) जिसे सुख-दुःख एक-सेही हैं; जो स्व-स्थ है अर्थात् अपनेमेंही स्थिर हुआ; मिट्टी, पत्थर और सोना जिसे समानही हैं; प्रिय-अप्रिय, निंदा और अपनी स्तुति जिसे समसमान हैं; जो सदा धैर्यसे युक्त है; (२५) जिसे मान-अपमान या मित्र और शत्रुदल तुल्य हैं अर्थात् एक-से हैं; और (इस समझसे कि प्रकृति सब कुछ करती है) जिसके सब (काम्य) उद्योग छूट गये हैं, उस पुरुषको गुणातीत कहते हैं। | [ यह इन दो प्रश्नोंका उत्तर हुआ, कि त्रिगुणातीत पुरुषके लक्षण क्या | हैं, और उसका आचार कैसा होता है ? ये लक्षण, और दूसरे अध्यायमें बतलाये | हुए स्थितप्रज्ञके लक्षण (२. ५५-७२), एवं बारहवें अध्यायमें (१२. १३-२०) | बतलाये हुए भक्तिमान् पुरुषके लक्षण, सब एक-सेही हैं। अधिक क्या कहें ? | 'सर्वारंभपरित्यागी', 'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' और 'उदासीनः' प्रभृति कुछ | विशेषणभी दोनों या तीनों स्थानोंमें एकही हैं। इससे प्रकट होता है, कि पिछले | अध्यायमें बतलाये हुए (गीता १३. २४, २५) चार मागोंमेंसे किसीभी मार्गके | स्वीकारकर लेनेपरभी सिद्धि-प्राप्त पुरुषका आचार और उसके लक्षण सब मार्गोंमें | एकहीसे रहते हैं। तथापि पीछे तीसरे, चौथे और पांचवे आदि अध्यायोंमें जो यह | दृढ़ और अटल सिद्धान्त किया है, कि निष्काम कर्म किसीकेभी नहीं छूट सकते; | उसके अबाधित होनेसे, स्मरण रखना चाहिये, कि ये स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त या | त्रिगुणातीत, सभी कर्म-योगमार्गके हैं। 'सर्वारम्भपरित्यागी' का अर्थ १२ वें अध्यायके | १६ वें श्लोककी टिप्पणीमें बतला चुके हैं। सिद्धावस्थामें पहुँचे हुए पुरुषोंके इन | वर्णनोंको स्वतंत्र मान कर संन्यास-मार्गके टीकाकार अपनेही संप्रदायको गीतामें प्रति- | पाद्य बतलाते हैं। परंतु गीतारहस्यके ११ वें और १२ वें प्रकरणमें (पृ. ३२६-३२७ | और ३७६-३७७) हमने इस बातका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन कर दिया है, कि | यह अर्थ पूर्वापर संदर्भके विरुद्ध है; अतएव ठीक नहीं है। अर्जुनके दोनों प्रश्नोंके | उत्तर हो चुके। अब बतलाते हैं, कि ये पुरुष इन तीन गुणोंमें परे कैसे जाते हैं:-] (२६) और जो (मुझेही सब कर्म अर्पण करनेके) अव्यभिचार, अर्थात्
८२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ एकनिष्ठ भक्तियोगसे, मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणोंसे परे जाकर ब्रह्मभूत अवस्था पा लेनेमें समर्थ हो जाता है । | [ संभव है, इस श्लोकसे यह शंका हो, कि जब त्रिगुणातीत अवस्था | सांख्य-मार्गकी है, तब वही अवस्था कर्म-प्रधान भक्तियोगसे कैसे प्राप्त हो जाती | है ? इसीसे भगवान् कहते हैं :— ] (२७) क्योंकि, अमृत और अव्यय ब्रह्मका, शाश्वत धर्मका, एवं एकान्तिक अर्थात् परमावधिके अत्यंत सुखका अंतिम स्थान मैं ही हूँ । | [ इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि सांख्योंके द्वैतको छोड़ देनेपर सर्वत्र | एकही परमेश्वर रह जाता है, इस कारण उसीकी भक्तिसे त्रिगुणातीत | अवस्थाभी प्राप्त होती है । तथापि एकही परमेश्वर मान लेनेमे साधनोंके | संबंधमे गीताका कोईभी आग्रह नहीं है ( गीता १३. २४, २५) । गीतामें | भक्तिमार्गको सुलभ अतएव सब लोगोंके लिये ग्राह्य कहा है; यह कहींभी | नहीं कहा है, कि अन्यान्य मार्ग त्याज्य हैं । गीतामें केवल भक्ति, केवल ज्ञान | अथवा केवल योगही प्रतिपाद्य है, — ये मत भिन्न-भिन्न संप्रदायोंके अभिमानियोंने | पीछेसे गीतापर लाद दिये हैं । गीताका सच्चा प्रतिपाद्य विषय तो निरालाही | है : मार्ग कोईभी हो, गीताका मुख्य प्रश्न यही है, कि परमेश्वरका ज्ञान हो | चुकनेपर संसारके कर्म लोकसंग्रहार्थ किये जावे या छोड़ दिये जावें ? और | इसका साफ़ साफ़ उत्तर पहलेही दिया जा चुका है, कि कर्मयोग श्रेष्ठ है । ] इस प्रकार भगवानने गाये हुए – अर्थात् कहे हुए – उपनिषद्में, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग – अर्थात् कर्मयोग – शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवां अध्याय समाप्त हुआ ।
