श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंद्रहवाँ अध्याय | ८२३
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
प्राचीन धर्मग्रंथोंमें एक और कल्पनाभी पाई जाती है, कि यह संसारवृक्ष वटवृक्ष होगा, न कि पीपल; क्योंकि बड़के पेड़के पाये ऊपरमे नीचे को बढ़ते जाते हैं । उदाहरणके लिये यह वर्णन है, कि अश्वत्थवृक्ष आदित्यका वृक्ष है और " न्यग्रोधो वारुणो वृक्षः " । न्यग्रोध अर्थात् नीचे ( न्यक् ) बढ़नेवाला ( रोध ) वटवृक्ष वरुणका वृक्ष है ( गोभिलगृह्य. ४. ७. २४ ) ; और महाभारतमें लिखा है, कि मार्कंडेय ऋषिने प्रलयकालमें बालरूपी परमेश्वरको एक ( उस प्रलयकाल- मेंभी नष्ट न होनेवाले, अतएव ) अव्यय न्यग्रोध अर्थात् बड़के पेड़की शाखापर देखा था। महा. वन. १८८. ९१ ) । इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषदमें यह दिखलानेके लिये अव्यक्त परमेश्वरसे अपार दृश्य जगत् कैसे निर्माण होता है, जो दृष्टान्त दिया है, वहभी न्यग्रोधके बीजकाही है ( छां. ६. १२. १ ) । श्वेताश्वतर उपनिषदमेंभी विश्ववृक्षका वर्णन है ( श्वे. ६. ६ ) ; परंतु वहाँ स्पष्ट नहीं बतलाया, कि यह कौन-सा वृक्ष है। मुंडक उपनिषदमें ( ३. १ ) ऋग्वेदकाही यह वर्णन ले लिया है, कि, इसी वृक्षपर दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) बैठे हुए हैं, जिनमेंसे एक पिप्पल अर्थात् पीपलके फलोंको खाता है। पीपल और बड़को छोड़, इस संसारवृक्षके स्वरूपकी तीसरी कल्पना औदुं- बरकी है; एवं पुराणोंमें यह दत्तात्रेयका वृक्ष माना गया है। सारांश, प्राचीन ग्रंथोंमें ये तीनों कल्पनाएँ हैं, कि परमेश्वरकी मायासे उत्पन्न हुआ जगत् एक बड़ा पीपल, बड़ या औदुंबर है; और इसी कारणमे विष्णु सहस्रनाममें विष्णुके ये तीन वृक्षात्मक नाम दिये हैं :- 'न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः' ( महा. अनु. १४९. १११ ), एवं समाजमेंभी यही तीन वृक्ष देवनात्मक और पूजनेयोग्य माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त विष्णुसहस्रनाम और गीता, दोनोंही महाभारतके भाग हैं, और जब कि विष्णुसहस्रनाममें औदुंबर, वरगद ( न्यग्रोध ) और अश्वत्थ, येही तीन पृथक् नाम दिये गये हैं, तब गीतामें 'अश्वत्थ' शब्दका पीपलही (औदुंबर या वरगद नही ) अर्थ लेना चाहिये, और मूलका अर्थभी वही है। “ छंदांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते हैं" इस वाक्यके ‘छंदांसि’ शब्दमें छद् = ढँकना धातु मानकर ( छां. १. ४. २ ) वृक्षको ढँकनेवाले पत्तोंसे वेदोंकी समता वर्णित है; और अंतम कहा है, कि यह वर्णन संपूर्ण वैदिक परंपराके अनुसार है, अतः इसे जिसने जान लिया, उसे वेदवेत्ता कहना चाहिये । इस प्रकार वैदिक वर्णन हो चुका; अब [ इसी वृक्षका दूसरे प्रकारसे अर्थात् सांख्यशास्त्रके अनुसार वर्णन करते हैं :-] ( २ ) उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपरभी फैली हुई हैं, कि जो ( सत्त्व आदि तीनों ) गुणोंसे पली हुई हैं, और जिनसे ( शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गंध-रूपी )