श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
८४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवाँ अध्याय। [ अठारहवाँ अध्याय पूरे गीता-शास्त्रका उपसंहार है। अतः अबतक जो विवेचन हुआ है, उसका हम यहाँ संक्षेपमें सिंहावलोकन करते हैं ( अधिक विस्तार गीतारहस्यके १४ वें प्रकरणमें देखिये ) पहले अध्यायमे स्पष्ट होता है, कि स्वधर्मके अनुसार प्राप्त युद्धको छोड़, भीख मांगनेपर उतारू होनेवाले अर्जुनको अपने कर्तव्यमें प्रवृत्त करनेकेलिये गीताका उपदेश किया गया है। अर्जुनकी शंका थी, कि गुरुहत्या आदि सदोष कर्म करनेसे आत्मकल्याण कभी न होगा। अतएव आत्मज्ञानी पुरुषोंके स्वीकृत, आयु बितानेके दो प्रकारके मार्गोंका — सांख्य ( संन्यास ) मार्गका और कर्मयोग ( योग ) मार्गका — वर्णन दूसरे अध्यायके आरंभमेंही किया गया है; और अंतमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि यद्यपि ये दोनों मार्ग मोक्ष देते हैं, तथापि इनमेंसे कर्मयोगही अधिक श्रेयस्कर है ( गीता ५. २ )। फिर तीसरे अध्यायसे लेकर पाँचवें अध्यायतक इन युक्तियोंका वर्णन है, कि कर्मयोगमें बुद्धि श्रेष्ठ समझी जाती है; बुद्धिके स्थिर और सम होनेसे कर्मकी बाधा नहीं होती; कर्म किसीकेभी नहीं छूटते; तथा उन्हें छोड़ देनाभी उचित नहीं; केवल फलाशाको त्याग देनाही काफी है; अपनेलिये न सही, लोकसंग्रहके हेतु कर्म करना आवश्यक है; बुद्धि अच्छी हो, तो ज्ञान और कर्मके बीच विरोध नहीं होता; तथा पूर्वपरंपरा देखी जाय तो ज्ञात होगा, कि जनक आदिने इसी मार्गका आचरण किया है। अनन्तर इस बातका विवेचन किया है, कि कर्मयोगकी सिद्धिके लिये बुद्धिकी जिस समताकी आवश्यकता होती है, उसे कैसे प्राप्त करना चाहिये, और इस कर्मयोगका आचरण करते हुए अंतमें उसीके द्वारा मोक्ष कैसे प्राप्त होता है। बुद्धिकी इस समताको प्राप्त करनेके लिये इंद्रियोंका निग्रह करके पूर्णतया यह जान लेना आवश्यक है, कि सब प्राणियोंमें एक परमेश्वरही भरा हुआ है, इसके अतिरिक्त दूसरा मार्ग नहीं है। अतः इंद्रिय-निग्रहका विवेचन छठे अध्यायमें किया गया है और फिर सातवें अध्यायमे सत्रहवें अध्यायतक बतलाया है, कि कर्मयोगका आचरण करते हुएही परमेश्वरका ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, और वह ज्ञान क्या है। सातवें और आठवें अध्यायमें क्षर-अक्षर अथवा व्यक्त-अव्यक्तके ज्ञान-विज्ञानका विवरण किया गया है। नवें अध्यायसे बारहवें अध्यायतक इस अभिप्रायका वर्णन किया गया है, कि यद्यपि परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्त स्वरूप श्रेष्ठ है, तोभी इस बुद्धिको न डिगने दें, कि परमेश्वर एकही है, और व्यक्त स्वरूपकीही उपासना प्रत्यक्ष ज्ञान देनेवाली अतएव सबके लिये सुलभ है। अनन्तर तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह विचार किया गया है, कि क्षर-अक्षरके विचारमे जिसे अव्यक्त कहते हैं, वही मनुष्यके शरीरका आत्मा है। इसके पश्चात् चौदहवें
अठारहवाँ अध्याय ८४९ अष्टादशोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्यायतक, चार अध्यायोंमें क्षर-अक्षर विज्ञानके अंतर्गत इस विषयका विस्तारसहित विचार किया गया है, कि प्रकृतिके गुणोंके कारण एकही अव्यक्तसे जगतके विविध स्वभावोंके मनुष्य कैसे उपजते हैं, अथवा और अनेक प्रकारका विस्तार कैसे होता है, एवं ज्ञान-विज्ञानका निरूपण समाप्त किया गया है। तथापि स्थान-स्थानपर अर्जुनको यही उपदेश है, कि तू कर्म कर; और यह सिद्धान्त किया गया है, कि शुद्ध अंतःकरणसे परमेश्वरकी भक्ति करके “ परमेश्वरार्पणपूर्वक स्वधर्मके अनुसार केवल कर्तव्य समझकर मरणपर्यंत सब कर्म करते रह यही ” कर्म- योग-प्रधान आयु बितानेका मार्ग सबसे उत्तम है, जिसमें इस प्रकार ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्मयोगका सांगोपांग विवेचन कर चुकनेपर, अठारहवें अध्यायमें उसी धर्मका उपसंहार करके अर्जुनको स्वेच्छासे युद्ध करनेके लिये प्रवृत्त किया