भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 872, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 872

पंद्रहवाँ अध्याय ८२७ उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुंजानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानु पश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥ यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥ § § यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥ | सूत्रोंमें (३. १. १) कहा है, कि पंच सूक्ष्म भूतोंका औरप्राणकाभी उसमें | समावेश होता है (गीतार. प्र. ८, पृ. १८४-१९२) । ऐसेही मैत्र्युपनिषदमें | (६.१०) वर्णन है, कि सूक्ष्मशरीर अठारह तत्त्वोंका बना है। इससे कहना | पड़ता है, कि “मन और पाँच इंद्रियाँ” इन शब्दोंसे सूक्ष्म शरीरमें वर्तमान | दूसरे तत्त्वोंका संग्रहभी यहाँ अभिप्रेत है। वेदान्त-सूत्रोंमेंभी (वे. सू. २. ३. | १३, ४३) 'नित्य' और 'अंश' इन दो पदोंका उपयोग करकेही यह सिद्धान्त | बतलाया है, कि जीवात्मा परमेश्वरसे वारंवार नये सिरेसे उत्पन्न नहीं हुआ | करता, वह परमेश्वरका 'सनातन अंश' है (गीता २. २४); और गीताके | तेरहवें अध्यायमें (१३.४) जो यह कहा है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ब्रह्म- | सूत्रोंमें लिया गया है, उसका इससे दृढ़ीकरण हो जाता है (गीतार. परिशिष्ट | पृ. ५३९-५४०) । गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २४७) दिखलाया है, | कि 'अंश' शब्दका अर्थ 'घटकाशादि'वत् अंश समझना चाहिये, न कि खंडित | 'अंश'। शरीरको धारणा करना, शरीरको छोड़ देना, एवं उपभोग करना - | इन तीनों क्रियाओंके इस प्रकार जारी रहनेपर :- ] (१०) (शरीरसे) निकल जानेवालेको अथवा रहनेवालेको, गुणोंसे युक्त हो कर (आपही नहीं) उपभोग करनेवालेको मूर्ख लोग नहीं जानते। ज्ञानचक्षुसे देखनेवाले लोग (उसे) पहचानते हैं। (११) इसी प्रकार प्रयत्न करनेवाले योगी अपनेमें स्थित इस आत्माको पहचानते हैं। परंतु वे अज्ञ लोग, कि जिनका आत्मा अर्थात् बुद्धि संस्कृत नहीं है, प्रयत्न करकेभी उसे नहीं पहचान पाते। | [१० वें और ११ वें श्लोकमें ज्ञानचक्षु या कर्म-योगमार्गसे आत्मज्ञानकी | प्राप्तिका वर्णन कर जीवकी उत्क्रांतिका वर्णन पूरा किया है। पिछले सातवें | अध्यायमें आत्माकी सर्वव्यापकताका जैसा वर्णन किया गया है (गीतार. ७. | ८-१२), वैसाही अब उसका फिर थोड़ा-सा वर्णन प्रस्तावनाके ढंगपर करके, | आगे सोलहवें श्लोकसे पुरुषोत्तम-स्वरूपका वर्णन किया है।] (१२) जो तेज सूर्यमें रहकर सारे जगतको प्रकाशित करता है, जो तेज चंद्रमा और अग्निमें है, उसे मेराही तेज समझ ।

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 872, कुल 956 में से · BharatKosha