भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 886

सत्रहवाँ अध्याय ८४१ § § अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥ कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥ यजन करते हैं; राजस पुरुष यक्षों और राक्षसोंका यजन करते हैं, एवं इनके अतिरिक्त जो तामस पुरुष हैं, वें प्रेतों और भूतोंका यजन करते हैं। । [ इस प्रकार शास्त्रपर श्रद्धा रखनेवाले मनुष्योंकेभी सत्त्व आदि प्रकृतिके । गुण-भेदोंसे जो तीन भेद होते हैं, उनका और उनके स्वरूपोंका वर्णन हुआ। । अब बतलाते हैं, कि शास्त्रपर श्रद्धा न रखनेवाले कामपरायण और दांभिक । लोग किस श्रेणीमें आते हैं। यह तो स्पष्ट है, कि ये लोग सात्त्विक नहीं हैं; परंतु । ये निरे तामसभी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि यद्यपि इनके कर्म शास्त्रविरुद्ध । होते हैं, तथापि इनमें कर्म करनेकी प्रवृत्ति होती है और प्रवृत्ति रजोगुणका धर्म । है। तात्पर्य यह है, कि ऐसे मनुष्योंको न सात्त्विक कह सकते हैं, न राजस और । न तामसभी। अतएव, दैवी और आसुरी नामक दो भिन्नही श्रेणियाँ बनाकर उक्त । दुष्ट पुरुषोंका आसुरी श्रेणीमें समावेश किया जाता है। यही अर्थ अगले दो । श्लोकोंमें स्पष्ट किया गया है।] (५) (परंतु) जो लोग दंभ और अहंकारसे युक्त होकर, काम एवं आसक्तिके बलपर, शास्त्रके विरुद्ध घोर तप किया करते हैं, (६) तथा जो न केवल शरीरके पंचमहाभूतादिकोंके समूहकोही, वरन् शरीरके अन्तर्गत रहनेवाले मुझकोभी कष्ट देते हैं, उन्हें अविवेकी आसुरी बुद्धिके जान । । [ इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नोंके उत्तर हुए। इन श्लोकोंका भावार्थ यह । है, कि मनुष्यकी श्रद्धा उसके प्रकृतिस्वभावानुसार सात्त्विक, राजस अथवा तामस । हो सकती है; और उसके अनुसार उसके कर्मोंमें अन्तर होता है, तथा अपने कर्मोंके । अनुरूपही उसे पृथक् पृथक् गति प्राप्त होगी। परंतु केवल इतनेसेही कोई आसुरी । श्रेणीमें नहीं गिना जाता । आत्माकी स्वाधीनताका उपयोगकर और शास्त्रा- । नुसार आचरण करके प्रकृति-स्वभावको धीरे धीरे सुधारते जाना प्रत्येक । मनुष्यका कर्तव्य है। हाँ, जो ऐसा नहीं करते और दुष्ट प्रकृति-स्वभावकाही । अभिमान रखकर शास्त्रके विरुद्ध आचरण करते हैं, उन्हें आसुरी बुद्धिके कहना । चाहिये। अब यह वर्णन करते हैं, कि श्रद्धाके समानही आहार, यज्ञ, तप और । दानके सत्त्व, रज, तममय प्रकृतिके गुणोंसे भिन्न-भिन्न भेद कैसे हो जाते हैं, एवं । इन भेदोंसे स्वभावकी विचित्रताके साथ-ही-साथ क्रियाकी विचित्रताभी कैसे । उत्पन्न होती है :- ]