है। गीताके इस मार्गमें, कि जो गीतामें सर्वोत्तम कहा गया है, अर्जुनसे यह नहीं कहा गया, कि “ तू चतुर्थ आश्रमको स्वीकार करके संन्यासी हो जा । ” हाँ, यह अवश्य कहा है, कि इस मार्गके आचरण करनेवाला मनुष्य ‘नित्यसंन्यासी’ है ( गीता ५. ३ ) । अतएव अब अर्जुनका प्रश्न है, कि चतुर्थ आश्रमरूपी संन्यास लेकर किसी समय सब कर्मोंको सचमुचही त्याग देनेका तत्त्व इस कर्मयोग-मार्गमें है या नहीं, और नहीं है तो ‘संन्यास’, एवं ‘त्याग’ दोनों शब्दोंका अर्थ क्या है ? गीता प्र. ११, पृ. ३४८- ३५१ देखो । ] अर्जुनने कहा :— ( १ ) हे महाबाहु, हृषीकेश ! मैं संन्यासका तत्त्व, और हे केशिदैत्य-निषूदन ! त्यागका तत्त्व पृथक् पृथक् जानना चाहता हूँ । [ संन्यास और त्याग शब्दोंके केवल उन अर्थों अथवा भेदोंको जाननेके लिये | यह प्रश्न नहीं किया गया है, कि जो कोशकारोंने किये हैं। यह न समझन | चाहिये, कि अर्जुन यहभी न जानता था, कि दोनोंकाभी धात्वर्थ ‘छोड़ना’ है। | परंतु बात यह है, कि भगवान् कर्म छोड़ देनेकी आज्ञा कहींभी नहीं देते; बल्कि | चौथे, पाँचवें अथवा छठे अध्यायमें ( गीता ४. ४१ ; ५. १३ ; ६. १ ) या अन्यत्र | जहाँ कही संन्यासका वर्णन है, वहाँ उन्होंने यही कहा है, कि केवल फलाशाका | ‘त्याग’ करके ( गीता १२. ११ ) परमेश्वरमें सब कर्मोंका ‘संन्यास’ करो | अर्थात् सब कर्म परमेश्वरको समर्पण करो ( गीता ३. ३० ; १२. ६ ) ; और गी. र. ५४
८५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ उपनिषदोंमें देखें, तो कर्मत्याग-प्रधान संन्यास-धर्मके वचन पाये जाते हैं, कि “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” (कै. १. २. नारायण १२. ३ ), सब कर्मोंका स्वरूपतः 'त्याग' करनेसेही कई एकोने मोक्ष प्राप्त किया है, अथवा “वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्ध सत्त्वाः” (मुंडक ३. २. ६) कर्मत्यागरूपी 'संन्यास' योगसे शुद्ध होनेवाले 'यति', या “किं प्रजया करिष्यामः” (बृ. ४. ४. २२) हमें पुत्रपौत्र आदि प्रजासे क्या काम है? अतएव अर्जुनने समझा, कि भगवान् स्मृति-ग्रंथोंमें प्रतिपादित चार आश्रमोंमेसे कर्मत्यागरूपी संन्यास आश्रमके लिये 'त्याग' और 'संन्यास' शब्दोंका उपयोग नहीं करते, किंतु वे और किसी अर्थमें उन शब्दोंका उपयोग करते हैं, इसीसे अर्जुनने चाहा, कि उस अर्थका स्पष्टीकरण हो जाय । इसी हेतुसे उसने उक्त प्रश्न किया है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३४८-३५१ में इस विषयका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। श्रीभगवानने कहा :- (२) (जितने) काम्य कर्म हैं, उनके न्यास अर्थात् छोड़नेको ज्ञानी लोग संन्यास समझते हैं; (तथा) समस्त कर्मोंके फलोंके त्यागको पंडित लोग त्याग कहते हैं। [इस श्लोकमें स्पष्टतया बतला दिया है, कि कर्मयोग-मार्गमें संन्यास और त्याग किसे कहते हैं? परंतु संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंने यह मत ग्राह्य नहीं, इस कारण उन्होंने इस श्लोककी बहुत कुछ खींचातानी की है। श्लोकके आरंभमेंही 'काम्य' शब्द आया है। अतएव इन टीकाकारोंका मत है, कि यहाँ मीमांसकोंके नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध प्रभृति कर्मभेद विवक्षित हैं; और उनकी समझमें भगवान्का अभिप्राय यह है, कि उनमेंसे केवल “काम्य कर्मोंहीको छोड़ना चाहिये।" परंतु संन्यास-मार्गीय लोगोंको नित्य और नैमित्तिक कर्मभी नहीं चाहिये, इसलिये उन्हें यों प्रतिपादन करना पड़ा है, कि यहाँ नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका काम्य कर्मोंमेंही समावेश किया गया है। इतना करने- परभी इस श्लोकके उत्तरार्धमे जो कहा गया है, कि फलाशा छोड़नी चाहिये; न कि कर्म (आगे छठा श्लोक देखिये) उसका मेल मिलताही नहीं; अतएव अंतमे इन टीकाकारोंने अपनेही मनमें यों कहकर अपना समाधान कर लिया है, कि भगवान्ने यहाँ कर्मयोग-मार्गकी कोरी स्तुति की है, उनका सच्चा अभिप्राय तो यही है, कि कर्मोंको छोड़ही देना चाहिये ! इससे स्पष्ट होता है, कि संन्यास
