श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥ यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ श्रीभगवानने कहा :- (२) प्राणिमात्रकी यह श्रद्धा स्वभावतः तीन प्रकारकी होती है; सात्त्विक, राजस और तामस । उनका वर्णन सुन । (३) हे भारत ! सब लोगोंकी श्रद्धा अपने अपने सत्त्वके अनुसार अर्थात् प्रकृतिस्वभावके अनुसार होती है । मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा ( रहती ) है, वैसाही वह होता है । [ दूसरे श्लोकके 'सत्त्व' शब्दका अर्थ देहस्वभाव, बुद्धि अथवा अंतः- करण है । कठोपनिषद्में 'सत्त्व' शब्द इसी अर्थमें आया है ( कठ. ६. ७), और वेदान्त-सूत्रके शांकरभाष्यमेंभी 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' पदके स्थानमें 'सत्त्व-क्षेत्रज्ञ' पदका उपयोग किया गया है (वे. सू. शां. भा. १. २. १२ ) । तात्पर्य यह है, कि दूसरे श्लोकका 'स्वभाव' शब्द और तीसरे श्लोकका 'सत्त्व' शब्द दोनों यहाँ, समानार्थक हैं । क्योंकि सांख्य और वेदान्त इन दोनोंकोभी यह सिद्धान्त मान्य है, कि स्वभावका अर्थ प्रकृति है और इस प्रकृतिसे बुद्धि एवं अंतःकरण उत्पन्न होते हैं। “यो यच्छ्रद्धः स एव सः” - यह तत्त्व “देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवताओंको पाते हैं” प्रभृति पूर्व-वर्णित सिद्धान्तोंकाही साधारण अनुवाद है (गीता ७. २०- २३ ; ९. २५ ), और इस विषयका विवेचन हमने गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें किया है (गीतार. पृ. ४२३-४२९ ) । तथापि जब यह कहा, कि जिसकी जैसी बुद्धि हो, उसे वैसा फल मिलता है, और इस बुद्धिका होना या न होना प्रकृति-स्वभावके अधीन है; तब प्रश्न होता है, कि फिर इस बुद्धि क्योंकर सुधर सकती है ? इसका यह उत्तर है, कि आत्मा स्वतंत्र है, अतः देहका यह स्वभाव क्रमशः अभ्यास और वैराग्यके द्वारा धीरे धीरे बदला जा सकता है। इस बातका विवेचन गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें किया गया है (पृ. २८०-२८१ ) । अभी तो यही देखना है, कि श्रद्धाके भेद क्यों और कैसे होते हैं ? इसीसे कहा गया है, कि प्रकृति-स्वभावानुसार श्रद्धा बदलती है । अब बतलाते हैं, कि जब प्रकृतिभी सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे युक्त है, तब प्रत्येक मनुष्यमें श्रद्धाकेभी त्रिधा भेद किस प्रकार उत्पन्न होते हैं, और उनके परिणाम क्या होते हैं :- ] (४) जो पुरुष सात्त्विक हैं, अर्थात् जिनका स्वभाव सत्त्वगुण-प्रधान है, वे देवताओंका