पंद्रहवाँ अध्याय ८२१ पंचदशोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ पंद्रहवाँ अध्याय [ क्षेत्रक्षेत्रज्ञके विचारके सिलसिलेमें तेरहवें अध्यायमें उसी क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- विचारके सदृश सांख्योंके प्रकृति-पुरुषका विवेक बतलाया है, और चौदहवें अध्यायमें कहा है, कि प्रकृतिके तीन गुणोंसे मनुष्य-मनुष्यमें स्वभाव-भेद कैसे उत्पन्न होता है और उससे सात्त्विक आदि गति-भेद क्योंकर होते हैं? फिर यह विवेचन किया है, कि त्रिगुणातीत अवस्था या अध्यात्म-दृष्टिसे ब्राह्मी स्थिति किसे कहते हैं और वह कैसे प्राप्त की जाती है। यह सब निरूपण सांख्योंकी भाषामें है अवश्य परंतु सांख्योंके द्वैतको स्वीकार न करते हुए, जिस एकही परमेश्वरकी विभूतियां प्रकृति और पुरुष दोनों हैं, उस परमेश्वरका ज्ञान-विज्ञान-दृष्टिसे निरूपण किया गया है। परमेश्वरके स्वरूपके इस वर्णनके अतिरिक्त आठवें अध्यायमें अधियज्ञ, अध्यात्म और अधिदैवत आदि भेद दिखलाये जा चुके हैं। और, यह पहलेही कह चुके हैं, कि सब स्थानोंमें एकही परमात्मा व्याप्त है, एवं क्षेत्रमें क्षेत्रज्ञभी वही है। अब इस अध्यायमें पहले यह बतलाते हैं, कि परमेश्वरकीही रची हुई सृष्टिके विस्तारका, अथवा परमेश्वरके नामरूपात्मक विस्तारकाही, कभी कभी वृक्षरूपसे या वनरूपसे जो वर्णन पाया जाता है, उसका बीज क्या है; फिर परमेश्वरके सभी रूपोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तमस्वरूपका वर्णन किया है ।] श्रीभगवानने कहा: (१) जिस अश्वत्थ वृक्षका ऐसा वर्णन करते हैं, कि जड़ (एक) ऊपर है, और शाखाएँ (अनेक) नीचे हैं, (जो) अव्यय अर्थात् कभी नाश नहीं पाता, (एवं) छन्दांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते हैं, उसे (वृक्षको) जिसने जान लिया, वह पुरुष (सच्चा), वेदवेत्ता (है)। | [ उक्त वर्णन ब्रह्मवृक्षका अर्थात् संसारवृक्षका है। यहाँपर संसारका यह | संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है, कि "स्त्री-बाल-बच्चोंमें रहकर नित्य व्यवहार | करते रहें", परंतु उसका यहाँ "आँखोंके सामने दिखाई देनेवाला जगत् अथवा | दृश्य-सृष्टि" अर्थ है। इस संसारकोही सांख्य-मतवादी "प्रकृतिका विस्तार" | और वेदान्ती "भगवान्की मायाका पसार" कहते हैं; एवं अनुगीतामे इसेही | "ब्रह्मवृक्ष या ब्रह्मवन" (ब्रह्मारण्य) कहा है (मभा. अश्व. ३५. ४३)।
८४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
यह कल्पना अथवा रूपक न केवल वैदिक धर्ममेही है, कि प्रत्युत अन्य प्राचीन धर्मोंमेंभी पाया जाता है. एक बिलकुल छोटे-से बीजमे जिस प्रकार बड़ा भारी गगनचुंबी वृक्ष निर्माण हो जाता है, उसी प्रकार एक अव्यक्त परमेश्वरसे दृश्य-सृष्टिरूप भव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ है। यूरोपकी पुरानी भाषाओंमें इसके नाम 'विश्ववृक्ष' या 'जगद्वृक्ष' है। ऋग्वेदमे (१. २४. ७) वर्णन है, कि वरुण- लोकमें एक ऐसा वृक्ष है, कि जिसकी किरणोंकी जड़ ऊपर (ऊर्ध्व) है और उसकी किरणें ऊपरसे नीचे (निचीना) फैलती हैं। विष्णुसहस्रनाममें 'वारुणो वृक्षः' (वरुणके वृक्ष) को परमेश्वरके हज़ार नामोंमेंसे एकही नाम कहा है। यम और पितर जिस 'सुपलाश वृक्ष' के नीचे बैठकर सहपान करते हैं (ऋ. १०. १३५. १), अथवा जिसके "अग्रभागमें स्वादिष्ट पीपल है, और जिसपर दो सुपर्ण अर्थात् पक्षी रहते हैं" (ऋ. १. १६४. २०), या "जिस पिप्पलको (पीपल) वायुदेवता (मरुद्गण) हिलाते हैं" (ऋ. ५. ५४. १२), वह वृक्षभी यही है. अथर्ववेदमें जो यह वर्णन है, कि "देवसदन अश्वत्थ वृक्ष तीसरे स्वर्गलोकमें (वरुणलोकमें) है" (अथर्व ५. ४. ३; १९. ३९. ६), वहभी इसी वृक्षके संबंधमें जान पड़ता है। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें (३. ८. १२. २) अश्वत्थ शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है :- पितृयाण-कालमें अग्नि अथवा यज्ञप्रजापति देवलोकसे नष्ट होकर इस वृक्षमें अश्वका (घोड़े) रूप धरकर एक वर्षतक छिपा रहा था, इसीसे इस वृक्षका अश्वत्थ नाम हो गया (महा. अनु. ८५); और कई एक नैरुक्तिकोंका यहभी मत है, कि पितृयाणकी लंबी रात्रिमें सूर्यके घोड़े यमलोकमें इस वृक्षके नीचे विश्राम किया करते हैं, इसलिये इसको अश्वत्थ (अर्थात् घोड़ेका स्थान) नाम प्राप्त हुआ होगा। 'अ' = नहीं, 'श्व' = कल और 'त्थ' = स्थिर - यह आध्यात्मिक निरुक्ति पीछेकी कल्पना है। नामरूपा- त्मक मायाका स्वरूप जब कि विनाशवान् अथवा हरघड़ीमें पलटनेवाला है, तब उसको "कलतक न रहनेवाला" तो कह सकेंगे; परंतु 'अव्यय', अर्थात् जिसका कभीभी व्यय नहीं होता, विशेषण स्पष्ट कर देता है, कि यह अर्थ यहाँ अभिमत नहीं है। पहले पीपलके वृक्षकोही अश्वत्थ कहते थे, और कठोप- निषद्में (६. १) जो यह ब्रह्ममय अमृत अश्वत्थवृक्ष कहा गया है :- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ वहभी यही है; और 'ऊर्ध्वमूलमधःशाख' इस पद-सादृश्यसेही व्यक्त होता है, कि भगवद्गीताका वर्णन कठोपनिषदके वर्णनसेही लिया गया है। परमेश्वर स्वर्गमें है, और उससे उपजा हुआ जगद्वृक्ष नीचे अर्थात् मनुष्य-लोकमें है, अतः वर्णन किया गया है, कि इस वृक्षका मूल (अर्थात् परमेश्वर) ऊपर है; और इसकी अनेक शाखाएं अर्थात् जगतका फैलाव नीचे विस्तृत है। परंतु
पंद्रहवाँ अध्याय | ८२३
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
प्राचीन धर्मग्रंथोंमें एक और कल्पनाभी पाई जाती है, कि यह संसारवृक्ष वटवृक्ष होगा, न कि पीपल; क्योंकि बड़के पेड़के पाये ऊपरमे नीचे को बढ़ते जाते हैं । उदाहरणके लिये यह वर्णन है, कि अश्वत्थवृक्ष आदित्यका वृक्ष है और " न्यग्रोधो वारुणो वृक्षः " । न्यग्रोध अर्थात् नीचे ( न्यक् ) बढ़नेवाला ( रोध ) वटवृक्ष वरुणका वृक्ष है ( गोभिलगृह्य. ४. ७. २४ ) ; और महाभारतमें लिखा है, कि मार्कंडेय ऋषिने प्रलयकालमें बालरूपी परमेश्वरको एक ( उस प्रलयकाल- मेंभी नष्ट न होनेवाले, अतएव ) अव्यय न्यग्रोध अर्थात् बड़के पेड़की शाखापर देखा था। महा. वन. १८८. ९१ ) । इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषदमें यह दिखलानेके लिये अव्यक्त परमेश्वरसे अपार दृश्य जगत् कैसे निर्माण होता है, जो दृष्टान्त दिया है, वहभी न्यग्रोधके बीजकाही है ( छां. ६. १२. १ ) । श्वेताश्वतर उपनिषदमेंभी विश्ववृक्षका वर्णन है ( श्वे. ६. ६ ) ; परंतु वहाँ स्पष्ट नहीं बतलाया, कि यह कौन-सा वृक्ष है। मुंडक उपनिषदमें ( ३. १ ) ऋग्वेदकाही यह वर्णन ले लिया है, कि, इसी वृक्षपर दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) बैठे हुए हैं, जिनमेंसे एक पिप्पल अर्थात् पीपलके फलोंको खाता है। पीपल और बड़को छोड़, इस संसारवृक्षके स्वरूपकी तीसरी कल्पना औदुं- बरकी है; एवं पुराणोंमें यह दत्तात्रेयका वृक्ष माना गया है। सारांश, प्राचीन ग्रंथोंमें ये तीनों कल्पनाएँ हैं, कि परमेश्वरकी मायासे उत्पन्न हुआ जगत् एक बड़ा पीपल, बड़ या औदुंबर है; और इसी कारणमे विष्णु सहस्रनाममें विष्णुके ये तीन वृक्षात्मक नाम दिये हैं :- 'न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः' ( महा. अनु. १४९. १११ ), एवं समाजमेंभी यही तीन वृक्ष देवनात्मक और पूजनेयोग्य माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त विष्णुसहस्रनाम और गीता, दोनोंही महाभारतके भाग हैं, और जब कि विष्णुसहस्रनाममें औदुंबर, वरगद ( न्यग्रोध ) और अश्वत्थ, येही तीन पृथक् नाम दिये गये हैं, तब गीतामें 'अश्वत्थ' शब्दका पीपलही (औदुंबर या वरगद नही ) अर्थ लेना चाहिये, और मूलका अर्थभी वही है। “ छंदांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते हैं" इस वाक्यके ‘छंदांसि’ शब्दमें छद् = ढँकना धातु मानकर ( छां. १. ४. २ ) वृक्षको ढँकनेवाले पत्तोंसे वेदोंकी समता वर्णित है; और अंतम कहा है, कि यह वर्णन संपूर्ण वैदिक परंपराके अनुसार है, अतः इसे जिसने जान लिया, उसे वेदवेत्ता कहना चाहिये । इस प्रकार वैदिक वर्णन हो चुका; अब [ इसी वृक्षका दूसरे प्रकारसे अर्थात् सांख्यशास्त्रके अनुसार वर्णन करते हैं :-] ( २ ) उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपरभी फैली हुई हैं, कि जो ( सत्त्व आदि तीनों ) गुणोंसे पली हुई हैं, और जिनसे ( शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गंध-रूपी )
८२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥ विषयोंके अंकुर फूटे हुए हैं; एवं अंतमें कर्मका रूप पानेवाली उसकी जड़ें नीचेभी मनुष्यलोकमें बढ़ती दूर चली गई हैं। । [ गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें (पृ. १८०) इस बातका विस्तार- । सहित निरूपण कर दिया है, कि सांख्यशास्त्रके अनुसार प्रकृति और पुरुष, ये । दोही मूल तत्त्व हैं, और जब त्रिगुणात्मक प्रकृति पुरुषके आगे अपना विस्तार । सजाने लगती है, तब महत् आदि तेईस तत्त्व उत्पन्न होते हैं. और उनमें यह । ब्रह्मांड-वृक्ष बन जाता है। परंतु वेदान्तशास्त्रकी दृष्टिसे प्रकृति स्वतंत्र नहीं । है, वह परमेश्वरकाही एक अंश है, अतः त्रिगुणात्मक प्रकृतिके इस विस्तारको । स्वतंत्र वृक्ष न मानकर वेदान्तशास्त्रने यह सिद्धान्त किया है, कि ये शाखाएँ । 'ऊर्ध्वमूल' पीपलकेही हैं। इस सिद्धान्तके अनुसार, अब कुछ निराले स्वरूपका । वर्णन इस प्रकार किया है, कि पहले श्लोकमें वर्णित वैदिक 'अधःशाख' वृक्षकी । 'त्रिगुणोंसे पली हुई' शाखाएँ न केवल नीचेही, प्रत्युत 'ऊपर'भी फैली । हुई हैं और उनमें कर्मविपाकप्रक्रियाका धागाभी अंतमें पिरो दिया है। अनु- । गीतावाले ब्रह्मवृक्षके वर्णनमें केवल सांख्यशास्त्रके चौबीस तत्त्वोंकाही ब्रह्मवृक्ष । बतलाया गया है, उसमें इस वृक्षके वैदिक और सांख्य वर्णनोंका मेल नहीं । मिलाया गया है (महा. अश्व. ३५, २२, २३; गीतार. प्र. ८, पृ. १८०)। । परंतु गीतामें ऐसा नहीं किया, और दृश्य-सृष्टिरूप वृक्षके नातेसे वेदोंमें पाये । जानेवाले परमेश्वरके वर्णनका, और सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिके विस्तारका या । ब्रह्मांड-वृक्षके वर्णनका, इन दो श्लोकोंमें मेल कर दिया है। मोक्ष-प्राप्तिके लिये । त्रिगुणात्मक और ऊर्ध्वमूल वृक्षके इस विस्तारसे मुक्त हो जाना चाहिये। परंतु । यह वृक्ष इतना बड़ा है, कि इसके ओर-छोरका पताही नहीं चलता। अतएव । अब बतलाते हैं, कि इस विराट् वृक्षका नाश करके इसके मूलमें वर्तमान । अमृत-तत्त्वको पहचाननेका कौन-सा मार्ग है:— ] (३) परंतु इस लोकमें (जैसा कि ऊपर वर्णन किया है) वैसा उसका स्वरूप उपलब्ध नहीं होता; अथवा अन्त, आदि और आधारस्थानभी नहीं मिलता। अत्यन्त गहरी जड़ोंवाले इस अश्वत्थको (वृक्ष) अनासक्तिरूप सुदृढ तलवारसे काट कर, (४) फिर उस स्थानको ढूंढ निकालना चाहिये, कि जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता; और यह संकल्प करना चाहिये, कि (सृष्टिक्रमकी यह) “पुरातन प्रवृत्ति उत्पन्न हुई है, उसी आद्य पुरुषकी ओर मैं जाता हूँ।”