आदि संप्रदायोंकी दृष्टिसे इस श्लोकका ठीक ठीक अर्थ नहीं लगता। वास्तवमें इसका अर्थ कर्मयोग-प्रधानही करना चाहिये, अर्थात् फलाशा छोड़कर मरण- पर्यंत सारे कर्म करते जानेका जो तत्त्व गीतामें पहले अनेक बार कहा गया है, उसीके अनुरोधसे यहाँभी अर्थ करना चाहिये; तथा यही अर्थ सरल है और ठीक ठीक जमताभी है। पहले इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि 'काम्य' शब्दसे इस स्थानमें मीमांसकोंका नित्य, नैमित्तिक, काम्य, और निषिद्ध कर्मविभाग अभिप्रेत नहीं है। कर्मयोग-मार्गमें सब कर्मोंके दोही विभाग किये जाते हैं, एक 'काम्य' अर्थात् फलाशासे किये हुए कर्म और दूसरे 'निष्काम' अर्थात् फलाशा छोड़कर किये हुए कर्म; मनुस्मृतिमें उन्हींको क्रमसे 'प्रवृत्त' कर्म और 'निवृत्त' कर्म कहा है (मनु. १२. ८८, ८९)। कर्म चाहे नित्य हों, नैमित्तिक हों, काम्य हों, कायिक हों, वाचिक हों, मानसिक हों, अथवा सात्त्विक आदि भेदके अनुसार और किसी प्रकारके हों, उन सबको 'काम्य' अथवा 'निष्काम' वर्गोंमें इन दो, किसीएक विभागमें आनाही चाहिये। क्योंकि काम अर्थात् फलाशाका होना अथवा न होना, इन दोनोंके अतिरिक्त फलाशाकी दृष्टिसे तीसरा भेद होही नहीं सकता। शास्त्रमें जिस कर्मका जो फल कहा गया है, जैसे, पुत्रप्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि, उस फलकी प्राप्तिके लिये वह कर्म किया जाय, तो वह 'काम्य' है; तथा मनमें उस फलकी इच्छा न रखकर वही कर्म केवल कर्तव्य समझकर किया जाय, तो वह 'निष्काम' हो जाता है। इस प्रकार सब कर्मोंके 'काम्य' और 'निष्काम' (अथवा मनुकी परिभाषाके अनुसार प्रवृत्त और निवृत्त) येही दो भेद सिद्ध होते हैं। अब कर्मयोगी सब 'काम्य' कर्मोंको सर्वथा छोड़ देता है, अतः सिद्ध हुआ, कि कर्मयोगमेंभी काम्य कर्मोंका संन्यास करना पड़ता है। फिर बच रहे निष्काम कर्म। सो गीतामें कर्मयोगीको निष्काम कर्म करनेका निश्चित उपदेश किया गया है सही; परंतु उसमेंभी 'फलाशा'का सर्वथा त्याग करना पड़ता है (गीता ६. २)। अतएव त्यागका तत्त्वभी गीता-धर्ममें स्थिरही रहता है। सारांश अर्जुनको यही बात समझा देनेके लिये, कि सब कर्मोंको न छोड़नेपरभी कर्मयोग-मार्गमें 'संन्यास' और 'त्याग', दोनों तत्त्व बने रहते हैं, इस श्लोकमें संन्यास और त्याग, दोनोंकी व्याख्याएँ यों की गई हैं, कि 'संन्यास'का अर्थ 'काम्य कर्मोंको सर्वथा छोड़ देना' है, और 'त्याग'का यह मतलब है, कि "जो कर्म करना हों, उनकी फलाशा न रखें।" पीछे जब यह प्रतिपादन हो रहा था, कि संन्यास (अथवा सांख्य) और योग ये दोनों तत्त्वतः एकही हैं; तब 'संन्यासी' शब्दका अर्थ (गीता ५. ३-६, ६. १,२) तथा इसी अध्यायमें आगे 'त्यागी' शब्दका अर्थभी (गीता. १८. ११) इसी भाँति किया गया है, और इस स्थानमें वही अर्थ इष्ट है। यहाँ स्मार्तोंका यह मत प्रतिपाद्य नहीं है, कि क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ आश्रमका पालन करनेपर
८५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥ निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥ एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥ | "अंतमें प्रत्येक मनुष्यको सर्वकर्मत्यागरूपी संन्यास अथवा चतुर्थाश्रम लिये बिना | मोक्षप्राप्तिही हो नहीं सकती ।" इससे सिद्ध होता है, कि कर्मयोगी यद्यपि | संन्यासियोंका गेरुआ भेष धारणकर सब कर्मोंका त्याग नहीं करता, तथापि | वह संन्यासके सच्चे तत्त्वका पालन किया करता है, इसलिये कर्मयोगका स्मृति- | ग्रंथसे कोई विरोध नहीं है । अब संन्यास-मार्ग - और मीमांसकोंके कर्मसंबंधी | वादका उल्लेख करके कर्मयोगशास्त्रका, इस विषयमें अंतिम निर्णय सुनाते हैं :-] ( ३ ) कई पंडितोंका कथन है, कि कर्म दोषयुक्त है, अतएव उसका (सर्वथा) त्याग करना चाहिये; तथा दूसरे कहते हैं, कि यज्ञ, दान, तप और कर्मको कभी न छोड़ना चाहिये । ( ४ ) अतएव हे भरतश्रेष्ठ ! त्यागके विषयमें मेरा निर्णय सुन । हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है । ( ५ ) यज्ञ, दान, तप और कर्मका त्याग न करना चाहिये; इनको ( कर्मों ) करनाही चाहिये । यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानोंके लिये (भी) पवित्र अर्थात् चित्तशुद्धिकारक हैं । ( ६ ) अतएव इन ( यज्ञ, दान आदि ) कर्मोंकोभी बिना आसक्ति रखे, फलोंका त्याग करके ( अन्य निष्काम कर्मोंके समानही लोकसंग्रहके हेतु ) करते रहना चाहिये । हे पार्थ ! इस प्रकार मेरा निश्चित मत ( है, और वही ) उत्तम है : | [ कर्मका दोष अर्थात् बंधकता कर्ममें नहीं, फलाशामें है, इसलिये पहले | अनेक बार जो कर्मयोगका यह तत्त्व कहा गया है, कि सभी कम फलाशा छोड़- | कर निष्काम बुद्धिसे करने चाहिये, उसका यह उपसंहार है । संन्यास मार्गका यह | मत गीताको मान्य नहीं है, कि सब कर्म दोषयुक्त, अतएव त्याज्य हैं ( गीता | १८. ४८, ४९ ), गीता केवल काम्य-कर्मोंका संन्यास करनेके लिये कहती है । | परंतु धर्मशास्त्रमें जिन कर्मोंका प्रतिपादन है, वे सभी काम्यही हैं ( गीता २. | ४२-४४ ) । इसलिये अब कहना पड़ता है, कि उनकाभी संन्यास करना | चाहिये; और यदि ऐसा करते हैं, तो यज्ञ-चक्र बंद हुआ जाता है ( ३. १६) एवं
अठारहवाँ अध्याय ८५३ § § नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥ दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥ कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥ [ उसमे सृष्टिके उद्ध्वस्त होनेकाभी अवसर आ जाता है। प्रश्न होता है, कि फिर करना क्या चाहिये ? गीता इसका यों उत्तर देती है, कि यद्यपि शास्त्रमें कहा है, कि यज्ञ, दान प्रभृति कर्म स्वर्गादि फलप्राप्तिके हेतु करो, तथापि ऐसी बात नहीं है, कि येही कर्म लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे न हो सकते हों, कि यज्ञ करना, दान देना और तप करना आदि मेरा कर्तव्य है (गीता १७ ११, १३. २०)। अतएव लोकसंग्रहकेनिमित्त स्वधर्मके अनुसार जैसे अन्यान्य निष्काम कर्म किये जाते हैं वैसेही यज्ञ, दान आदि कर्मोंकोभी फलाशा और आसक्ति छोड़कर करना चाहिये। क्योंकि वे सदैव 'पावन' अर्थात् चित्तशुद्धिकारक अथवा परोपकार बुद्धि बढ़ानेवाले हैं। मूल श्लोकमें जो 'एतान्यपि – येभी' शब्द हैं, उनका अर्थ यही है, कि "अन्य निष्काम कर्मोंके समान ये यज्ञ, दान आदि कर्मभी करने चाहिये।" इस रीतिसे ये सब कर्म फलाशा छोड़कर अथवा भक्ति-दृष्टिसे केवल परमेश्वरार्पण-बुद्धिपूर्वक किये जावें, तो सृष्टिका चक्र चलता रहेगा। और कर्ताके मनकी फलाशा छूट जानेके कारण ये कर्म मोक्ष-प्राप्तिमेंभी बाधा नहीं डाल सकते, इस प्रकार सब बातोंका ठीक ठीक मेल मिल जाता है। कर्मके विषयमें कर्मयोगशास्त्रका यही अंतिम और निश्चित सिद्धान्त है (गीता २. ४५ पर हमारी टिप्पणी देखो)। मीमांसकोंके कर्म-मार्ग और गीताके कर्मयोगका भेद गीतारहस्यमें (प्र. १०, पृ. २९५-२९७; प्र. ११, पृ. ३४५- ३४८) अधिक स्पष्टतासे दिखाया गया है। अर्जुनके प्रश्न करनेपर संन्यास और त्यागके अर्थोंका कर्मयोगकी दृष्टिसे इस प्रकार स्पष्टीकरण हो चुका; अब सात्विक आदि भेदोंके अनुसार कर्म करनेकी भिन्न-भिन्न रीतियोंका वर्णन करके उसी अर्थको दृढ़ करते हैं। ] (७) जो कर्म (स्वधर्मके अनुसार) नियत अर्थात् स्थिरकर दिये गये हैं, उनका संन्यास याने त्याग करना (किसीकोभी) उचित नहीं है। उनका, मोहसे किया हुआ त्याग तामस कहलाता है। (८) शरीरको कष्ट होनेके डरसे, अर्थात् दुःखकारक होनेके कारणही, यदि कोई कर्म छोड़ दे, तो उसका वह त्याग राजस हो जाता है, (तथा) त्यागका फल उसे नहीं मिलता। (९) हे अर्जुन! (स्वधर्मा-
