श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
८२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ § § द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ (१३) इसी प्रकार पृथ्वीमें प्रवेशकर, मैंही ( सब ) भूतोंको अपने तेजमे धारण करता हूँ, और रसात्मक सोम ( चंद्रमा ) हो कर सब ओषधियोंका अर्थात् वन- स्पतियोंका पोषण करता हूँ । | [ सोम शब्दके 'सोमवल्ली' और 'चंद्र', दोनों अर्थ है, और वेदोंमें वर्णन | है, कि चंद्र जिस प्रकार जलात्मक, अंशुमान और शुभ्र है, उसी प्रकार | सोमवल्लीभी है; और दोनोंकोभी ' वनस्पतियोंका राजा ' कहा है । तथापि | पूर्वापार संदर्भसे यहाँ चंद्रही विवक्षित है । इस श्लोकमें यह कहकर, कि चंद्रका | तेज मैंही हूँ, फिर इसी श्लोकमें बतलाया है, कि वनस्पतियोका पोषण करनेका | चंद्रका जो गुण है, वहभी मैंही हूँ । अन्य स्थानोंमेंभी ऐसे वर्णन हैं, कि जलमय | होनेसे चंद्रमे यह गुण है और इससे वनस्पतियोंकी बाढ़ होती है । ] (१४) मैं वैश्वानरूप अग्नि होकर प्राणियोंकी देहोंमें रहता हूँ, और प्राण एवं अपानसे युक्त होकर ( भक्ष्य, चोष्य, लेह्य और पेय ऐसे ) चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ । (१५) इसी प्रकार मैं सबके हृदयमे अधिष्ठित हूँ, स्मृति, और ज्ञान, एवं, अपोहन अर्थात् उनका नाश, मुझसेही होता है; तथा सब वेदोंसे जाननेयोग्य मैंही हूँ । वेदान्तका कर्ता और वेद जाननेवालाभी मैही हूँ । | [ इस श्लोकका दूसरा चरण कैवल्य उपनिषदमे ( कैं. २. ३ ) है, और | उसमें ' वेदैश्च सर्वैः 'के स्थानमें 'वेदैरनेकैः' इतनाही पाठभेद है । तब जिन्होंने | गीताकालमें 'वेदान्त' शब्दका प्रचलित होना न मानकर ऐसी दलीलें की हैं, | कि या तो यह श्लोकही प्रक्षिप्त होगा या इसके 'वेदान्त' शब्दका कुछ औरही | अर्थ लेना चाहिये, वे सब दलीलें बे-जड़-बुनियादकी हो जाती है । 'वेदान्त' | शब्द मुंडक (३. २. ६) और श्वेताश्वतर (६. २२) उपनिषदोंमें आया है, | तथा श्वेताश्वतरके कुछ मंत्र तो गीतामे हूबहू आ गये हैं । अब निरुक्ति- | पूर्वक पुरुषोत्तमका लक्षण बतलाते हैं :- ] (१६) (इस) लोकमें 'क्षर' और 'अक्षर', ये दो पुरुष हैं । सब ( नाशवान् )
पंद्रहवाँ अध्याय ८२९ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥ भूतोंको क्षर कहते हैं, और कूटस्थको, अर्थात् इन सब भूतोंके मूलमें (कूट) रहनेवाले को, ( कृतिरूप अव्यक्त तत्त्व ) अक्षर कहते हैं । ( १७ ) परंतु उत्तम पुरुष ( इन दोनोंसे ) भिन्न है । उसको परमात्मा कहते हैं । वही अव्यय ईश्वर त्रैलोक्यमें व्याप्त होकर ( त्रैलोक्यका ) पोषण करता है । ( १८ ) जब कि मैं क्षरसेभी परेका और अक्षरसेभी उत्तम ( पुरुष ) हूँ, लोक-व्यवहारमें और वेदोंमेंभी पुरुषोत्तम नामसे मैं प्रसिद्ध हूँ । | [ सोलहवें श्लोकके 'क्षर' और 'अक्षर' ये दो शब्द सांख्यशास्त्रके - | व्यक्त और अव्यक्त, अथवा व्यक्त-सृष्टि और अव्यक्त प्रकृति - इन दो शब्दोंके | समानार्थक हैं । प्रकट है, कि इनमेंसे क्षरही नाशवान् पंचभूतात्मक व्यक्त | पदार्थ है । परंतु स्मरण रहे, कि 'अक्षर' विशेषण पहले कई बार जब | परब्रह्मकोभी लगाया गया है ( गीता ८. ३ ; ८. २१ ; ११. ३७ ; १२. ३ ), | तब पुरुषोत्तमके उल्लिखित लक्षणमें 'अक्षर' शब्दका अर्थ अक्षर-ब्रह्म नहीं है, | किंतु उसका अर्थ सांख्योंकी अक्षर-प्रकृति है; और इस गड़बड़से बचानेके | लियेही सोलहवें श्लोकमें “ अक्षर अर्थात् कूटस्थ प्रकृति ” यह विशेष व्याख्या की | है ( गीतार.. प्र. ९, पृ. २०७-२०८ ) । सारांश, व्यक्त-सृष्टि और अव्यक्त- | प्रकृतिके परेका अक्षर-ब्रह्म ( गीता ८. २०-२२ पर हमारी टिप्पणी देखो ) . | और 'क्षर' ( व्यक्त-सृष्टि ) एवं 'अक्षर'से ( प्रकृति ) परेका पुरुषोत्तम, | वास्तवमे ये दोनों एकही हैं । तेरहवें अध्यायमें ( गीता १३. ३१ ) कहा गया | है, कि इसेही परमात्मा कहते हैं और यही परमात्मा शरीरमें क्षेत्रज्ञरूपसे | रहता है । इससे सिद्ध होता है, कि क्षर- अक्षर-विचारमे जो मूल तत्त्व अन्तमें | अक्षर-ब्रह्म निष्पन्न होता है, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविचारकाभी वही पर्यवसान है, अथवा | पिंडमें और ब्रह्मांडमें एकही पुरुषोत्तम है । इसी प्रकार यहभी बतलाया | गया है, कि अधिभूत और अधियज्ञ प्रभृतिका अथवा प्राचीन अश्वत्थ वृक्षका | भी तत्त्व यही है । इस ज्ञान-विज्ञान प्रकरणका अंतिम निष्कर्ष यह है, कि जिसने | जगत की इस एकताको जान लिया, और जिसके मनमें यह पहचान जिंदगी- | भरके लिये स्थिर हो गई ( वे सूत्र ४. १. १२; गीता ८. ६ ), कि " सब | भूतोंमें एक आत्मा है ” ( गीत ६. २९ ) वह कर्मयोगका आचरण करने | करतेही परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेता है । कर्म न करनेपर केवल परमेश्वर-