पंद्रहवाँ अध्याय ८२५ निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥ | [ गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमे ( गीतार. प्र. १०, पृ. २८७-६९१ ) | विवेचन किया है, कि सृष्टिका फैलावही नामरूपात्मक कर्म है; और यह कर्म | अनादि है। आसक्त-बुद्धि छोड़ देनेमे इसका क्षय हो जाता है, किसीभी | दूसरे उपायमे इसका क्षय नहीं हो सकता। क्योंकि यह स्वरूपतः अनादि | और अव्यय है। तीसरे श्लोकके “उसका स्वरूप या आदि-अंत नहीं मिलता” | इन शब्दोंसे यह सिद्धान्त किया गया है, कि कर्म अनादि है; आगे और | चलकर इसी कर्मवृक्षका क्षय करनेके लिये, अनासक्ति एकमेव साधन बत- | लाया है। ऐसेही उपासना करते समय जो भावना मनमें रहती है, उसके | अनुसार आगे फल मिलता है (गीता ८. ६)। अतएव चौथे श्लोकमें यह | स्पष्ट कर दिया है, कि वृक्ष-छेदनकी यह क्रिया होते समय मनमें कौन-सी | भावना रहनी चाहिये ? शांकरभाष्यमें “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये” जो पाठ | है, उसमें वर्तमानकालके प्रथम पुरुषके एकवचनका 'प्रपद्ये' क्रियापद है, जिससे | यह अर्थ करना पड़ता है; और उसमें 'इति'सरीखे किसी न किसी पदका | अध्याहारभी करना पड़ता है। इस कठिनाईको हटानेके लिये रामानुजभाष्यमें | लिखित “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येद्यतः प्रवृत्तिः” पाठांतरको स्वीकार कर लें, | तो ऐसा अर्थ किया जा सकेगा, कि “जहाँ जानेपर फिर पीछे नहीं लौटना | पड़ता, उस स्थानको खोजना चाहिये, (और) जिससे, सब सृष्टिकी उत्पत्ति | हुई है, उसीमें मिल जाना चाहिये”। किंतु 'प्रपद्' धातु है, नित्य आत्मनेपदी। | इससे उसका विध्यर्थक अन्य पुरुषका रूप 'प्रपद्येत्' हो नहीं सकता। | 'प्रपद्येत्' परस्मैपदका रूप है, और वह व्याकरणकी दृष्टिसे अशुद्ध है। प्रायः | इसी कारणसे शांकरभाष्यमें यह पाठ स्वीकार नहीं किया गया है; और | यही युक्तिसंगत है। छांदोग्य उपनिषदके कुछ मंत्रोंमें 'प्रपद्ये' पदका बिना | 'इति'के इसी प्रकार उपयोग किया गया है (छां. ८. १४. १)। 'प्रपद्ये' क्रिया- | पद प्रथमपुरुषान्त हो तो कहना न होगा, कि वक्तासे अर्थात् उपदेशकती | श्रीकृष्णसे उसका संबंध नहीं जोड़ा जा सकता। अब यह बतलाते हैं, कि इस | प्रकारसे क्या फल मिलता है :- ] (५) जो मान और मोहसे विरहित हैं, जिन्होंने आसक्ति-दोषको जीत लिया है, जो अध्यात्म-ज्ञानमें सदैव स्थिर रहते हैं, जो निष्काम और मुखदुःखसंज्ञक द्वंद्वोंसे मुक्त हो गये हैं, वे ज्ञानी पुरुष उस अव्यय-स्थानको जा पहुँचते हैं। (६) जहां
८२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥ जाकर फिर लौटना नहीं पड़ता, ( ऐसा ) वह मेरा परम स्थान है। उसे न तो सूर्य, न चंद्रमा ( और ) न अग्निभी प्रकाशित करता है। | [ इनमेंसे छठा श्लोक श्वेताश्वतर ( ६. १४ ), मुंडक ( २. २. १० ) | और कठ ( ५. १५ ) इन तीनों उपनिषदोंमें पाया जाता है। सूर्य, चंद्र या तारे, | ये सभी तो नामरूपोंकी श्रेणीमें आ जाते हैं; और परब्रह्म इन सब नामरूपोंसे | परे है, इस कारण सूर्य-चंद्र आदिको परब्रह्मकेही तेजसे प्रकाश मिलता है, फिर | यह प्रकटही है, कि परब्रह्मको प्रकाशित करनेके लिये किसी दूसरेकी अपेक्षाही | नहीं है। ऊपरके श्लोकमें 'परम स्थान' शब्दका अर्थ 'परब्रह्म' है, और | इस ब्रह्ममें मिल जानाही ब्रह्मनिर्वाण मोक्ष है। वृक्षका रूपक लेकर अध्यात्म- | शास्त्रमें परब्रह्मका जो ज्ञान बतलाया जाता है, उसका विवेचन समाप्त हो | गया। अब पुरुषोत्तम-स्वरूपका वर्णन करना है; परंतु अंतमें जो यह कहा है, | कि “जहाँ जाकर लौटना नहीं पड़ता” उससे सूचित होनेवाली जीवकी | उत्क्रांति और उसके साथही जीवके स्वरूपका पहले वर्णन करते हैं:- ] ( ७ ) जीवलोकमें ( कर्मभूमि ) मेराही सनातन अंश