८५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ § § अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥ नुसार) नियत कर्म जब कार्य अथवा कर्तव्य समझकर और आसक्ति एवं फलको छोड़कर किया जाता है, तब वह सात्त्विक त्याग समझा जाता है। | [सातवें श्लोकके 'नियत' शब्दका अर्थ कुछ लोग नित्यनैमित्तिक आदि | भेदोंमेंसे 'नित्य' कर्म समझते हैं, किंतु वह ठीक नहीं है "नियतं कुरु कर्म त्वम्" | (गीता ३. ८) पदमें 'नियत' शब्दका जो अर्थ है, वही अर्थ यहाँपरभी करना | चाहिये, और हम ऊपर कह चुके हैं, कि यहाँ मीमांसकोंकी परिभाषा विवक्षित | नहीं है। गीता ३. १९ में 'नियत' शब्दके स्थानमें 'कार्य' शब्द आया है और यहाँ | नवें श्लोकमें 'कार्य' एवं 'नियत' ये दोनों शब्द एकत्र आ गये हैं। इस अध्यायमें | आरंभमें, दूसरे श्लोकमें, यह कहा गया है, कि स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले | किसीभी कर्मको न छोड़कर, उसीको कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिये | (गीता ३. १९), इसीको सात्त्विक त्याग कहते हैं, इतनाही नहीं, तो कर्मयोग- | शास्त्रमें इसीको 'त्याग' अथवा 'संन्यास' कहते हैं, इसी सिद्धान्तका इस श्लोकमें | समर्थन किया गया है। इस प्रकार त्याग या संन्यासके अर्थोंका स्पष्टीकरण हो | चुका; अब इसी तत्त्वके अनुसार बतलाते हैं, कि वास्तविक त्यागी या संन्यासी | कौन है :—] (१०) जो किसी अकुशल अर्थात् अकल्याणकारक कर्मका द्वेष नहीं करता, तथा कल्याणकारक अथवा हितकारी कर्ममें अनुषक्त नहीं होता, उसे सत्त्वशील, बुद्धिमान् और संदेहविरहित त्यागी अर्थात् संन्यासी कहना चाहिये। (११) क्योंकि जो देहधारी है, उससे, कर्मोंका निःशेष त्याग होना संभव नहीं है, अतएव जिसने (कर्म न छोड़कर) केवल कर्मफलोंका त्याग किया हो, वही (सच्चा) त्यागी अर्थात् संन्यासी है : | [अब यह बतलाते हैं, कि उक्त प्रकारसे, अर्थात् कर्म न छोड़कर केवल | फलाशा छोड़करके, जो त्यागी हुआ हो, उसे उसके कर्मके कोईभी फल बंधक | नहीं होते :—] (१२) मृत्युके अनन्तर अत्यागी मनुष्यको अर्थात् फलाशाका त्याग न करनेवाले को तीन प्रकारके फल मिलते हैं – अनिष्ट, इष्ट और (कुछ इष्ट और
अठारहवाँ अध्याय ८५५ § § पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥ शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥ § § तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥ कुछ अनिष्ट मिला हुआ ) मिश्र । परंतु संन्यासीको अर्थात् फलाशा छोड़कर कर्म करनेवालेको ( ये फल ) कभी नहीं मिलते, अर्थात् बाधा नहीं कर सकते । | [ त्याग, त्यागी और संन्यासी संबंधी उक्त विचार पहले ( गीता ३. ४-७ ; | ५. २-१० ; ६. १ ) कई स्थानोंमें आ चुके हैं, उन्हींका यहाँ उपसंहार किया | गया है । समस्त कर्मोंका संन्यास गीताको कभीभी इष्ट नहीं है । फलाशाका त्याग | करनेवाला पुरुषही गीताके अनुसार सच्चा अर्थात् नित्य-संन्यासी है ( गीता | ५. ३ ) । ममतायुक्त फलाशाका अर्थात् अहंकार-बुद्धिका त्यागही सच्चा त्याग | है। इसी सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये अब और कारण दिखलाते हैं :- ] (१३) हे महाबाहु ! सब कर्मोंकी सिद्धिके लिये सांख्योंके सिद्धान्तमें जो पाँच कारण कहे गये हैं; उन्हें मैं बतलाता हूँ, सुन । (१४) अधिष्ठान (स्थान), तथा कर्ता, भिन्न भिन्न करण याने साधन या हथियार, (कर्ताकी) अनेक प्रकारकी पृथक् पृथक् चेष्टाएँ अर्थात् व्यापार, और उसके साथही साथ पाँचवाँ (कारण) दैव है । (१५) शरीरसे, वाणीसे अथवा मनसे मनुष्य जो जो कर्म करता है, फिर चाहे वह न्याय्य हो या विपरीत अर्थात् अन्याय्य उसके उक्त पाँच कारण हैं । (१६) ( वास्तविक ) स्थिति ऐसी होनेपरभी, जो संस्कृत बुद्धि न होनेके कारण यह समझे, कि मैंही अकेला कर्ता हूँ, ( समझना चाहिये, कि ), वह दुर्मति कुछभी नहीं जानता । (१७) जिसमें यह भावना नहीं है, कि मैं कर्ता हूँ तथा जिसकी बुद्धि अलिप्त है, वह यदि इन लोगोंको मार डाले, तथापि (समझना चाहिये, कि ) उसने उन्हें नहीं मारा है, और वह ( कर्म ) उसे बंधकभी नहीं होता । | [ कई टीकाकारोंने तेरहवें श्लोकके 'सांख्य' शब्दका अर्थ वेदान्तशास्त्र | किया है। परंतु अगला अर्थात् चौदहवाँ श्लोक नारायणी धर्ममें ( मभा. शां.