८३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ भक्तिसेभी मोक्ष मिल जाता है; परंतु गीताके ज्ञान-विज्ञान-निरूपणका वह तात्पर्य नहीं है। सातवें अध्यायके आरंभमेही कह दिया है, कि ज्ञान-विज्ञानके इस निरूपणका आरंभ यह दिखलानेके लियेही किया गया है, कि ज्ञानसे अथवा भक्तिसे शुद्ध हुई निष्काम बुद्धिके द्वारा संसारके सभी कर्म करने चाहिये, और उन्हें करते हुएही मोक्ष मिलता है। अब बतलाते हैं, कि इसे जान लेनेसे क्या फल मिलता है :- ] (१९) हे भारत ! इस प्रकार बिना मोहके जो मुझेही पुरुषोत्तम समझता है, वह सर्वज्ञ होकर सर्वभावसे मुझेही भजता है। (२०) हे निष्पाप भारत ! यह गुह्यसेभी गुह्यशास्त्र मैने बतलाया है। इसे जानकर ( मनुष्य) बुद्धिमान् अर्थात् बुद्ध या जानकार और कृतकृत्य हो जावेगा। [ यहाँ बुद्धिमानकाही 'बुद्ध अर्थात् जानकार' अर्थ है; क्योंकि भारत (शां. २४८. ११) में इसी अर्थमें 'बुद्ध' और 'कृतकृत्य' शब्द आये हैं। महा- भारतमें 'बुद्ध' शब्दका रूढार्थ 'बुद्धावतार' कहीभी नहीं आया है। (गीतार. परिशिष्ट पृ. ५६३ ) । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, पुरुषोत्तमयोग नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
सोलहवाँ अध्याय ८३१ षोडशोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ सोलहवाँ अध्याय । [ पुरुषोत्तमयोगसे क्षर-अक्षर-ज्ञानकी परमावधि हो चुकी; और सातवें अध्यायसे जिस ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ यह दिखलानेके किया गया था, कि कर्मयोगका आचरण करते रहनेसे परमेश्वरका ज्ञान होता है और उसीसे मोक्ष मिलता है, उसकी यहाँ समाप्ति हो चुकी और अब यहीं उसका उपसंहार करना चाहिये । परंतु नवें अध्यायमें (९. १२) भगवानने जो यह बिलकुल संक्षेपमें कहा था, कि राक्षसी मनुष्य मेरे अव्यक्त और श्रेष्ठ स्वरूपको नहीं पहचानते, उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये इस अध्यायका आरंभ किया गया है, अगले अध्यायमें इसका कारण बतलाया गया है, कि मनुष्य-मनुष्यमें भेद क्यों होते हैं और अठारहवें अध्यायमें पूरी गीताका उपसंहार है । ] श्रीभगवानने कहा :- (१) अभय (निडर), शुद्ध सात्त्विक वृत्ति, ज्ञान- योगव्यवस्थिति अर्थात् ज्ञान-(मार्ग) और (कर्म-)योगकी तारतम्यसे व्यवस्था, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय अर्थात् स्वधर्मके अनुसार आचरण, तप, सरलता, (२) अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग अर्थात् कर्मफलका त्याग, शांति, अपैशुन्य अर्थात् क्षुद्र- दृष्टि छोड़कर उदार भाव रखना, सब भूतोंमें दया, तृष्णा, मृदुता, न रखना (बुरे कामकी) लाज, अचापलता अर्थात् फिजूल कामोंका छूट जाना, (३) तेजस्विता, क्षमा, धृति, शुद्धता, द्रोह न करना, अतिमान न रखना - हे भारत ! (ये) गुण दैवी संपत्तिमें जन्मे हुए पुरुषोंको प्राप्त होते हैं । [ दैवी संपत्तिके ये छब्बीस गुण और तेरहवें अध्यायमें बतलाये हुए ज्ञानके लक्षण (गीता १३. ७-११) वास्तवमें एकही हैं; और इसीसे आगेके
। ८३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥ श्लोकमें 'अज्ञान' का समावेश आसुरी लक्षणोंमें किया गया है। यह नहीं कहा जा सकता, कि छब्बीस गुणोंकी इस सूचीके प्रत्येक शब्दका अर्थ दूसरे शब्दके अर्थसे सर्वथा भिन्न होगा; और हेतुभी ऐसा नहीं है। उदाहरणार्थ, कोई कोई अहिंसाकेही कायिक, वाचिक और मानसिक भेद करके, क्रोधसे किसीके दिल दुखा देनेकोभी एक प्रकारकी हिंसाही समझते हैं। इसी प्रकार शुद्धताकोभी विविध मान लेनेसे मनकी शुद्धिमें अक्रोध और द्रोह न करना आदि गुणभी आ सकते हैं। महाभारतके शांतिपर्वके १६० अध्यायसे लेकर १६३ अध्यायतक क्रमसे दम, तप, सत्य और लोभका विस्तृत वर्णन है, वहाँ दममेंही क्षमा, धृति, अहिंसा, सत्य, आर्जव, लज्जा आदि पच्चीस-तीस गुणोंका व्यापक अर्थमें समावेश किया है (मभा. शां. १६०); और सत्यके निरूपणमें (शां. १६२) कहा है, कि सत्य, समता, दम, अमात्सर्य, क्षमा, लज्जा, तितिक्षा, अनसूयता, याग, ध्यान, आर्यता (लोककल्याणकी इच्छा), धृति और दया, इन तेरह गुणोंका एक सत्यमेही समावेश होता है; और वहीं इन शब्दोंकी व्याख्याएँभी दी गई हैं। इस रीतिसे एक गुणमेंही अनेकोंका समावेश कर लेना पांडित्यका काम है; और प्रत्येक गुणका ऐसा विवेचन करने लगें, तो प्रत्येक गुणपर एक एक ग्रंथ लिखना पड़ेगा। ऊपरके श्लोकमें इन सब गुणोंका समुच्चय इसीलिये बतलाया गया है, कि उससे दैवी संपत्तिके सात्त्विक रूपकी पूरी कल्पना हो जावे; और यदि एक शब्दमें कोई अर्थ छूट गया हो, तो दूसरे शब्दमें उसका समावेश हो जावे। अस्तु; ऊपरकी सूचीके 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' शब्दका अर्थ हमने गीताके ४. ४१ और ४२ वें श्लोकके आधारपर कर्मयोगप्रधान किया है। त्याग और धृतिकी व्याख्याएँ स्वयं भगवान्नेही १८ वें अध्यायमें कर दी हैं (गीता १८. ६, २९)। यह बतला चुके, कि दैवी संपत्तिमें किन गुणोंका समावेश होता है; अब इसके विपरीत आसुरी या राक्षसी संपत्तिका वर्णन करते हैं:- ] (४) हे पार्थ! इसी प्रकार दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, पारुष्य अर्थात् निष्ठुरता और अज्ञान, आसुरी याने राक्षसी संपत्तिमें जन्मे हुएको ( प्राप्त होते हैं)। [महाभारतके शांतिपर्वके १६४ और १६५ वें अध्यायोंमें इनमेंसे कुछ दोषोंका वर्णन है, और अंतमें यहभी बतला दिया है, कि नृशंस किसे कहना चाहिये। इस श्लोकमें 'अज्ञान'को आसुरी संपत्तिका लक्षण कह देनेसे प्रकट होता है, कि 'ज्ञान' दैवी संपत्तिका लक्षण है। जगतमें पाये जानेवाले दो प्रकारके स्वभावोंका इस प्रकार वर्णन हो जानेपर:- ]
