श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ § § द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ (१३) इसी प्रकार पृथ्वीमें प्रवेशकर, मैंही ( सब ) भूतोंको अपने तेजमे धारण करता हूँ, और रसात्मक सोम ( चंद्रमा ) हो कर सब ओषधियोंका अर्थात् वन- स्पतियोंका पोषण करता हूँ । | [ सोम शब्दके 'सोमवल्ली' और 'चंद्र', दोनों अर्थ है, और वेदोंमें वर्णन | है, कि चंद्र जिस प्रकार जलात्मक, अंशुमान और शुभ्र है, उसी प्रकार | सोमवल्लीभी है; और दोनोंकोभी ' वनस्पतियोंका राजा ' कहा है । तथापि | पूर्वापार संदर्भसे यहाँ चंद्रही विवक्षित है । इस श्लोकमें यह कहकर, कि चंद्रका | तेज मैंही हूँ, फिर इसी श्लोकमें बतलाया है, कि वनस्पतियोका पोषण करनेका | चंद्रका जो गुण है, वहभी मैंही हूँ । अन्य स्थानोंमेंभी ऐसे वर्णन हैं, कि जलमय | होनेसे चंद्रमे यह गुण है और इससे वनस्पतियोंकी बाढ़ होती है । ] (१४) मैं वैश्वानरूप अग्नि होकर प्राणियोंकी देहोंमें रहता हूँ, और प्राण एवं अपानसे युक्त होकर ( भक्ष्य, चोष्य, लेह्य और पेय ऐसे ) चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ । (१५) इसी प्रकार मैं सबके हृदयमे अधिष्ठित हूँ, स्मृति, और ज्ञान, एवं, अपोहन अर्थात् उनका नाश, मुझसेही होता है; तथा सब वेदोंसे जाननेयोग्य मैंही हूँ । वेदान्तका कर्ता और वेद जाननेवालाभी मैही हूँ । | [ इस श्लोकका दूसरा चरण कैवल्य उपनिषदमे ( कैं. २. ३ ) है, और | उसमें ' वेदैश्च सर्वैः 'के स्थानमें 'वेदैरनेकैः' इतनाही पाठभेद है । तब जिन्होंने | गीताकालमें 'वेदान्त' शब्दका प्रचलित होना न मानकर ऐसी दलीलें की हैं, | कि या तो यह श्लोकही प्रक्षिप्त होगा या इसके 'वेदान्त' शब्दका कुछ औरही | अर्थ लेना चाहिये, वे सब दलीलें बे-जड़-बुनियादकी हो जाती है । 'वेदान्त' | शब्द मुंडक (३. २. ६) और श्वेताश्वतर (६. २२) उपनिषदोंमें आया है, | तथा श्वेताश्वतरके कुछ मंत्र तो गीतामे हूबहू आ गये हैं । अब निरुक्ति- | पूर्वक पुरुषोत्तमका लक्षण बतलाते हैं :- ] (१६) (इस) लोकमें 'क्षर' और 'अक्षर', ये दो पुरुष हैं । सब ( नाशवान् )