८५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । ३४७. ८७ ) अक्षरशः आया है, और वहां उसके पूर्व कापिल-सांख्यके प्रकृति और पुरुष - तत्त्वोंका उल्लेख है, अतः हमारा यह मत है, कि - 'सांख्य' शब्दसे इस स्थानमें कापिल-सांख्यशास्त्रही अभिप्रेत है। गीतामें यह सिद्धान्त पहले अनेक बार कहा गया है, कि मनुष्यको न तो कर्मफलकी आशा करनी चाहिये, और न ऐसी अहंकार-बुद्धि मनमें रखनी चाहिये, कि मैं अमुक करूँगा ( गीता २. १९; २. ४७; ३. २७; ५. ८-११; १३. २० ) ; और यहांपर वही सिद्धान्त यह कहकर दृढ़ किया गया है, कि "कर्मका फल होनेके लिये अकेला मनुष्यही कारण नहीं है" ( गीतार. प्र. ११ ) । चौदहवें श्लोकका अर्थ यह है, कि मनुष्य इस जगतमें हो या न हो, प्रकृतिके स्वभावके अनुसार जगतका अखंडित व्यापार सदैव चलताही रहता है; और जिस कर्मको मनुष्य अपनी करनी समझता है, वह केवल उसीके यत्नका फल नहीं है, वरन् उसके यत्न और संसारके अन्य व्यापारों अथवा चेष्टाओंकी सहायताका परिणाम है। उदाहरणार्थ खेती केवल मनुष्यकेही यत्नपर निर्भर नहीं है, उसकी सफलताके लिये धरती, बीज, पानी, खाद और बैल आदिके गुणधर्म अथवा व्यापारोंकी सहायता आव- श्यक होती है। इसी प्रकार, मनुष्यके प्रयत्नकी सिद्धि होनेके लिये जगतके जिन विविध व्यापारोंकी सहायता आवश्यक है, उनमेंसे कुछ व्यापारोंको जानकर, उनकी अनुकूलता पाकरही मनुष्य यत्न किया करता है। परंतु हमारे प्रयत्नोंके लिये अनुकूल अथवा प्रतिकूल, सृष्टिके औरभी कई व्यापार ऐसे हैं, कि जिनका हमें ज्ञान नहीं है। इसीको दैव कहते हैं; और कर्मकी घटनाका यह पाँचवाँ कारण कहा गया है। मनुष्यका यत्न सफल होनेके लिये जब इतनी सब बातोंकी आवश्यकता है, तथा जब उनमेंसे कई या तो हमारे वशकी नहीं या हमें ज्ञातभी नहीं रहतीं, तब यह बात स्पष्टतया सिद्ध होती है, कि मनुष्यका ऐसा अभिमान रखना निरी मूर्खता है, कि मैं अमुक काम करूँगा; अथवा ऐसी फलाशा रखनाभी मूर्खताका लक्षण है, कि मेरे कर्मका फल अमुकही होना चाहिये (गीतार. प्र. ११, पृ. ३१८-३१९ ) । तथापि सत्रहवें श्लोकका अर्थ योभी न समझ लेना चाहिये, कि जिसकी फलाशा छूट जाय, वह चाहे जो कुकर्म कर सकता है। साधारण मनुष्य जो कुछ करते हैं, वह स्वार्थके लोभसे करते हैं, इसलिये उनका बर्ताव अनुचित हुआ करता है। परंतु जिसका स्वार्थ या लोभ नष्ट हो गया है, अथवा फलाशा पूर्णतया विलीन हो गयी है और जिसे प्राणिमात्र समानही हो गये हैं, उससे किसीकाभी अनहित नहीं हो सकता। कारण यह है, कि दोष बुद्धिमें रहता है, न कि कर्ममें। अतएव सत्रहवें श्लोकका यही तात्पर्य है, कि जिसकी बुद्धि पहलेसे शुद्ध और पवित्र हो गयी हो, उसका किया हुआ कोई कर्म यद्यपि लौकिक दृष्टिसे विपरित भलेही दिखलाई दे; तोभी न्यायतः कहना पड़ता है, कि उसका बीज शुद्धही होगा; फलतः उस कामके लिये फिर उस शुद्ध-बुद्धि-
अठारहवाँ अध्याय ८५७ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥ | वाले मनुष्यको जिम्मेदार न समझना चाहिये। स्थितप्रज्ञ, अर्थात् शुद्ध-बुद्धिवाले, | मनुष्यकी निष्पापताके इस तत्त्वका वर्णन उपनिषदोंमेंभी है (कौषी ३. १; | पंचदशी. १४. १६, १७) । गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमेंभी (पृ. ३७२- | ३७६) इस विषयका पूर्ण विवेचन किया गया है, इसलिये यहाँपर उसके | अधिक विस्तारकी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार अर्जुनके प्रश्न करनेपर | संन्यास और त्याग शब्दोंके अर्थकी मीमांसा-द्वारा यह सिद्ध कर दिया, कि | स्वधर्मानुसार जो कर्म प्राप्त होते जायें, उन्हें अहंकार-बुद्धि और फलाशा छोड़- | कर करते रहनाही सात्त्विक अथवा सच्चा त्याग है; कर्मोंको छोड़ बैठना सच्चा | त्याग नहीं है। अब सत्रहवें अध्यायमें कर्मके सात्त्विक आदि भेदोंका जो विचार | आरंभ किया गया था, उसीको यहाँ कर्मयोगकी दृष्टिसे पूरा करते हैं। ] (१८) कर्मचोदना तीन प्रकारकी है - ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता; तथा कर्मसंग्रह तीन प्रकारका है - करण, कर्म और कर्ता। (१९) गुणसंख्यानशास्त्रमें