श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥ जाकर फिर लौटना नहीं पड़ता, ( ऐसा ) वह मेरा परम स्थान है। उसे न तो सूर्य, न चंद्रमा ( और ) न अग्निभी प्रकाशित करता है। | [ इनमेंसे छठा श्लोक श्वेताश्वतर ( ६. १४ ), मुंडक ( २. २. १० ) | और कठ ( ५. १५ ) इन तीनों उपनिषदोंमें पाया जाता है। सूर्य, चंद्र या तारे, | ये सभी तो नामरूपोंकी श्रेणीमें आ जाते हैं; और परब्रह्म इन सब नामरूपोंसे | परे है, इस कारण सूर्य-चंद्र आदिको परब्रह्मकेही तेजसे प्रकाश मिलता है, फिर | यह प्रकटही है, कि परब्रह्मको प्रकाशित करनेके लिये किसी दूसरेकी अपेक्षाही | नहीं है। ऊपरके श्लोकमें 'परम स्थान' शब्दका अर्थ 'परब्रह्म' है, और | इस ब्रह्ममें मिल जानाही ब्रह्मनिर्वाण मोक्ष है। वृक्षका रूपक लेकर अध्यात्म- | शास्त्रमें परब्रह्मका जो ज्ञान बतलाया जाता है, उसका विवेचन समाप्त हो | गया। अब पुरुषोत्तम-स्वरूपका वर्णन करना है; परंतु अंतमें जो यह कहा है, | कि “जहाँ जाकर लौटना नहीं पड़ता” उससे सूचित होनेवाली जीवकी | उत्क्रांति और उसके साथही जीवके स्वरूपका पहले वर्णन करते हैं:- ] ( ७ ) जीवलोकमें ( कर्मभूमि ) मेराही सनातन अंश जीव होकर प्रकृतिमें रहनेवाली मनसहित छः अर्थात् मन और पाँच, ( सूक्ष्म ) इंद्रियोंको वह ( अपनी ओर ) खींच लेता है। ( इसीको लिंग-शरीर कहते हैं ) । ( ८ ) ( यह ) ईश्वर अर्थात् जीव जब ( स्थूल ) शरीर पाता है, और जब वह ( स्थूल शरीरसे ) निकल जाता है, तब यह ( जीव ) उन्हें ( मन और पाँच इंद्रियोंको ) वैसेही साथ ले जाता है, जैसे कि ( गंधके पुष्प आदि ) आश्रयसे वायु गंधको ले जाता है। ( ९ ) कान, आँखें, त्वचा, जीभ, नाक और मनमेंभी ठहरकर यह ( जीव ) विषयोंको भोगता है। | [ इन तीन श्लोकोंमेंसे, पहलेमें यह बतलाया है, कि सूक्ष्म या लिंग-शरीर | क्या है, फिर इन तीन अवस्थाओंका वर्णन किया है, कि यह लिंग-शरीर स्थूल | देहमें कैसे प्रवेश करता है, उसमे बाहर कैसे निकलता है, और उसमें रहकर | विषयोंका उपभोग कैसे करता है। सांख्य-मतके अनुसार यह सूक्ष्म शरीर महान् | तत्त्वसे लेकर सूक्ष्म पंचतन्मात्राओंतकके अठारह तत्त्वोंसे बना है; और वेदान्त-