श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंद्रहवाँ अध्याय ८२९ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥ भूतोंको क्षर कहते हैं, और कूटस्थको, अर्थात् इन सब भूतोंके मूलमें (कूट) रहनेवाले को, ( कृतिरूप अव्यक्त तत्त्व ) अक्षर कहते हैं । ( १७ ) परंतु उत्तम पुरुष ( इन दोनोंसे ) भिन्न है । उसको परमात्मा कहते हैं । वही अव्यय ईश्वर त्रैलोक्यमें व्याप्त होकर ( त्रैलोक्यका ) पोषण करता है । ( १८ ) जब कि मैं क्षरसेभी परेका और अक्षरसेभी उत्तम ( पुरुष ) हूँ, लोक-व्यवहारमें और वेदोंमेंभी पुरुषोत्तम नामसे मैं प्रसिद्ध हूँ । | [ सोलहवें श्लोकके 'क्षर' और 'अक्षर' ये दो शब्द सांख्यशास्त्रके - | व्यक्त और अव्यक्त, अथवा व्यक्त-सृष्टि और अव्यक्त प्रकृति - इन दो शब्दोंके | समानार्थक हैं । प्रकट है, कि इनमेंसे क्षरही नाशवान् पंचभूतात्मक व्यक्त | पदार्थ है । परंतु स्मरण रहे, कि 'अक्षर' विशेषण पहले कई बार जब | परब्रह्मकोभी लगाया गया है ( गीता ८. ३ ; ८. २१ ; ११. ३७ ; १२. ३ ), | तब पुरुषोत्तमके उल्लिखित लक्षणमें 'अक्षर' शब्दका अर्थ अक्षर-ब्रह्म नहीं है, | किंतु उसका अर्थ सांख्योंकी अक्षर-प्रकृति है; और इस गड़बड़से बचानेके | लियेही सोलहवें श्लोकमें “ अक्षर अर्थात् कूटस्थ प्रकृति ” यह विशेष व्याख्या की | है ( गीतार.. प्र. ९, पृ. २०७-२०८ ) । सारांश, व्यक्त-सृष्टि और अव्यक्त- | प्रकृतिके परेका अक्षर-ब्रह्म ( गीता ८. २०-२२ पर हमारी टिप्पणी देखो ) . | और 'क्षर' ( व्यक्त-सृष्टि ) एवं 'अक्षर'से ( प्रकृति ) परेका पुरुषोत्तम, | वास्तवमे ये दोनों एकही हैं । तेरहवें अध्यायमें ( गीता १३. ३१ ) कहा गया | है, कि इसेही परमात्मा कहते हैं और यही परमात्मा शरीरमें क्षेत्रज्ञरूपसे | रहता है । इससे सिद्ध होता है, कि क्षर- अक्षर-विचारमे जो मूल तत्त्व अन्तमें | अक्षर-ब्रह्म निष्पन्न होता है, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविचारकाभी वही पर्यवसान है, अथवा | पिंडमें और ब्रह्मांडमें एकही पुरुषोत्तम है । इसी प्रकार यहभी बतलाया | गया है, कि अधिभूत और अधियज्ञ प्रभृतिका अथवा प्राचीन अश्वत्थ वृक्षका | भी तत्त्व यही है । इस ज्ञान-विज्ञान प्रकरणका अंतिम निष्कर्ष यह है, कि जिसने | जगत की इस एकताको जान लिया, और जिसके मनमें यह पहचान जिंदगी- | भरके लिये स्थिर हो गई ( वे सूत्र ४. १. १२; गीता ८. ६ ), कि " सब | भूतोंमें एक आत्मा है ” ( गीत ६. २९ ) वह कर्मयोगका आचरण करने | करतेही परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेता है । कर्म न करनेपर केवल परमेश्वर-