अर्थात् कापिल-सांख्यशास्त्रमें कहा है, कि ज्ञान, कर्म और कर्ता ( प्रत्येक सत्त्व, रज और तम इन तीन ) गुणोंके भेदोंसे तीन-तीन प्रकारके हैं। उन (प्रकारों) को ज्यों-के-त्यों (तुझे बतलाता हूँ,) सुन । | [ कर्मचोदना और कर्मसंग्रह पारिभाषिक शब्द हैं। इंद्रियोंके द्वारा कोईभी | कर्म होनेके पूर्व, मनसे उसका निश्चय करना पड़ता है। अतएव इस मानसिक | विचारको 'कर्मचोदना' अर्थात् कर्म करनेकी प्राथमिक प्रेरणा कहते हैं; और | वह स्वभावतः ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञाताके रूपसे तीन प्रकारकी होती है। एक उदाहरण | लीजिये :- प्रत्यक्ष घड़ा बनानेके पूर्व कुम्हार ( ज्ञाता ) अपने मनसे निश्चय | करता है, कि मुझे अमुक बात (ज्ञेय) करनी है, और वह अमुक रीतिसे (ज्ञान) | होगी। यह क्रिया कर्मचोदना हुई। इस प्रकार मनका निश्चय हो जानेपर वह | कुम्हार (कर्ता) मिट्टी, चाक इत्यादि साधन (करण) इकट्ठेकर प्रत्यक्ष घड़ा | (कर्म) तैयार करता है। यह कर्मसंग्रह हुआ। कुम्हारका कर्म घट तो है; पर | उसीको मिट्टीका कार्यभी कहते हैं। इससे मालूम होगा, कि कर्मचोदना शब्दसे | मानसिक अथवा अन्तःकरणकी क्रियाका बोध होता है, और कर्मसंग्रह शब्दसे | उसी मानसिक क्रियाकी जोड़की बाह्यक्रियाओंका बोध होता है। किसीभी | कर्मका पूर्ण विचार करना हो, तो 'चोदना' और 'संग्रह', दोनोंका विचार
८५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥ पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ | करना चाहिये । इनमेंसे ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके (क्षेत्रज्ञ) लक्षण प्रथमही तेरहवें | अध्यायमें (१३. १८) अध्यात्म-दृष्टिसे बतला चुके हैं। परंतु क्रियारूपी ज्ञानका | लक्षण कुछ पृथक् होनेके कारण अब इस त्रयीमेंसे ज्ञानकी, और दूसरी त्रयीमेंसे | कर्म एवं कर्ताकी, व्याख्याएँ दी जाती हैं :- ] (२०) जिस ज्ञानसे यह मालूम होता है, कि विभक्त अर्थात् भिन्न भिन्न सब प्राणियोंमें एकही अविभक्त और अव्यक्त भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान समझ । (२१) जिस ज्ञानसे इस पृथक्त्वका बोध होता है, कि समस्त प्राणिमात्रमें भिन्न भिन्न प्रकारके अनेक भाव हैं, उसे राजस ज्ञान समझ । (२२) परंतु जो निष्कारण और तत्त्वार्थको बिना जाने-बूझे एकही बातमें यह समझ कर आसक्त रहता है, कि यही सब कुछ है, वह अल्प ज्ञान तामस कहा गया है। | [ ये भिन्न भिन्न ज्ञानोंके लक्षण बहुत व्यापक हैं। अपने बाल-बच्चों और | स्त्रीकोही सारा संसार समझना तामस ज्ञान है। इससे कुछ ऊँची सीढ़ीपर पहुँचनेसे | दृष्टि अधिक व्यापक होती जाती है और अपने गाँवका अथवा देशका मनुष्यभी | अपना-सा जँचने लगता है; तोभी यह बुद्धि बनी रहती है, कि भिन्न भिन्न गाँवों | अथवा देशोंके लोग भिन्न भिन्न हैं। यही ज्ञान राजस कहलाता है। परंतु इससेभी | ऊँचे जाकर प्राणिमात्रमें एकही आत्माको पहचानना पूर्ण और सात्त्विक ज्ञान | है। सार यह हुआ, कि 'विभक्तमें अविभक्त' अथवा 'अनेकतामें एकता 'को | पहचाननाही ज्ञानका सच्चा लक्षण है; और बृहदारण्यक एवं कठोपनिषदोंके | वर्णनानुसार जो यह पहचान लेता है, कि इस जगतमें नानात्व नहीं है – “नेह | नानास्ति किंचन ” – वह मुक्त हो जाता है; परंतु जो इस जगतमें अनेकता | देखता है, वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा रहता है – “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति | य इह नानेव पश्यति” ( बृ. ४. ४. १९; कठ. ४. ११) । इस जगतमें जो कुछ | ज्ञान प्राप्त करना है, वह यही है ( गीता १३. १६ ) ; और ज्ञानकी यही परम | सीमा है; क्योंकि सभीके एक हो जानेपर फिर एकीकरणकी ज्ञानक्रियाको आगे | स्थानही नहीं रहता ( गीतार. प्र. ९, पृ. २३२-२३३ ) । एकीकरण करनेकी | इस ज्ञानक्रियाका निरूपण गीतारहस्यके नवे प्रकरण में ( पृ. २१६-२१७ )
