भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 869, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 869

८२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥ विषयोंके अंकुर फूटे हुए हैं; एवं अंतमें कर्मका रूप पानेवाली उसकी जड़ें नीचेभी मनुष्यलोकमें बढ़ती दूर चली गई हैं। । [ गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें (पृ. १८०) इस बातका विस्तार- । सहित निरूपण कर दिया है, कि सांख्यशास्त्रके अनुसार प्रकृति और पुरुष, ये । दोही मूल तत्त्व हैं, और जब त्रिगुणात्मक प्रकृति पुरुषके आगे अपना विस्तार । सजाने लगती है, तब महत् आदि तेईस तत्त्व उत्पन्न होते हैं. और उनमें यह । ब्रह्मांड-वृक्ष बन जाता है। परंतु वेदान्तशास्त्रकी दृष्टिसे प्रकृति स्वतंत्र नहीं । है, वह परमेश्वरकाही एक अंश है, अतः त्रिगुणात्मक प्रकृतिके इस विस्तारको । स्वतंत्र वृक्ष न मानकर वेदान्तशास्त्रने यह सिद्धान्त किया है, कि ये शाखाएँ । 'ऊर्ध्वमूल' पीपलकेही हैं। इस सिद्धान्तके अनुसार, अब कुछ निराले स्वरूपका । वर्णन इस प्रकार किया है, कि पहले श्लोकमें वर्णित वैदिक 'अधःशाख' वृक्षकी । 'त्रिगुणोंसे पली हुई' शाखाएँ न केवल नीचेही, प्रत्युत 'ऊपर'भी फैली । हुई हैं और उनमें कर्मविपाकप्रक्रियाका धागाभी अंतमें पिरो दिया है। अनु- । गीतावाले ब्रह्मवृक्षके वर्णनमें केवल सांख्यशास्त्रके चौबीस तत्त्वोंकाही ब्रह्मवृक्ष । बतलाया गया है, उसमें इस वृक्षके वैदिक और सांख्य वर्णनोंका मेल नहीं । मिलाया गया है (महा. अश्व. ३५, २२, २३; गीतार. प्र. ८, पृ. १८०)। । परंतु गीतामें ऐसा नहीं किया, और दृश्य-सृष्टिरूप वृक्षके नातेसे वेदोंमें पाये । जानेवाले परमेश्वरके वर्णनका, और सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिके विस्तारका या । ब्रह्मांड-वृक्षके वर्णनका, इन दो श्लोकोंमें मेल कर दिया है। मोक्ष-प्राप्तिके लिये । त्रिगुणात्मक और ऊर्ध्वमूल वृक्षके इस विस्तारसे मुक्त हो जाना चाहिये। परंतु । यह वृक्ष इतना बड़ा है, कि इसके ओर-छोरका पताही नहीं चलता। अतएव । अब बतलाते हैं, कि इस विराट् वृक्षका नाश करके इसके मूलमें वर्तमान । अमृत-तत्त्वको पहचाननेका कौन-सा मार्ग है:— ] (३) परंतु इस लोकमें (जैसा कि ऊपर वर्णन किया है) वैसा उसका स्वरूप उपलब्ध नहीं होता; अथवा अन्त, आदि और आधारस्थानभी नहीं मिलता। अत्यन्त गहरी जड़ोंवाले इस अश्वत्थको (वृक्ष) अनासक्तिरूप सुदृढ तलवारसे काट कर, (४) फिर उस स्थानको ढूंढ निकालना चाहिये, कि जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता; और यह संकल्प करना चाहिये, कि (सृष्टिक्रमकी यह) “पुरातन प्रवृत्ति उत्पन्न हुई है, उसी आद्य पुरुषकी ओर मैं जाता हूँ।”