श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ एकनिष्ठ भक्तियोगसे, मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणोंसे परे जाकर ब्रह्मभूत अवस्था पा लेनेमें समर्थ हो जाता है । | [ संभव है, इस श्लोकसे यह शंका हो, कि जब त्रिगुणातीत अवस्था | सांख्य-मार्गकी है, तब वही अवस्था कर्म-प्रधान भक्तियोगसे कैसे प्राप्त हो जाती | है ? इसीसे भगवान् कहते हैं :— ] (२७) क्योंकि, अमृत और अव्यय ब्रह्मका, शाश्वत धर्मका, एवं एकान्तिक अर्थात् परमावधिके अत्यंत सुखका अंतिम स्थान मैं ही हूँ । | [ इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि सांख्योंके द्वैतको छोड़ देनेपर सर्वत्र | एकही परमेश्वर रह जाता है, इस कारण उसीकी भक्तिसे त्रिगुणातीत | अवस्थाभी प्राप्त होती है । तथापि एकही परमेश्वर मान लेनेमे साधनोंके | संबंधमे गीताका कोईभी आग्रह नहीं है ( गीता १३. २४, २५) । गीतामें | भक्तिमार्गको सुलभ अतएव सब लोगोंके लिये ग्राह्य कहा है; यह कहींभी | नहीं कहा है, कि अन्यान्य मार्ग त्याज्य हैं । गीतामें केवल भक्ति, केवल ज्ञान | अथवा केवल योगही प्रतिपाद्य है, — ये मत भिन्न-भिन्न संप्रदायोंके अभिमानियोंने | पीछेसे गीतापर लाद दिये हैं । गीताका सच्चा प्रतिपाद्य विषय तो निरालाही | है : मार्ग कोईभी हो, गीताका मुख्य प्रश्न यही है, कि परमेश्वरका ज्ञान हो | चुकनेपर संसारके कर्म लोकसंग्रहार्थ किये जावे या छोड़ दिये जावें ? और | इसका साफ़ साफ़ उत्तर पहलेही दिया जा चुका है, कि कर्मयोग श्रेष्ठ है । ] इस प्रकार भगवानने गाये हुए – अर्थात् कहे हुए – उपनिषद्में, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग – अर्थात् कर्मयोग – शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवां अध्याय समाप्त हुआ ।