भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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८४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र


यह कल्पना अथवा रूपक न केवल वैदिक धर्ममेही है, कि प्रत्युत अन्य प्राचीन धर्मोंमेंभी पाया जाता है. एक बिलकुल छोटे-से बीजमे जिस प्रकार बड़ा भारी गगनचुंबी वृक्ष निर्माण हो जाता है, उसी प्रकार एक अव्यक्त परमेश्वरसे दृश्य-सृष्टिरूप भव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ है। यूरोपकी पुरानी भाषाओंमें इसके नाम 'विश्ववृक्ष' या 'जगद्वृक्ष' है। ऋग्वेदमे (१. २४. ७) वर्णन है, कि वरुण- लोकमें एक ऐसा वृक्ष है, कि जिसकी किरणोंकी जड़ ऊपर (ऊर्ध्व) है और उसकी किरणें ऊपरसे नीचे (निचीना) फैलती हैं। विष्णुसहस्रनाममें 'वारुणो वृक्षः' (वरुणके वृक्ष) को परमेश्वरके हज़ार नामोंमेंसे एकही नाम कहा है। यम और पितर जिस 'सुपलाश वृक्ष' के नीचे बैठकर सहपान करते हैं (ऋ. १०. १३५. १), अथवा जिसके "अग्रभागमें स्वादिष्ट पीपल है, और जिसपर दो सुपर्ण अर्थात् पक्षी रहते हैं" (ऋ. १. १६४. २०), या "जिस पिप्पलको (पीपल) वायुदेवता (मरुद्गण) हिलाते हैं" (ऋ. ५. ५४. १२), वह वृक्षभी यही है. अथर्ववेदमें जो यह वर्णन है, कि "देवसदन अश्वत्थ वृक्ष तीसरे स्वर्गलोकमें (वरुणलोकमें) है" (अथर्व ५. ४. ३; १९. ३९. ६), वहभी इसी वृक्षके संबंधमें जान पड़ता है। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें (३. ८. १२. २) अश्वत्थ शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है :- पितृयाण-कालमें अग्नि अथवा यज्ञप्रजापति देवलोकसे नष्ट होकर इस वृक्षमें अश्वका (घोड़े) रूप धरकर एक वर्षतक छिपा रहा था, इसीसे इस वृक्षका अश्वत्थ नाम हो गया (महा. अनु. ८५); और कई एक नैरुक्तिकोंका यहभी मत है, कि पितृयाणकी लंबी रात्रिमें सूर्यके घोड़े यमलोकमें इस वृक्षके नीचे विश्राम किया करते हैं, इसलिये इसको अश्वत्थ (अर्थात् घोड़ेका स्थान) नाम प्राप्त हुआ होगा। 'अ' = नहीं, 'श्व' = कल और 'त्थ' = स्थिर - यह आध्यात्मिक निरुक्ति पीछेकी कल्पना है। नामरूपा- त्मक मायाका स्वरूप जब कि विनाशवान् अथवा हरघड़ीमें पलटनेवाला है, तब उसको "कलतक न रहनेवाला" तो कह सकेंगे; परंतु 'अव्यय', अर्थात् जिसका कभीभी व्यय नहीं होता, विशेषण स्पष्ट कर देता है, कि यह अर्थ यहाँ अभिमत नहीं है। पहले पीपलके वृक्षकोही अश्वत्थ कहते थे, और कठोप- निषद्में (६. १) जो यह ब्रह्ममय अमृत अश्वत्थवृक्ष कहा गया है :- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ वहभी यही है; और 'ऊर्ध्वमूलमधःशाख' इस पद-सादृश्यसेही व्यक्त होता है, कि भगवद्गीताका वर्णन कठोपनिषदके वर्णनसेही लिया गया है। परमेश्वर स्वर्गमें है, और उससे उपजा हुआ जगद्वृक्ष नीचे अर्थात् मनुष्य-लोकमें है, अतः वर्णन किया गया है, कि इस वृक्षका मूल (अर्थात् परमेश्वर) ऊपर है; और इसकी अनेक शाखाएं अर्थात् जगतका फैलाव नीचे विस्तृत है। परंतु