सोलहवाँ अध्याय ८३३ § § दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥ § § द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥ (५) (इनमेंसे) दैवी संपत्ति (परिणाममें) मोक्षदायक और आसुरी बंधनदायक मानी जाती है। हे पांडव ! तू दैवी संपत्तिमें जन्मा हुआ है। शोक मत कर । | [ संक्षेपमें यह बतला दिया, कि इन दो प्रकारके पुरुषोंको कौन-सी गति | मिलती है। अब आसुरी पुरुषोंका विस्तारसे वर्णन करते हैं :- ] (६) इस लोकमें दो प्रकारके प्राणी उत्पन्न हुआ करते हैं; (एक) दैव और दूसरे आसुर । (इनमेंसे) दैव (श्रेणीका) वर्णन विस्तारसे कर दिया। (अब) हे पार्थ, मैं आसुर (श्रेणीका) वर्णन करता हूँ, सुन। | [ कर्मयोगी कैसा बर्ताव करे और ब्राह्मी अवस्था कैसी होती है, या | स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त अथवा त्रिगुणातीत किसे कहना चाहिये, और ज्ञान क्या | है, इत्यादिकोंका पिछले अध्यायोंमें जो वर्णन है, और इस अध्यायके पहले | तीन श्लोकोंमें दैवी संपत्तिका जो वर्णन है, वही दैव-प्रकृतिके पुरुषका वर्णन | है, इसीसे कहा है, कि दैव श्रेणीका वर्णन पहले विस्तारसे कर चुके हैं। आसुर | संपत्तिका थोड़ा-सा उल्लेख नवे अध्यायमें (९. ११, १२) में आ चुका है; परंतु | वहाँका वर्णन अधूरा रह गया है, इस कारण उस अध्यायमें इसीको पूरा | करते हैं :- ] (७) आसुर लोग नही जानते, कि प्रवृत्ति क्या है और निवृत्ति क्या है - अर्थात् वे यह नहीं जानते, कि क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये; और उनमें न शुद्धता रहती है, न आचार और न सत्यही । (८) ये (आसुर लोग) कहते हैं, कि सारा जगत् असत्य है, अ-प्रतिष्ठ अर्थात् निराधार है, अनीश्वर याने बिना परमेश्वरका है, अ-परस्परसंभूत अर्थात् एक दूसरेके बिनाही हुआ है, (अतएव) कामको छोड़, अर्थात् मनुष्यकी विषयवासनाके अतिरिक्त, उसका और क्या हेतु हो सकता है ? गी. र. ५३
८३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र [ यद्यपि इस श्लोकका अर्थ स्पष्ट है, तथापि इसके पदोंका अर्थ करनेमें बहुत-कुछ मतभेद है। हम समझते हैं, कि यह वर्णन उन चार्वाक आदि नास्तिकोंके मतोंका है, कि जो वेदान्त या कापिल इन दोनों सांख्यशास्त्रके सृष्टिरचनाविषयक सिद्धान्तोंको नहीं मानते; और यही कारण है, कि इस श्लोकके पदोंका अर्थ सांख्य और अध्यात्मशास्त्रके सिद्धान्तोंके विरुद्ध है। जगतको नाशवान् समझ- कर वेदान्ती उसके अविनाशी सत्यको – 'सत्यस्य सत्यं' (बृ. २. ३. ६) – खोज निकालता है और उसी सत्य तत्त्वको जगतका मूल आधार या प्रतिष्ठा मानता है – "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" (तै. २. ५)। परंतु आसुरी लोग मानते हैं, कि यह जग असत्य है, अर्थात् इसमें सत्य नहीं है, और इसीलिये वे इस जगतको, अप्रतिष्ठभी कहते हैं, अर्थात् इसकी न प्रतिष्ठा है और न आधार। परंतु यहाँ यह शंका हो सकती है, कि इस प्रकार अध्यात्मशास्त्रमें प्रतिपादित अव्यक्त परब्रह्म यदि आसुरी लोगोंको संमत न हो, तोभी उन्हें भक्तिमार्गका व्यक्त ईश्वर मान्य होगा। इसीसे अनीश्वर (अन् + ईश्वर) इस तीसरे पदका प्रयोग करके कह दिया है, कि आसुरी लोग जगतमें ईश्वरकोभी नहीं मानते। जगतका कोई मूल आधार इस प्रकार न माननेसे उपनिषदोंमे वर्णित यह सृष्ट्युत्पत्तिक्रम छोड़ देना पड़ता है, कि "आत्मन. आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्यः अन्नं। अन्नात्पुरुषः।" (तै. २. १); अथवा सांख्यशास्त्रोक्त इस सृष्ट्युत्पत्तिक्रमकोभी छोड़ देना पड़ता है, कि प्रकृति और पुरुष, ये दो स्वतंत्र, मूल तत्त्व हैं, एवं सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंके अन्योन्य आश्रयमे अर्थात् परस्पर मिश्रणमे सब व्यक्त पदार्थ उत्पन्न हुए हैं। क्योंकि यदि इस श्रृंखला या परंपराको मान लें, तो दृश्य- सृष्टिके पदार्थोंके पीछे जानेसे इस जगतका कुछ-न-कुछ मूल तत्त्व मानना पड़ेगा। इसीमे आसुरी लोग जगतके पदार्थोंको अपरस्परसंभूत मानते हैं, अर्थात् वे यह नहीं मानते, कि ये पदार्थ एक दूसरेसे किसी न किसी क्रममे उत्पन्न हुए हैं। जगतकी रचनाके संबंधमे एक बार ऐसी समझ हो जानेपर मनुष्य प्राणीही प्रधान निश्चित हो जाता है और फिर यह विचार आप-ही- आप हो जाता है, कि मनुष्यकी कामवासनाको तृप्त करनेके लियेही जगतके सारे पदार्थ बने हैं, उनका और कुछभी उपयोग नहीं है; और यही अर्थ इस श्लोकके अंतके 'किमन्यत्कामहेतुकम्' – कामको छोड़ उसका और क्या हेतु होगा? – इन शब्दोंमे, एवं आगेके श्लोकमेंभी वर्णित है। कुछ टीका- कार 'अपरस्परसंभूत' पदका अन्वय 'किमन्यत्' पदसे लगाकर यह अर्थ करते हैं, कि "क्या ऐसाभी कुछ दीख पड़ता है, जो परस्पर अर्थात् स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न न हुआ हो? नहीं; और जब ऐसा पदार्थही नहीं
