भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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८४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥ आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥ यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ § § अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥ (७) प्रत्येककी रुचिका आहारभी तीन प्रकारका होता है। और यही अवस्था यज्ञ, तप एवं दानकीभी है। सुन, उनका भेद बतलाता हूँ। (८) आयु, सात्त्विक वृत्ति, बल, आरोग्य, सुख और प्रीतिकी वृद्धि करनेवाले, रसीले, स्निग्ध, शरीरमें भिदकर चिरकालतक रहनेवाले और मनको आनंददायक आहार सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं। (९) कटु अर्थात् चरपरे, खट्टे, खारे, अत्युष्ण, तीखे, रूखे, दाहकारक तथा दुःख, शोक और रोग उपजानेवाले आहार राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं। | [ संस्कृतमें कटु शब्दका अर्थ चरपरा और तिक्तका अर्थ कडुआ होता | है। इसीके अनुसार संस्कृतके वैद्यक ग्रंथोंमें काली मिर्च कटु तथा नींब तिक्त | कही गई है (वाग्भट-सूत्र, अ. १०) हिंदीके कडुआ और तीखा शब्द क्रमानुसार | कटु और तिक्त शब्दोंकेही अपभ्रंश हैं ।] (१०) कुछ काल रखा हुआ अर्थात् ठंडा, नीरस, दुर्गंधित, बासा, जूठा तथा अपवित्र भोजन तामस पुरुषको रुचता है। | [ सात्त्विक मनुष्यको सात्त्विक, राजसको राजस तथा तामसको तामस | भोजन प्रिय होता है, इतनाही नहीं, यदि आहार शुद्ध अर्थात् सात्त्विक हो, तो | मनुष्यकी वृत्तिभी क्रम-क्रमसे शुद्ध या सात्त्विक हो सकती है। उपनिषदोंमें कहा | है, कि "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" (छां. ७. २६. २)। क्योंकि मन और | बुद्धि प्रकृतिके विकार हैं, इसलिये जहाँ सात्त्विक आहार हुआ, वहाँ बुद्धिभी | आप-ही-आप सात्त्विक बन जाती है। ये आहारके भेद हुए। इसी प्रकार अब | यज्ञके तीन भेदोंकाभी वर्णन करते हैं :-] (११) फलाशाकी आकांक्षा छोड़कर, अपना कर्तव्य समझ करके शास्त्रकी