भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 866, कुल 956 में से

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पृष्ठ 866

पंद्रहवाँ अध्याय ८२१ पंचदशोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ पंद्रहवाँ अध्याय [ क्षेत्रक्षेत्रज्ञके विचारके सिलसिलेमें तेरहवें अध्यायमें उसी क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- विचारके सदृश सांख्योंके प्रकृति-पुरुषका विवेक बतलाया है, और चौदहवें अध्यायमें कहा है, कि प्रकृतिके तीन गुणोंसे मनुष्य-मनुष्यमें स्वभाव-भेद कैसे उत्पन्न होता है और उससे सात्त्विक आदि गति-भेद क्योंकर होते हैं? फिर यह विवेचन किया है, कि त्रिगुणातीत अवस्था या अध्यात्म-दृष्टिसे ब्राह्मी स्थिति किसे कहते हैं और वह कैसे प्राप्त की जाती है। यह सब निरूपण सांख्योंकी भाषामें है अवश्य परंतु सांख्योंके द्वैतको स्वीकार न करते हुए, जिस एकही परमेश्वरकी विभूतियां प्रकृति और पुरुष दोनों हैं, उस परमेश्वरका ज्ञान-विज्ञान-दृष्टिसे निरूपण किया गया है। परमेश्वरके स्वरूपके इस वर्णनके अतिरिक्त आठवें अध्यायमें अधियज्ञ, अध्यात्म और अधिदैवत आदि भेद दिखलाये जा चुके हैं। और, यह पहलेही कह चुके हैं, कि सब स्थानोंमें एकही परमात्मा व्याप्त है, एवं क्षेत्रमें क्षेत्रज्ञभी वही है। अब इस अध्यायमें पहले यह बतलाते हैं, कि परमेश्वरकीही रची हुई सृष्टिके विस्तारका, अथवा परमेश्वरके नामरूपात्मक विस्तारकाही, कभी कभी वृक्षरूपसे या वनरूपसे जो वर्णन पाया जाता है, उसका बीज क्या है; फिर परमेश्वरके सभी रूपोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तमस्वरूपका वर्णन किया है ।] श्रीभगवानने कहा: (१) जिस अश्वत्थ वृक्षका ऐसा वर्णन करते हैं, कि जड़ (एक) ऊपर है, और शाखाएँ (अनेक) नीचे हैं, (जो) अव्यय अर्थात् कभी नाश नहीं पाता, (एवं) छन्दांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते हैं, उसे (वृक्षको) जिसने जान लिया, वह पुरुष (सच्चा), वेदवेत्ता (है)। | [ उक्त वर्णन ब्रह्मवृक्षका अर्थात् संसारवृक्षका है। यहाँपर संसारका यह | संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है, कि "स्त्री-बाल-बच्चोंमें रहकर नित्य व्यवहार | करते रहें", परंतु उसका यहाँ "आँखोंके सामने दिखाई देनेवाला जगत् अथवा | दृश्य-सृष्टि" अर्थ है। इस संसारकोही सांख्य-मतवादी "प्रकृतिका विस्तार" | और वेदान्ती "भगवान्‌की मायाका पसार" कहते हैं; एवं अनुगीतामे इसेही | "ब्रह्मवृक्ष या ब्रह्मवन" (ब्रह्मारण्य) कहा है (मभा. अश्व. ३५. ४३)।

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