सोलहवाँ अध्याय ८३५ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥ काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्गृहीत्वाऽसद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥ | दीख पड़ता, तब यह जगत् कामहैतुक अर्थात् स्त्री-पुरुषोंकी कामेच्छासेही निर्मित | हुआ है।” एवं कुछ लोग 'अपरञ्च परञ्च' अपरस्परौ ऐसा अद्भुत विग्रह | करके इन्हीं पदोंका यह अर्थ लगाया करते हैं, कि “'अपरस्पर' ही स्त्री-पुरुष | हैं, इन्हींसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है, इसलिये स्त्री-पुरुषोंका कामही इसका हेतु | है, और कोई कारण नहीं है।” परंतु यह अन्वय सरल नहीं है, और 'अपरञ्च | परञ्च' का समास 'अपर-पर' होगा, बीचमें सकार न आने पावेगा । इसके | अतिरिक्त असत्य, अप्रतिष्ठ आदि पहले, आये हुए पदोंके देखनेसे तो यही ज्ञात | होता है कि अ-परस्परसंभूत नञ् समासही होना चाहिये; और फिर कहना | पड़ता है, कि सांख्यशास्त्रमें 'परस्परसंभूत' शब्दसे जो “गुणोंसे गुणोंका अन्योन्य | जन” वर्णित है, वही यहाँ विवक्षित है (गीतार. प्र. १७, पृ. १५८, १५९) | 'अन्योन्य' और 'परस्पर' ये दोनों शब्द समानार्थक हैं और सांख्यशास्त्रके गुणोंके | पारस्परिक झगड़ेका वर्णन करते समय ये दोनों शब्द आते हैं (मभा. | शां. ३०५; सां. का. १२, १३) । गीतापर जो माध्वभाष्य है, उसमें इसी | अर्थको मानकर यह दिखलानेके लिये, कि जगतकी वस्तुएँ एक दूसरीमें | कैसे उपजती हैं, गीताका यही श्लोक दिया गया है - “अन्नाद्भवन्ति भूतानि” | इत्यादि - (अग्निमें छोड़ी हुई आहुति सूर्यको पहुँचती है, अतः) यज्ञसे | वृष्टि, वृष्टिसे अन्न, और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है (गीता ३. १४; | मनु. ३. ७६) । परंतु तैत्तिरीय उपनिषदका वचन इसकी अपेक्षा अधिक | प्राचीन और व्यापक है, इस कारण उसीको हमने ऊपर प्रमाणमें दिया है। | तथापि हमारा मत है, कि गीताके इस 'अ-परस्परसंभूत' पदसे उपनिषदके | सृष्ट्युत्पत्तिक्रमकी अपेक्षा सांख्योक्त सृष्ट्युत्पत्तिक्रमही अधिक विवक्षित | है। जगतकी रचनाके विषयमें ऊपर जो आसुरी मत बतलाया गया है, | उसका इन लोगोंके बर्तावपर जो प्रभाव पड़ता है, उसका अब वर्णन | करते हैं। ऊपरके श्लोकके अंतमें जो 'कामहैतुक' पद है, उसीका यह अधिक | स्पष्टीकरण है। (९) इस प्रकारकी दृष्टिको स्वीकार करके ये अल्पबुद्धिवाले नष्टात्मा और दुष्ट लोग क्रूर कर्म करते हुए जगतका क्षय करनेके लिये उत्पन्न हुआ करते हैं; (१०) (और) कभीभी पूर्ण न होनेवाले कामका अर्थात् विषयोपभोगकी इच्छाका आश्रय करके, ये (आसुरी लोग) दंभ, मान और मदमे व्याप्त होकर मोहके कारण
८३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥ आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥ इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ झूठमूठ विश्वास अर्थात् मनमानी कल्पनाएँ करके गंदे काम करनेके लिये प्रवृत्त होते रहते हैं। (११) इसी प्रकार आमरणान्त ( सुख भोगनेकी ) अगणित चिंताओंसे ग्रसे हुए, कामोपभोगमे डूबे हुए और निश्चयपूर्वक उसीको सर्वस्व माननेवाले, (१२) सैकड़ो आशा-पाशोंमे जकड़े हुए, कामक्रोधपरायण होते हुए ( ये आसुरी लोग ) सुख लूटने के लिये अन्यायसे बहुत-सा अर्थ-संचय करनेकी तृष्णा करते हैं। (१३) मैंने आज यह पा लिया, (कल) उस मनोरथको सिद्ध करूँगा; यह धन ( मेरे पास ) है, और फिर वहभी मेरा होगा; (१४) इस शत्रुको मैंने मार लिया, एक औरोंकोभी मारूँगा; मैं ईश्वर. मैं (ही) भोग करनेवाला, मैं सिद्ध, बलाढ्य और सुखी हूँ, (१५) मैं संपन्न और कुलीन हूँ, मेरे समान और है कौन ? मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, मैं मौज करूँगा - इस प्रकार अज्ञानसे मोहित; (१६) अनेक प्रकारकी कल्पनाओंमें भूले हुए, मोहके फंदेमें फंसे हुए और विषयोपभोगमें आसक्त ( ये आसुरी लोग ) अपवित्र नरकमें गिरते हैं ! (१७) आत्मप्रशंसा करनेवाले, ऐंठमे बर्तनेवाले, और धन और मानके मदसे संयुक्त, ये (आसुरी) लोग दंभसे शास्त्रविधि छोड़कर केवल नामके
सोलहवाँ अध्याय ८३७ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥ तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥ आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ § § त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥ एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥ § § यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥ लिये यज्ञ किया करते हैं । (१८) अहंकारसे, बलसे, दर्पसे, कामसे और क्रोधसे फूल- कर, अपनी और पराई देहमें वर्तमान मेरा (परमेश्वरका) द्वेष करनेवाले, (और) निंदक, (१९) अशुभ कर्म करनेवाले (इन) द्वेषी और क्रूर अधम नरोंको मैं (इस) संसारकी आसुरी अर्थात् पाप-योनियोंमेंही सदैव पटकता रहता हूँ । (२०) हे कौंतेय ! (इस प्रकार) जन्म-जन्ममें आसुरी योनिकोही पाकर, ये मूर्ख लोग मुझे बिना पायेही अंतमें अत्यंत अधोगतिको जा पहुँचते हैं । | [आसुरी लोगोंका और उनको मिलनेवाली गतियोंका वर्णन हो चुका । | अब बतलाते हैं, कि इससे छुटकारा कैसे पावे ।-] (२१) काम, क्रोध और लोभ, ये तीन प्रकारके नरकके द्वार हैं, और ये हमारा नाशकर डालते हैं; इसलिये इन तीनोंका त्याग करना चाहिये । (२२) हे कौंतेय ! इन तीन तमोद्वारोंसे छूटकर, मनुष्य वही आचरण करने लगता है, जिसमें उसका कल्याण हो; और फिर उत्तम गति पा जाता है । | [प्रकट है, कि नरकके तीनो दरवाजे छूट जानेपर मद्गति मिलनीही | चाहिये; किंतु यह नहीं बतलाया, कि कौन-सा आचरण करनेसे वे छूट जाते | हैं । अतः अब उसका मार्ग बतलाते हैं ।-] (२३) जो शास्त्रोक्त विधि छोड़कर मनमाना बर्ताव करने लगता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख मिलता है और न उत्तम गतिभी मिलती है ।
