श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 870, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंद्रहवाँ अध्याय ८२५ निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥ | [ गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमे ( गीतार. प्र. १०, पृ. २८७-६९१ ) | विवेचन किया है, कि सृष्टिका फैलावही नामरूपात्मक कर्म है; और यह कर्म | अनादि है। आसक्त-बुद्धि छोड़ देनेमे इसका क्षय हो जाता है, किसीभी | दूसरे उपायमे इसका क्षय नहीं हो सकता। क्योंकि यह स्वरूपतः अनादि | और अव्यय है। तीसरे श्लोकके “उसका स्वरूप या आदि-अंत नहीं मिलता” | इन शब्दोंसे यह सिद्धान्त किया गया है, कि कर्म अनादि है; आगे और | चलकर इसी कर्मवृक्षका क्षय करनेके लिये, अनासक्ति एकमेव साधन बत- | लाया है। ऐसेही उपासना करते समय जो भावना मनमें रहती है, उसके | अनुसार आगे फल मिलता है (गीता ८. ६)। अतएव चौथे श्लोकमें यह | स्पष्ट कर दिया है, कि वृक्ष-छेदनकी यह क्रिया होते समय मनमें कौन-सी | भावना रहनी चाहिये ? शांकरभाष्यमें “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये” जो पाठ | है, उसमें वर्तमानकालके प्रथम पुरुषके एकवचनका 'प्रपद्ये' क्रियापद है, जिससे | यह अर्थ करना पड़ता है; और उसमें 'इति'सरीखे किसी न किसी पदका | अध्याहारभी करना पड़ता है। इस कठिनाईको हटानेके लिये रामानुजभाष्यमें | लिखित “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येद्यतः प्रवृत्तिः” पाठांतरको स्वीकार कर लें, | तो ऐसा अर्थ किया जा सकेगा, कि “जहाँ जानेपर फिर पीछे नहीं लौटना | पड़ता, उस स्थानको खोजना चाहिये, (और) जिससे, सब सृष्टिकी उत्पत्ति | हुई है, उसीमें मिल जाना चाहिये”। किंतु 'प्रपद्' धातु है, नित्य आत्मनेपदी। | इससे उसका विध्यर्थक अन्य पुरुषका रूप 'प्रपद्येत्' हो नहीं सकता। | 'प्रपद्येत्' परस्मैपदका रूप है, और वह व्याकरणकी दृष्टिसे अशुद्ध है। प्रायः | इसी कारणसे शांकरभाष्यमें यह पाठ स्वीकार नहीं किया गया है; और | यही युक्तिसंगत है। छांदोग्य उपनिषदके कुछ मंत्रोंमें 'प्रपद्ये' पदका बिना | 'इति'के इसी प्रकार उपयोग किया गया है (छां. ८. १४. १)। 'प्रपद्ये' क्रिया- | पद प्रथमपुरुषान्त हो तो कहना न होगा, कि वक्तासे अर्थात् उपदेशकती | श्रीकृष्णसे उसका संबंध नहीं जोड़ा जा सकता। अब यह बतलाते हैं, कि इस | प्रकारसे क्या फल मिलता है :- ] (५) जो मान और मोहसे विरहित हैं, जिन्होंने आसक्ति-दोषको जीत लिया है, जो अध्यात्म-ज्ञानमें सदैव स्थिर रहते हैं, जो निष्काम और मुखदुःखसंज्ञक द्वंद्वोंसे मुक्त हो गये हैं, वे ज्ञानी पुरुष उस अव्यय-स्थानको जा पहुँचते हैं। (६) जहां