भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 864

चौदहवाँ अध्याय ८१९ समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकांचनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥ §§ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ चलविचल नहीं कर सकते; तो इतनाही मान कर स्थिर रहता है, कि गुण (अपना अपना) काम करते हैं; जो डिगता नहीं है अर्थात् विकार नहीं पाता है; (२४) जिसे सुख-दुःख एक-सेही हैं; जो स्व-स्थ है अर्थात् अपनेमेंही स्थिर हुआ; मिट्टी, पत्थर और सोना जिसे समानही हैं; प्रिय-अप्रिय, निंदा और अपनी स्तुति जिसे समसमान हैं; जो सदा धैर्यसे युक्त है; (२५) जिसे मान-अपमान या मित्र और शत्रुदल तुल्य हैं अर्थात् एक-से हैं; और (इस समझसे कि प्रकृति सब कुछ करती है) जिसके सब (काम्य) उद्योग छूट गये हैं, उस पुरुषको गुणातीत कहते हैं। | [ यह इन दो प्रश्नोंका उत्तर हुआ, कि त्रिगुणातीत पुरुषके लक्षण क्या | हैं, और उसका आचार कैसा होता है ? ये लक्षण, और दूसरे अध्यायमें बतलाये | हुए स्थितप्रज्ञके लक्षण (२. ५५-७२), एवं बारहवें अध्यायमें (१२. १३-२०) | बतलाये हुए भक्तिमान् पुरुषके लक्षण, सब एक-सेही हैं। अधिक क्या कहें ? | 'सर्वारंभपरित्यागी', 'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' और 'उदासीनः' प्रभृति कुछ | विशेषणभी दोनों या तीनों स्थानोंमें एकही हैं। इससे प्रकट होता है, कि पिछले | अध्यायमें बतलाये हुए (गीता १३. २४, २५) चार मागोंमेंसे किसीभी मार्गके | स्वीकारकर लेनेपरभी सिद्धि-प्राप्त पुरुषका आचार और उसके लक्षण सब मार्गोंमें | एकहीसे रहते हैं। तथापि पीछे तीसरे, चौथे और पांचवे आदि अध्यायोंमें जो यह | दृढ़ और अटल सिद्धान्त किया है, कि निष्काम कर्म किसीकेभी नहीं छूट सकते; | उसके अबाधित होनेसे, स्मरण रखना चाहिये, कि ये स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त या | त्रिगुणातीत, सभी कर्म-योगमार्गके हैं। 'सर्वारम्भपरित्यागी' का अर्थ १२ वें अध्यायके | १६ वें श्लोककी टिप्पणीमें बतला चुके हैं। सिद्धावस्थामें पहुँचे हुए पुरुषोंके इन | वर्णनोंको स्वतंत्र मान कर संन्यास-मार्गके टीकाकार अपनेही संप्रदायको गीतामें प्रति- | पाद्य बतलाते हैं। परंतु गीतारहस्यके ११ वें और १२ वें प्रकरणमें (पृ. ३२६-३२७ | और ३७६-३७७) हमने इस बातका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन कर दिया है, कि | यह अर्थ पूर्वापर संदर्भके विरुद्ध है; अतएव ठीक नहीं है। अर्जुनके दोनों प्रश्नोंके | उत्तर हो चुके। अब बतलाते हैं, कि ये पुरुष इन तीन गुणोंमें परे कैसे जाते हैं:-] (२६) और जो (मुझेही सब कर्म अर्पण करनेके) अव्यभिचार, अर्थात्