८३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ (२४) इसलिये कार्य-अकार्यव्यवस्थितिका अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय करनेके लिये तुझे शास्त्रोंको प्रमाण मानना चाहिये; और शास्त्रोंमें जो कुछ कहा है, उसको समझकर, तदनुसार इस लोकमें कर्म करना तुझे उचित है । | [ इस श्लोकके 'कार्याकार्यव्यवस्थिति' पदसे स्पष्ट होता है, कि कर्तव्य- | शास्त्रकी अर्थात् नीतिशास्त्रकी कल्पनाको दृष्टिके आगे रख कर गीताका उपदेश | किया गया है। गीतारहस्यमें (प्र. २, पृ. ४८-५१) स्पष्टकर दिखला दिया है, | कि इसीको कर्मयोगशास्त्र कहते हैं । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, दैवासुरसम्पद्विभागयोग नामक सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
सत्रहवाँ अध्याय ८३९ सप्तदशोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ सत्रहवाँ अध्याय [ यहाँतक इस बातका वर्णन हुआ, कि कर्मयोगशास्त्रके अनुसार संसारका धारण-पोषण करनेवाले पुरुष किस प्रकारके होते हैं ? और इसके विपरीत, संसारका नाश करनेवाले मनुष्य किस ढंगके होते हैं ? अब यह प्रश्न सहजही होता है, कि मनुष्य-मनुष्यमें इस प्रकारके भेद होते क्यों हैं ? इस प्रश्नका साधारण उत्तर सातवेंही अध्यायके “ प्रकृत्या नियताः स्वया ” – अपना अपना प्रकृति-स्वभावपदोंमें दिया गया है ( गीता ७. २० ) । परन्तु वहाँ सत्त्व, रज और तम, गुणोंका विवेचन नहीं किया गया था, अतएव वहाँ इस प्रकृतिजन्य भेदकी उपपत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णनभी न हो सका । यही कारण है जो चौदहवें अध्यायमें त्रिगुणोंका विवेचन किया गया है, और अब इस अध्यायमें वर्णन किया गया है, कि त्रिगुणोंसेही उत्पन्न होनेवाली श्रद्धा आदिकेभी स्वभावभेद क्योंकर होते हैं और फिर इसी अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानका संपूर्ण निरूपण समाप्त किया गया है, इसी प्रकार नवें अध्यायके भक्ति-मार्गके अनेक भेदोंका कारणभी इस अध्यायकी उपपत्तिसे समझमें आ जाता है ( गीता ९. २३, २४ ) । पहले अर्जुन यों पूछता है, कि :- ] अर्जुनने कहा :- (१) हे कृष्ण ! जो लोग, श्रद्धासे युक्त होकरभी, शास्त्र- निर्दिष्ट विधिको छोड़करके यजन करते हैं, उनकी निष्ठा अर्थात् ( मनकी ) स्थिति कैसी है – सात्त्विक है, या राजस है, या तामस ? । [ पिछले अध्यायके अंतमें जो यह कहा था, कि शास्त्रकी विधिका अथवा । नियमोंका पालन अवश्य करना चाहिये; उसीपर अर्जुनने यह शंका की है । । शास्त्रोंपर श्रद्धा रखते हुएभी मनुष्य अज्ञानसे भूल कर बैठता है । उदाहरणार्थ, । शास्त्रविधि यह है, कि सर्वव्यापी परमेश्वरका भजन-पूजन करना चाहिये; । परंतु वह इसे छोड़कर देवताओंकीही धुनमें लग जाता है ( गीता ९.२३ ) । । अतः अर्जुनका प्रश्न है, कि ऐसे पुरुषकी निष्ठा अर्थात् अवस्था अथवा स्थिति । कौनसी समझी जावे । यह प्रश्न उन आसुरी लोगोंके विषयमें नहीं है, कि जो । शास्त्रका और धर्मका अश्रद्धापूर्वक तिरस्कार किया करते हैं । तोभी इस अध्यायमें । प्रसंगानुसार उनके कर्मोंके फलोंकाभी वर्णन किया गया है । ]
८४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥ यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ श्रीभगवानने कहा :- (२) प्राणिमात्रकी यह श्रद्धा स्वभावतः तीन प्रकारकी होती है; सात्त्विक, राजस और तामस । उनका वर्णन सुन । (३) हे भारत ! सब लोगोंकी श्रद्धा अपने अपने सत्त्वके अनुसार अर्थात् प्रकृतिस्वभावके अनुसार होती है । मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा ( रहती ) है, वैसाही वह होता है । [ दूसरे श्लोकके 'सत्त्व' शब्दका अर्थ देहस्वभाव, बुद्धि अथवा अंतः- करण है । कठोपनिषद्में 'सत्त्व' शब्द इसी अर्थमें आया है ( कठ. ६. ७), और वेदान्त-सूत्रके शांकरभाष्यमेंभी 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' पदके स्थानमें 'सत्त्व-क्षेत्रज्ञ' पदका उपयोग किया गया है (वे. सू. शां. भा. १. २. १२ ) । तात्पर्य यह है, कि दूसरे श्लोकका 'स्वभाव' शब्द और तीसरे श्लोकका 'सत्त्व' शब्द दोनों यहाँ, समानार्थक हैं । क्योंकि सांख्य और वेदान्त इन दोनोंकोभी यह सिद्धान्त मान्य है, कि स्वभावका अर्थ प्रकृति है और इस प्रकृतिसे बुद्धि एवं अंतःकरण उत्पन्न होते हैं। “यो यच्छ्रद्धः स एव सः” - यह तत्त्व “देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवताओंको पाते हैं” प्रभृति पूर्व-वर्णित सिद्धान्तोंकाही साधारण अनुवाद है (गीता ७. २०- २३ ; ९. २५ ), और इस विषयका विवेचन हमने गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें किया है (गीतार. पृ. ४२३-४२९ ) । तथापि जब यह कहा, कि जिसकी जैसी बुद्धि हो, उसे वैसा फल मिलता है, और इस बुद्धिका होना या न होना प्रकृति-स्वभावके अधीन है; तब प्रश्न होता है, कि फिर इस बुद्धि क्योंकर सुधर सकती है ? इसका यह उत्तर है, कि आत्मा स्वतंत्र है, अतः देहका यह स्वभाव क्रमशः अभ्यास और वैराग्यके द्वारा धीरे धीरे बदला जा सकता है। इस बातका विवेचन गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें किया गया है (पृ. २८०-२८१ ) । अभी तो यही देखना है, कि श्रद्धाके भेद क्यों और कैसे होते हैं ? इसीसे कहा गया है, कि प्रकृति-स्वभावानुसार श्रद्धा बदलती है । अब बतलाते हैं, कि जब प्रकृतिभी सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे युक्त है, तब प्रत्येक मनुष्यमें श्रद्धाकेभी त्रिधा भेद किस प्रकार उत्पन्न होते हैं, और उनके परिणाम क्या होते हैं :- ] (४) जो पुरुष सात्त्विक हैं, अर्थात् जिनका स्वभाव सत्त्वगुण-प्रधान है, वे देवताओंका