जीव होकर प्रकृतिमें रहनेवाली मनसहित छः अर्थात् मन और पाँच, ( सूक्ष्म ) इंद्रियोंको वह ( अपनी ओर ) खींच लेता है। ( इसीको लिंग-शरीर कहते हैं ) । ( ८ ) ( यह ) ईश्वर अर्थात् जीव जब ( स्थूल ) शरीर पाता है, और जब वह ( स्थूल शरीरसे ) निकल जाता है, तब यह ( जीव ) उन्हें ( मन और पाँच इंद्रियोंको ) वैसेही साथ ले जाता है, जैसे कि ( गंधके पुष्प आदि ) आश्रयसे वायु गंधको ले जाता है। ( ९ ) कान, आँखें, त्वचा, जीभ, नाक और मनमेंभी ठहरकर यह ( जीव ) विषयोंको भोगता है। | [ इन तीन श्लोकोंमेंसे, पहलेमें यह बतलाया है, कि सूक्ष्म या लिंग-शरीर | क्या है, फिर इन तीन अवस्थाओंका वर्णन किया है, कि यह लिंग-शरीर स्थूल | देहमें कैसे प्रवेश करता है, उसमे बाहर कैसे निकलता है, और उसमें रहकर | विषयोंका उपभोग कैसे करता है। सांख्य-मतके अनुसार यह सूक्ष्म शरीर महान् | तत्त्वसे लेकर सूक्ष्म पंचतन्मात्राओंतकके अठारह तत्त्वोंसे बना है; और वेदान्त-
पंद्रहवाँ अध्याय ८२७ उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुंजानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानु पश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥ यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥ § § यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥ | सूत्रोंमें (३. १. १) कहा है, कि पंच सूक्ष्म भूतोंका औरप्राणकाभी उसमें | समावेश होता है (गीतार. प्र. ८, पृ. १८४-१९२) । ऐसेही मैत्र्युपनिषदमें | (६.१०) वर्णन है, कि सूक्ष्मशरीर अठारह तत्त्वोंका बना है। इससे कहना | पड़ता है, कि “मन और पाँच इंद्रियाँ” इन शब्दोंसे सूक्ष्म शरीरमें वर्तमान | दूसरे तत्त्वोंका संग्रहभी यहाँ अभिप्रेत है। वेदान्त-सूत्रोंमेंभी (वे. सू. २. ३. | १३, ४३) 'नित्य' और 'अंश' इन दो पदोंका उपयोग करकेही यह सिद्धान्त | बतलाया है, कि जीवात्मा परमेश्वरसे वारंवार नये सिरेसे उत्पन्न नहीं हुआ | करता, वह परमेश्वरका 'सनातन अंश' है (गीता २. २४); और गीताके | तेरहवें अध्यायमें (१३.४) जो यह कहा है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ब्रह्म- | सूत्रोंमें लिया गया है, उसका इससे दृढ़ीकरण हो जाता है (गीतार. परिशिष्ट | पृ. ५३९-५४०) । गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २४७) दिखलाया है, | कि 'अंश' शब्दका अर्थ 'घटकाशादि'वत् अंश समझना चाहिये, न कि खंडित | 'अंश'। शरीरको धारणा करना, शरीरको छोड़ देना, एवं उपभोग करना - | इन तीनों क्रियाओंके इस प्रकार जारी रहनेपर :- ] (१०) (शरीरसे) निकल जानेवालेको अथवा रहनेवालेको, गुणोंसे युक्त हो कर (आपही नहीं) उपभोग करनेवालेको मूर्ख लोग नहीं जानते। ज्ञानचक्षुसे देखनेवाले लोग (उसे) पहचानते हैं। (११) इसी प्रकार प्रयत्न करनेवाले योगी अपनेमें स्थित इस आत्माको पहचानते हैं। परंतु वे अज्ञ लोग, कि जिनका आत्मा अर्थात् बुद्धि संस्कृत नहीं है, प्रयत्न करकेभी उसे नहीं पहचान पाते। | [१० वें और ११ वें श्लोकमें ज्ञानचक्षु या कर्म-योगमार्गसे आत्मज्ञानकी | प्राप्तिका वर्णन कर जीवकी उत्क्रांतिका वर्णन पूरा किया है। पिछले सातवें | अध्यायमें आत्माकी सर्वव्यापकताका जैसा वर्णन किया गया है (गीतार. ७. | ८-१२), वैसाही अब उसका फिर थोड़ा-सा वर्णन प्रस्तावनाके ढंगपर करके, | आगे सोलहवें श्लोकसे पुरुषोत्तम-स्वरूपका वर्णन किया है।] (१२) जो तेज सूर्यमें रहकर सारे जगतको प्रकाशित करता है, जो तेज चंद्रमा और अग्निमें है, उसे मेराही तेज समझ ।
