भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 868, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 868

पंद्रहवाँ अध्याय | ८२३

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥

प्राचीन धर्मग्रंथोंमें एक और कल्पनाभी पाई जाती है, कि यह संसारवृक्ष वटवृक्ष होगा, न कि पीपल; क्योंकि बड़के पेड़के पाये ऊपरमे नीचे को बढ़ते जाते हैं । उदाहरणके लिये यह वर्णन है, कि अश्वत्थवृक्ष आदित्यका वृक्ष है और " न्यग्रोधो वारुणो वृक्षः " । न्यग्रोध अर्थात् नीचे ( न्यक् ) बढ़नेवाला ( रोध ) वटवृक्ष वरुणका वृक्ष है ( गोभिलगृह्य. ४. ७. २४ ) ; और महाभारतमें लिखा है, कि मार्कंडेय ऋषिने प्रलयकालमें बालरूपी परमेश्वरको एक ( उस प्रलयकाल- मेंभी नष्ट न होनेवाले, अतएव ) अव्यय न्यग्रोध अर्थात् बड़के पेड़की शाखापर देखा था। महा. वन. १८८. ९१ ) । इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषदमें यह दिखलानेके लिये अव्यक्त परमेश्वरसे अपार दृश्य जगत् कैसे निर्माण होता है, जो दृष्टान्त दिया है, वहभी न्यग्रोधके बीजकाही है ( छां. ६. १२. १ ) । श्वेताश्वतर उपनिषदमेंभी विश्ववृक्षका वर्णन है ( श्वे. ६. ६ ) ; परंतु वहाँ स्पष्ट नहीं बतलाया, कि यह कौन-सा वृक्ष है। मुंडक उपनिषदमें ( ३. १ ) ऋग्वेदकाही यह वर्णन ले लिया है, कि, इसी वृक्षपर दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) बैठे हुए हैं, जिनमेंसे एक पिप्पल अर्थात् पीपलके फलोंको खाता है। पीपल और बड़को छोड़, इस संसारवृक्षके स्वरूपकी तीसरी कल्पना औदुं- बरकी है; एवं पुराणोंमें यह दत्तात्रेयका वृक्ष माना गया है। सारांश, प्राचीन ग्रंथोंमें ये तीनों कल्पनाएँ हैं, कि परमेश्वरकी मायासे उत्पन्न हुआ जगत् एक बड़ा पीपल, बड़ या औदुंबर है; और इसी कारणमे विष्णु सहस्रनाममें विष्णुके ये तीन वृक्षात्मक नाम दिये हैं :- 'न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः' ( महा. अनु. १४९. १११ ), एवं समाजमेंभी यही तीन वृक्ष देवनात्मक और पूजनेयोग्य माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त विष्णुसहस्रनाम और गीता, दोनोंही महाभारतके भाग हैं, और जब कि विष्णुसहस्रनाममें औदुंबर, वरगद ( न्यग्रोध ) और अश्वत्थ, येही तीन पृथक् नाम दिये गये हैं, तब गीतामें 'अश्वत्थ' शब्दका पीपलही (औदुंबर या वरगद नही ) अर्थ लेना चाहिये, और मूलका अर्थभी वही है। “ छंदांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते हैं" इस वाक्यके ‘छंदांसि’ शब्दमें छद् = ढँकना धातु मानकर ( छां. १. ४. २ ) वृक्षको ढँकनेवाले पत्तोंसे वेदोंकी समता वर्णित है; और अंतम कहा है, कि यह वर्णन संपूर्ण वैदिक परंपराके अनुसार है, अतः इसे जिसने जान लिया, उसे वेदवेत्ता कहना चाहिये । इस प्रकार वैदिक वर्णन हो चुका; अब [ इसी वृक्षका दूसरे प्रकारसे अर्थात् सांख्यशास्त्रके अनुसार वर्णन करते हैं :-] ( २ ) उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपरभी फैली हुई हैं, कि जो ( सत्त्व आदि तीनों ) गुणोंसे पली हुई हैं, और जिनसे ( शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गंध-रूपी )