सत्रहवाँ अध्याय ८४१ § § अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥ कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥ यजन करते हैं; राजस पुरुष यक्षों और राक्षसोंका यजन करते हैं, एवं इनके अतिरिक्त जो तामस पुरुष हैं, वें प्रेतों और भूतोंका यजन करते हैं। । [ इस प्रकार शास्त्रपर श्रद्धा रखनेवाले मनुष्योंकेभी सत्त्व आदि प्रकृतिके । गुण-भेदोंसे जो तीन भेद होते हैं, उनका और उनके स्वरूपोंका वर्णन हुआ। । अब बतलाते हैं, कि शास्त्रपर श्रद्धा न रखनेवाले कामपरायण और दांभिक । लोग किस श्रेणीमें आते हैं। यह तो स्पष्ट है, कि ये लोग सात्त्विक नहीं हैं; परंतु । ये निरे तामसभी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि यद्यपि इनके कर्म शास्त्रविरुद्ध । होते हैं, तथापि इनमें कर्म करनेकी प्रवृत्ति होती है और प्रवृत्ति रजोगुणका धर्म । है। तात्पर्य यह है, कि ऐसे मनुष्योंको न सात्त्विक कह सकते हैं, न राजस और । न तामसभी। अतएव, दैवी और आसुरी नामक दो भिन्नही श्रेणियाँ बनाकर उक्त । दुष्ट पुरुषोंका आसुरी श्रेणीमें समावेश किया जाता है। यही अर्थ अगले दो । श्लोकोंमें स्पष्ट किया गया है।] (५) (परंतु) जो लोग दंभ और अहंकारसे युक्त होकर, काम एवं आसक्तिके बलपर, शास्त्रके विरुद्ध घोर तप किया करते हैं, (६) तथा जो न केवल शरीरके पंचमहाभूतादिकोंके समूहकोही, वरन् शरीरके अन्तर्गत रहनेवाले मुझकोभी कष्ट देते हैं, उन्हें अविवेकी आसुरी बुद्धिके जान । । [ इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नोंके उत्तर हुए। इन श्लोकोंका भावार्थ यह । है, कि मनुष्यकी श्रद्धा उसके प्रकृतिस्वभावानुसार सात्त्विक, राजस अथवा तामस । हो सकती है; और उसके अनुसार उसके कर्मोंमें अन्तर होता है, तथा अपने कर्मोंके । अनुरूपही उसे पृथक् पृथक् गति प्राप्त होगी। परंतु केवल इतनेसेही कोई आसुरी । श्रेणीमें नहीं गिना जाता । आत्माकी स्वाधीनताका उपयोगकर और शास्त्रा- । नुसार आचरण करके प्रकृति-स्वभावको धीरे धीरे सुधारते जाना प्रत्येक । मनुष्यका कर्तव्य है। हाँ, जो ऐसा नहीं करते और दुष्ट प्रकृति-स्वभावकाही । अभिमान रखकर शास्त्रके विरुद्ध आचरण करते हैं, उन्हें आसुरी बुद्धिके कहना । चाहिये। अब यह वर्णन करते हैं, कि श्रद्धाके समानही आहार, यज्ञ, तप और । दानके सत्त्व, रज, तममय प्रकृतिके गुणोंसे भिन्न-भिन्न भेद कैसे हो जाते हैं, एवं । इन भेदोंसे स्वभावकी विचित्रताके साथ-ही-साथ क्रियाकी विचित्रताभी कैसे । उत्पन्न होती है :- ]
८४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥ आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥ यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ § § अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥ (७) प्रत्येककी रुचिका आहारभी तीन प्रकारका होता है। और यही अवस्था यज्ञ, तप एवं दानकीभी है। सुन, उनका भेद बतलाता हूँ। (८) आयु, सात्त्विक वृत्ति, बल, आरोग्य, सुख और प्रीतिकी वृद्धि करनेवाले, रसीले, स्निग्ध, शरीरमें भिदकर चिरकालतक रहनेवाले और मनको आनंददायक आहार सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं। (९) कटु अर्थात् चरपरे, खट्टे, खारे, अत्युष्ण, तीखे, रूखे, दाहकारक तथा दुःख, शोक और रोग उपजानेवाले आहार राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं। | [ संस्कृतमें कटु शब्दका अर्थ चरपरा और तिक्तका अर्थ कडुआ होता | है। इसीके अनुसार संस्कृतके वैद्यक ग्रंथोंमें काली मिर्च कटु तथा नींब तिक्त | कही गई है (वाग्भट-सूत्र, अ. १०) हिंदीके कडुआ और तीखा शब्द क्रमानुसार | कटु और तिक्त शब्दोंकेही अपभ्रंश हैं ।] (१०) कुछ काल रखा हुआ अर्थात् ठंडा, नीरस, दुर्गंधित, बासा, जूठा तथा अपवित्र भोजन तामस पुरुषको रुचता है। | [ सात्त्विक मनुष्यको सात्त्विक, राजसको राजस तथा तामसको तामस | भोजन प्रिय होता है, इतनाही नहीं, यदि आहार शुद्ध अर्थात् सात्त्विक हो, तो | मनुष्यकी वृत्तिभी क्रम-क्रमसे शुद्ध या सात्त्विक हो सकती है। उपनिषदोंमें कहा | है, कि "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" (छां. ७. २६. २)। क्योंकि मन और | बुद्धि प्रकृतिके विकार हैं, इसलिये जहाँ सात्त्विक आहार हुआ, वहाँ बुद्धिभी | आप-ही-आप सात्त्विक बन जाती है। ये आहारके भेद हुए। इसी प्रकार अब | यज्ञके तीन भेदोंकाभी वर्णन करते हैं :-] (११) फलाशाकी आकांक्षा छोड़कर, अपना कर्तव्य समझ करके शास्त्रकी