८२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ § § द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ (१३) इसी प्रकार पृथ्वीमें प्रवेशकर, मैंही ( सब ) भूतोंको अपने तेजमे धारण करता हूँ, और रसात्मक सोम ( चंद्रमा ) हो कर सब ओषधियोंका अर्थात् वन- स्पतियोंका पोषण करता हूँ । | [ सोम शब्दके 'सोमवल्ली' और 'चंद्र', दोनों अर्थ है, और वेदोंमें वर्णन | है, कि चंद्र जिस प्रकार जलात्मक, अंशुमान और शुभ्र है, उसी प्रकार | सोमवल्लीभी है; और दोनोंकोभी ' वनस्पतियोंका राजा ' कहा है । तथापि | पूर्वापार संदर्भसे यहाँ चंद्रही विवक्षित है । इस श्लोकमें यह कहकर, कि चंद्रका | तेज मैंही हूँ, फिर इसी श्लोकमें बतलाया है, कि वनस्पतियोका पोषण करनेका | चंद्रका जो गुण है, वहभी मैंही हूँ । अन्य स्थानोंमेंभी ऐसे वर्णन हैं, कि जलमय | होनेसे चंद्रमे यह गुण है और इससे वनस्पतियोंकी बाढ़ होती है । ] (१४) मैं वैश्वानरूप अग्नि होकर प्राणियोंकी देहोंमें रहता हूँ, और प्राण एवं अपानसे युक्त होकर ( भक्ष्य, चोष्य, लेह्य और पेय ऐसे ) चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ । (१५) इसी प्रकार मैं सबके हृदयमे अधिष्ठित हूँ, स्मृति, और ज्ञान, एवं, अपोहन अर्थात् उनका नाश, मुझसेही होता है; तथा सब वेदोंसे जाननेयोग्य मैंही हूँ । वेदान्तका कर्ता और वेद जाननेवालाभी मैही हूँ । | [ इस श्लोकका दूसरा चरण कैवल्य उपनिषदमे ( कैं. २. ३ ) है, और | उसमें ' वेदैश्च सर्वैः 'के स्थानमें 'वेदैरनेकैः' इतनाही पाठभेद है । तब जिन्होंने | गीताकालमें 'वेदान्त' शब्दका प्रचलित होना न मानकर ऐसी दलीलें की हैं, | कि या तो यह श्लोकही प्रक्षिप्त होगा या इसके 'वेदान्त' शब्दका कुछ औरही | अर्थ लेना चाहिये, वे सब दलीलें बे-जड़-बुनियादकी हो जाती है । 'वेदान्त' | शब्द मुंडक (३. २. ६) और श्वेताश्वतर (६. २२) उपनिषदोंमें आया है, | तथा श्वेताश्वतरके कुछ मंत्र तो गीतामे हूबहू आ गये हैं । अब निरुक्ति- | पूर्वक पुरुषोत्तमका लक्षण बतलाते हैं :- ] (१६) (इस) लोकमें 'क्षर' और 'अक्षर', ये दो पुरुष हैं । सब ( नाशवान् )
पंद्रहवाँ अध्याय ८२९ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥ भूतोंको क्षर कहते हैं, और कूटस्थको, अर्थात् इन सब भूतोंके मूलमें (कूट) रहनेवाले को, ( कृतिरूप अव्यक्त तत्त्व ) अक्षर कहते हैं । ( १७ ) परंतु उत्तम पुरुष ( इन दोनोंसे ) भिन्न है । उसको परमात्मा कहते हैं । वही अव्यय ईश्वर त्रैलोक्यमें व्याप्त होकर ( त्रैलोक्यका ) पोषण करता है । ( १८ ) जब कि मैं क्षरसेभी परेका और अक्षरसेभी उत्तम ( पुरुष ) हूँ, लोक-व्यवहारमें और वेदोंमेंभी पुरुषोत्तम नामसे मैं प्रसिद्ध हूँ । | [ सोलहवें श्लोकके 'क्षर' और 'अक्षर' ये दो शब्द सांख्यशास्त्रके - | व्यक्त और अव्यक्त, अथवा व्यक्त-सृष्टि और अव्यक्त प्रकृति - इन दो शब्दोंके | समानार्थक हैं । प्रकट है, कि इनमेंसे क्षरही नाशवान् पंचभूतात्मक व्यक्त | पदार्थ है । परंतु स्मरण रहे, कि 'अक्षर' विशेषण पहले कई बार जब | परब्रह्मकोभी लगाया गया है ( गीता ८. ३ ; ८. २१ ; ११. ३७ ; १२. ३ ), | तब पुरुषोत्तमके उल्लिखित लक्षणमें 'अक्षर' शब्दका अर्थ अक्षर-ब्रह्म नहीं है, | किंतु उसका अर्थ सांख्योंकी अक्षर-प्रकृति है; और इस गड़बड़से बचानेके | लियेही सोलहवें श्लोकमें “ अक्षर अर्थात् कूटस्थ प्रकृति ” यह विशेष व्याख्या की | है ( गीतार.. प्र. ९, पृ. २०७-२०८ ) । सारांश, व्यक्त-सृष्टि और अव्यक्त- | प्रकृतिके परेका अक्षर-ब्रह्म ( गीता ८. २०-२२ पर हमारी टिप्पणी देखो ) . | और 'क्षर' ( व्यक्त-सृष्टि ) एवं 'अक्षर'से ( प्रकृति ) परेका पुरुषोत्तम, | वास्तवमे ये दोनों एकही हैं । तेरहवें अध्यायमें ( गीता १३. ३१ ) कहा गया | है, कि इसेही परमात्मा कहते हैं और यही परमात्मा शरीरमें क्षेत्रज्ञरूपसे | रहता है । इससे सिद्ध होता है, कि क्षर- अक्षर-विचारमे जो मूल तत्त्व अन्तमें | अक्षर-ब्रह्म निष्पन्न होता है, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविचारकाभी वही पर्यवसान है, अथवा | पिंडमें और ब्रह्मांडमें एकही पुरुषोत्तम है । इसी प्रकार यहभी बतलाया | गया है, कि अधिभूत और अधियज्ञ प्रभृतिका अथवा प्राचीन अश्वत्थ वृक्षका | भी तत्त्व यही है । इस ज्ञान-विज्ञान प्रकरणका अंतिम निष्कर्ष यह है, कि जिसने | जगत की इस एकताको जान लिया, और जिसके मनमें यह पहचान जिंदगी- | भरके लिये स्थिर हो गई ( वे सूत्र ४. १. १२; गीता ८. ६ ), कि " सब | भूतोंमें एक आत्मा है ” ( गीत ६. २९ ) वह कर्मयोगका आचरण करने | करतेही परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेता है । कर्म न करनेपर केवल परमेश्वर-
८३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ भक्तिसेभी मोक्ष मिल जाता है; परंतु गीताके ज्ञान-विज्ञान-निरूपणका वह तात्पर्य नहीं है। सातवें अध्यायके आरंभमेही कह दिया है, कि ज्ञान-विज्ञानके इस निरूपणका आरंभ यह दिखलानेके लियेही किया गया है, कि ज्ञानसे अथवा भक्तिसे शुद्ध हुई निष्काम बुद्धिके द्वारा संसारके सभी कर्म करने चाहिये, और उन्हें करते हुएही मोक्ष मिलता है। अब बतलाते हैं, कि इसे जान लेनेसे क्या फल मिलता है :- ] (१९) हे भारत ! इस प्रकार बिना मोहके जो मुझेही पुरुषोत्तम समझता है, वह सर्वज्ञ होकर सर्वभावसे मुझेही भजता है। (२०) हे निष्पाप भारत ! यह गुह्यसेभी गुह्यशास्त्र मैने बतलाया है। इसे जानकर ( मनुष्य) बुद्धिमान् अर्थात् बुद्ध या जानकार और कृतकृत्य हो जावेगा। [ यहाँ बुद्धिमानकाही 'बुद्ध अर्थात् जानकार' अर्थ है; क्योंकि भारत (शां. २४८. ११) में इसी अर्थमें 'बुद्ध' और 'कृतकृत्य' शब्द आये हैं। महा- भारतमें 'बुद्ध' शब्दका रूढार्थ 'बुद्धावतार' कहीभी नहीं आया है। (गीतार. परिशिष्ट पृ. ५६३ ) । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, पुरुषोत्तमयोग नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
सोलहवाँ अध्याय ८३१ षोडशोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ सोलहवाँ अध्याय । [ पुरुषोत्तमयोगसे क्षर-अक्षर-ज्ञानकी परमावधि हो चुकी; और सातवें अध्यायसे जिस ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ यह दिखलानेके किया गया था, कि कर्मयोगका आचरण करते रहनेसे परमेश्वरका ज्ञान होता है और उसीसे मोक्ष मिलता है, उसकी यहाँ समाप्ति हो चुकी और अब यहीं उसका उपसंहार करना चाहिये । परंतु नवें अध्यायमें (९. १२) भगवानने जो यह बिलकुल संक्षेपमें कहा था, कि राक्षसी मनुष्य मेरे अव्यक्त और श्रेष्ठ स्वरूपको नहीं पहचानते, उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये इस अध्यायका आरंभ किया गया है, अगले अध्यायमें इसका कारण बतलाया गया है, कि मनुष्य-मनुष्यमें भेद क्यों होते हैं और अठारहवें अध्यायमें पूरी गीताका उपसंहार है । ] श्रीभगवानने कहा :- (१) अभय (निडर), शुद्ध सात्त्विक वृत्ति, ज्ञान- योगव्यवस्थिति अर्थात् ज्ञान-(मार्ग) और (कर्म-)योगकी तारतम्यसे व्यवस्था, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय अर्थात् स्वधर्मके अनुसार आचरण, तप, सरलता, (२) अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग अर्थात् कर्मफलका त्याग, शांति, अपैशुन्य अर्थात् क्षुद्र- दृष्टि छोड़कर उदार भाव रखना, सब भूतोंमें दया, तृष्णा, मृदुता, न रखना (बुरे कामकी) लाज, अचापलता अर्थात् फिजूल कामोंका छूट जाना, (३) तेजस्विता, क्षमा, धृति, शुद्धता, द्रोह न करना, अतिमान न रखना - हे भारत ! (ये) गुण दैवी संपत्तिमें जन्मे हुए पुरुषोंको प्राप्त होते हैं । [ दैवी संपत्तिके ये छब्बीस गुण और तेरहवें अध्यायमें बतलाये हुए ज्ञानके लक्षण (गीता १३. ७-११) वास्तवमें एकही हैं; और इसीसे आगेके