सत्रहवाँ अध्याय ८४३ अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥ विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥ § § देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥ मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ विधिके अनुसार, शांत चित्तसे जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है। (१२) परंतु हे भरतश्रेष्ठ ! उसको राजस यज्ञ समझ, कि जो फलकी इच्छासे अथवा दंभके हेतु अर्थात् ऐश्वर्य दिखलानेके लियेभी किया जाता है। (१३) शास्त्र- विधिरहित, अन्नदानविहीन, बिना मंत्रोंका, बिना दक्षिणाका और श्रद्धासे शून्य यज्ञ तामस यज्ञ कहलाता है। | [ आहार और यज्ञके समान तपकेभी तीन भेद हैं। पहले, तपके कायिक, | वाचिक और मानसिक, ये भेद किये हैं; फिर इन तीनोंमेंसे प्रत्येककी सत्त्व, रज | और तम गुणोंमे जो विविधता होती है, उसका वर्णन किया है। यहाँपर, तप | शब्दसे यह संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है, कि जंगलमें जाकर पातंजलयोगके | अनुसार शरीरको कष्ट दिया करें; किंतु मनुका किया हुआ 'तप' शब्दका यह | व्यापक अर्थही गीताके निम्नलिखित श्लोकोंमे अभिप्रेत है, कि यज्ञायाग आदि | कर्म, वेदाध्ययन, अथवा चातुर्वर्ण्यके अनुसार जिसका जो कर्तव्य हो – जैसे | क्षत्रियका कर्तव्य युद्ध करना है और वैश्यका व्यापार इत्यादि – वह सब उसका | तपही है ( मनु. ११. २६३ )। (१४) देवता, ब्राह्मण, गुरु और विद्वानोंकी पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसाको शरीर अर्थात् कायिक तप कहते हैं। (१५) (मनको) उद्विग्न न करनेवाले, सत्य, प्रिय और हितकारक संभाषणको, तथा स्वाध्याय अर्थात् अपने कर्मके अभ्यासको, वाङ्मय (वाचिक) तप कहते हैं। (१६) मनको प्रसन्न रखना, सौम्यता, मौन अर्थात् मुनियोंके समान वृत्ति रखना, मनोनिग्रह और शुद्ध भावना – इनको मानस तप कहते हैं।
८४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥ सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ § § दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥ अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ [ जान पड़ता है, कि पंद्रहवें श्लोकके सत्य, प्रिय और हित, तीनों शब्द मनुके इस वचनको लक्ष्यकर कहे गये हैं :- “ सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥” (मनु. ४. १३८) - यह सनातन धर्म है, कि सच और मधुर बोलना चाहिये; परंतु अप्रिय सच न बोलना चाहिये । तथापि महाभारतमेंही विदुरने दुर्योधनसे कहा है, कि “ अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ” (मभा. सभा. ६३. १७) । अब फिर कायिक, वाचिक और मानसिक तपोंके जो भेद होते हैं, वे यों हैं :- ] (१७) इन तीनों प्रकारके तपोंको यदि मनुष्य फलकी आकांक्षा न रखकर उत्तम श्रद्धासे तथा योगयुक्त बुद्धिसे करे, तो वे सात्त्विक कहलाते हैं; (१८) और जो तप अपने सत्कार, मान या पूजाके लिये, अथवा दंभसे, किया जाता है, वह चंचल और अस्थिर तप शास्त्रोंमें राजस कहा जाता है । (१९) मूढ़ आग्रहसे, स्वयं कष्ट उठाकर, अथवा (जारण-मारण आदि कर्मोंके द्वारा) दूसरोंको सतानेके हेतुसे किया हुआ तप तामस कहलाता है । [ये तपके भेद हुए; अब दानके विविध भेद बतलाते हैं :- ] (२०) वह दान सात्त्विक कहलाता है, कि जो कर्तव्य-बुद्धिसे किया जाता है, जो (योग्य) स्थल, काल और पात्रका विचार करके किया जाता है, एवं जो अपने ऊपर प्रत्युपकार न करनेवालेको दिया जाता है। (२१) परन्तु (किये हुए) उपकारके बदलेमें, अथवा किसी फलकी आशा रख, बड़ी कठिनाईसे आगे, जो दान दिया जाता है, वह राजस दान है। (२२) अयोग्य स्थानमें, अयोग्य कालमें,
सत्रहवाँ अध्याय ८४५ ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥ अपात्र मनुष्यको, बिना सत्कारके, अथवा अवहेलनापूर्वक, जो दान दिया जाता है, वह तामस दान कहलाता है। [ आहार, यज्ञ, तप और दानके समानही ज्ञान, कर्म, कर्त्ता, बुद्धि, धृति और सुखकी विविधताका वर्णन अगले अध्यायमे किया गया है ( गीता १८. २०-३९) इस अध्यायका गुणभेद-प्रकरण यहीं समाप्त हो चुका । अब ब्रह्म- निर्देशके आधारपर उक्त सात्त्विक कर्मकी श्रेष्ठता और संग्राह्यता सिद्ध की जावेगी। क्योंकि, उपर्युक्त संपूर्ण विवेचनपर सामान्यतः यह शंका हो सकती है, कि कर्म सात्त्विक हो, या राजस, या तामस, कैसाभी क्यों न हो ? है तो वह दुःखकारक और दोषमय ही; इस कारण इन सारे कर्मोंका त्याग किये बिना ब्रह्मप्राप्ति नहीं हो सकती; और यदि यह बात सत्य है, तो फिर कर्मके सात्त्विक, राजस आदि भेद करनेसे लाभही क्या है? इन आक्षेपपर गीताका यह उत्तर है, कि कर्मके सात्त्विक, राजस और तामस भेद परब्रह्मसे अलग नहीं हैं। जिस संकल्पमें ब्रह्मका निर्देश किया गया है, उसीमें सात्त्विक कर्मोंका और सत्कर्मोंका समावेश होता है, और इससे निर्विवाद सिद्ध है, कि ये कर्म अध्यात्म-दृष्टिसेभी त्याज्य नहीं है (गीतार. प्र. ९, पृ. २६६-२४७) । परब्रह्मके स्वरूपका मनुष्यको जो कुछ ज्ञान हुआ है, वह सब 'ॐ तत्सत्' इन तीन शब्दोंके निर्देशमें ग्रथित है। इनमेंसे ॐ अक्षर-ब्रह्म है, और उपनिषदोंमे उसका भिन्न-भिन्न अर्थ किया गया है ( प्रश्न ५; कठ. १५-१७; तै. १. ८; छां. १. १; मैत्र्यु. ६. ३, ८; मांडूक्य १-१२ ) । और जब यह वर्णाक्षररूपी ब्रह्मही जगतके आरंभमें था, तब सब क्रियाओका आरंभ वहींसे होता है। 'तत् = वह' शब्दका अर्थ है सामान्य कर्मसे परेका कर्म, अर्थात् निष्काम बुद्धिसे फलाशा छोड़कर किया हुआ सात्त्विक कर्म; और 'सत्'का अर्थ वह कर्म है, कि जो यद्यपि फलाशामहित हो, तोभी शास्त्रानुसार किया गया हो और शुद्ध हो - यही उक्त संकल्पका अर्थ है; और इस अर्थके अनुसार निष्काम बुद्धिसे किये हुए सात्त्विक कर्मकाही नहीं, वरन् शास्त्रानुसार किये हुए सत् कर्मकाभी परब्रह्मके सामान्य और सर्वमान्य संकल्पमें समावेश होता है; अतएव इन कर्मोंको त्याज्य कहना अनुचित है। अंतमें 'तत्' और 'सत्' कर्मोंके अतिरिक्त 'असत्' अर्थात् बुरा कर्म बच जाता है। परंतु अंतिम श्लोकमें सूचित किया है, कि वह दोनों लोकोंमें गर्ह्य माना गया है, इस कारण उस कर्मका इस संकल्पमें समावेश नहीं होता । भगवान् कहते हैं कि :- ] (२३) (शास्त्रमें) परब्रह्मका निर्देश 'ॐ तत्सत्' यों तीन प्रकारसे किया जाता है। इसी निर्देशसे पूर्वकालमें ब्राह्मण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं।
८४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥ तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५ ॥ सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥ यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥ [ पहलेही कह चुके हैं, कि संपूर्ण सृष्टिके आरंभमें ब्रह्मदेवरूपी पहला ब्राह्मण, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए हैं ( गीता ३. १० )। परंतु ये सब जिस परब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, उस परब्रह्मका स्वरूप 'ॐ तत्सत्' इन तीन शब्दोंमें है। अतएव इस श्लोकका यह भावार्थ है, कि 'ॐ तत्सत्' संकल्पही सार्ग सृष्टिका मूल है। अब इस संकल्पके तीनों पदोंका कर्मयोगकी दृष्टिसे पृथक् निरूपण करते हैं :- ] (२४) तस्मात् अर्थात् जगतका आरंभ इस संकल्पसे हुआ है, इस कारण, ब्रह्मवादी लोगोंके यज्ञ, दान, तप तथा अन्य शास्त्रोक्त कर्म सदा इस ॐ के उच्चारके साथ हुआ करते हैं ( २५ ) 'तत्' शब्दके उच्चारणसे फलकी आशा न रखकर, मोक्षार्थी लोग यज्ञ, दान, तप आदि अनेक प्रकारकी क्रियाएँ किया करते हैं। ( २६ ) अस्तित्व और साधुता अर्थात् भलाईके अर्थमें 'सत्' शब्दका उपयोग किया जाता है; और हे पार्थ ! इसी प्रकार प्रशस्त अर्थात् अच्छे कर्मोंके लियेभी 'तत्' शब्द प्रयुक्त होता है। ( २७ ) यज्ञ, तप और दानमें स्थिति अर्थात् स्थिर भावना रखनेकोभी 'सत्' कहते हैं; तथा इनके निमित्त जो कर्म करना हो, उस कर्मका नामभी 'सत्' ही है। [ यज्ञ, तप और दान मुख्य धार्मिक कर्म हैं; तथा इनके निमित्त जो कर्म किया जाता है, उसीको मीमांसक लोग सामान्यतः यथार्थ कर्म कहते हैं। इन कर्मोंको करते समय यदि फलकी आशा हो, तोभी वह धर्मके अनुकूल रहती है, इस कारण ये कर्म 'सत्' की श्रेणीमें गिने जाते हैं और सब निष्काम कर्म 'तत् = वह अर्थात् परेका' की श्रेणीमें लेखे जाते हैं। प्रत्येक कर्मके आरंभमें जो यह 'ॐ तत्सत्' ब्रह्मसंकल्प कहा जाता है, उसमें इस प्रकारसे इन दोनों कर्मोंका समावेश होता है, इसलिये इन दोनों कर्मोंको ब्रह्मानुकूलही समझना चाहिये। ( गीतार. प्र. ९, पृ. २५० ) । अब असत् कर्म विषयमें कहते हैं :- ]
सत्रहवाँ अध्याय ८४७ § § अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।। ( २८ ) अश्रद्धासे जो हवन किया हो, ( दान ) दिया हो, तप किया हो या जो कुछ (कर्म) किया हो, वह 'असत्' कहा जाता है। हे पार्थ ! वह (कर्म) न मरनेपर (परलोकमें) और न इस लोकमें हितकारी होता है। [ तात्पर्य यह है, कि ब्रह्मस्वरूपके बोधक इस सर्वमान्य संकल्पमेंही निष्काम बुद्धिसे, अथवा केवल कर्तव्य समझकर, किये हुए सात्त्विक कर्मका, और शास्त्रानुसार सद्बुद्धिसे किये हुए प्रशस्त कर्म अथवा सत्कर्मका समावेश होता है। अन्य सब कर्म वृथा हैं। इससे सिद्ध होता है, कि उस कर्मको छोड़ देनेका उपदेश करना उचित नहीं है, कि जिस कर्मका ब्रह्मनिर्देशमेंही समावेश होता है, और जो कर्म ब्रह्मदेवके साथही उत्पन्न हुआ है (गीता ३. १०), तथा जो किसीसेभी छूट नहीं सका है। 'ॐ तत्सत्' रूपी ब्रह्मनिर्देशके उक्त कर्मयोग- प्रधान अर्थको इसी अध्यायमें कर्मविभागके साथही बतलानेका हेतुभी यही है। क्योंकि केवल ब्रह्मस्वरूपका वर्णन तो पीछे तेरहवें अध्यायमें और उसके पहलेभी हो चुका है। गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें (पृ. २५०) बतला चुके हैं, कि "ॐ तत्सत् पदका असली अर्थ क्या होना चाहिये" आजकल 'सच्चिदानन्द' पदसे ब्रह्मनिर्देश करनेकी प्रथा हे। परंतु उसको स्वीकार न करके यहाँ जब इस 'ॐ तत्सत्' ब्रह्मनिर्देशकाही उपयोग किया गया है, तब इससे यह अनुमान निकल सकता है, कि 'सच्चिदानन्द' पदरूपी ब्रह्मनिर्देश गीता-ग्रंथके निर्मित हो चुकनेपर साधारण ब्रह्मनिर्देशके रूपसे प्रायः प्रचलित हुआ होगा । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, श्रद्धात्रयविभागयोग नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।