अठारहवाँ अध्याय ८५९ §§ नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ किया गया है। जब यही सात्त्विक ज्ञान मनमें भली भाँति प्रतिबिम्बित हो जाता है, तब मनुष्यके देहस्वभावपर उसके जो परिणाम होते हैं, उनका वर्णन, दैवी- संपत्ति-गुणवर्णनके नामसे, सोलहवें अध्यायके आरंभमें किया गया है, और तेरहवें अध्यायमें (१३. ७-११) ऐसे देहस्वभावकाही नाम 'ज्ञान' बतलाया है। इससे जान पड़ता है, कि 'ज्ञान' शब्दसे (१) एकीकरणकी मानसिक क्रियाकी पूर्णता, तथा (२) उस पूर्णताका देहस्वभावपर होनेवाला परिणाम, - ये दोनों अर्थ गीतामें विवक्षित हैं। अतः गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें (पृ. २४९- २५०) यह बात स्पष्टकर दी गयी है, कि बीसवें श्लोकमें वर्णित ज्ञानका लक्षण यद्यपि बाह्यतः मानसिक क्रियात्मक दिखायी देता है, तथापि उसीमें इस ज्ञानके कारण देहस्वभावपर होनेवाले परिणामका समावेश करना चाहिये। अस्तु; ज्ञानके भेद हो चुके। अब कर्मके भेद बतलाये जाते हैं :- ] (२३) फल-प्राप्तिकी इच्छा न करनेवाला मनुष्य, (मनमें) प्रेम या द्वेष न रख कर, बिना आसक्तिके (स्वधर्मानुसार) जो नियत अर्थात् नियुक्त किया हुआ कर्म करता है, उसको (कर्म) सात्त्विक कहते हैं। (२४) परंतु काम अर्थात् फलाशाकी इच्छा रखनेवाला अथवा अहंकार-बुद्धिका (मनुष्य) बड़े परिश्रमसे जो कर्म करता है, उसे राजस कहते हैं। (२५) तामस कर्म वह है, कि जो इन बातोंका विचार किये बिना मोहसे आरंभ किया जाता है, कि अनुबंधक अर्थात् आगे क्या होगा, पौरुष याने अपनी सामर्थ्य कितनी है, और (होनहारमें) नाश अथवा हिंसा होगी या नहीं। [ इन तीन प्रकारके कर्मोंसे सभी प्रकारके कर्मोंका समावेश हो जाता है। निष्काम कर्मोंकोही सात्त्विक अथवा उत्तम क्यों कहा है, (गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें इस बातका विवेचन किया गया है, उसे देखो) यही सच्चा अकर्मभी है (गीता ४. १६ पर हमारी टिप्पणी देखो)। गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, अतः स्मरण रहे, कि कर्मके उक्त लक्षणोंका वर्णन करते समय बार बार कर्ताकी बुद्धिका उल्लेख किया गया है, कर्मका सात्त्विकपन या तामसपन केवल उसके बाह्य परिणामसेही निश्चित नहीं किया गया है (गीता
८६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च तार्क तामस उच्यते ॥ २८ ॥ | र. प्र. १२, पृ. ३८२-३८३) । इसी प्रकार २५ वें श्लोकमें यहभी सिद्ध है, | कि फलाशाके छूट जाने पर यह न समझना चाहिये, कि अगला-पिछला या सारा- | सार विचार किये बिनाही चाहे जो कर्म किया जाय क्योंकि २५ वें श्लोकमे यह | निश्चय किया है, कि अनुबंध और फलका विचार किये विना जो कर्म किया | जाता है, वह तामस है; न कि सात्त्विक (गीतार. प्र. १२, पृ. ३८२-३८३) । | अब इसी तत्त्वके अनुसार कर्ताके भेद बतलाते हैं :- ] (२६) जिसे आसक्ति नहीं रहती, जो 'मै' और 'मेरा' नही कहता, कार्यकी सिद्धि हो या न हो, (दोनो समय) जो (मनसे) विकाररहित होकर धृति और उत्साहके साथ कर्म करता है, उसे सात्त्विक (कर्ता) कहते हैं। (२७) विषयासक्त, लोभी, (सिद्धिके समय) हर्ष (और असिद्धिके समय) शोकसे युक्त, कर्मफल पानेकी इच्छा रखनेवाला, हिमात्मक और अशुचि कर्ता राजस कहलाता है। (२८) अयुक्त अर्थात् चंचल बुद्धिवाला, असभ्य, गर्वमे फूलनेवाला, ठग, नैष्कृतिक याने दूसरोंकी हानि करनेवाला, आलसी, अप्रसन्नचित्त और दीर्घसूत्री अर्थात् देरी लगाने- वाला या घडी भरके कामको महीने भरमें करनेवाला कर्ता तामस कहलाता है। | [ २८ वें श्लोकमें नैष्कृतिक (निस् + कृत = छेदन करना, काटना) शब्दका | अर्थ दूसरेके कामका छेदन करनेवाला अथवा करनेवाला है। परंतु इसके बदले | कई लोग 'नैकृतिक' पाठ मानते हैं। अमरकोशमें 'निकृत'का अर्थ शठ लिखा | हुआ है। परंतु इस श्लोकमें शठ विशेषण पहले आ चुका है, इसलिये हमने | नैकृतिक पाठको स्वीकार किया है। इन तीन प्रकारके कर्त्ताओंमेंमे सात्त्विक | कर्ताही अकर्ता, अलिप्त कर्ता अथवा कर्मयोगी है। ऊपरवाले श्लोकसे प्रकट है, | कि फलाशा छोड़नेपरभी कर्म करनेका विश्वास, उत्साह और सारासार विचार | उस कर्मयोगीमें बनेही रहते हैं। जगतके त्रिविध विस्तारका यह वर्णनही अब | बुद्धि, धृति और सुखके विषयमेंभी किया जाता है। इन श्लोकोंमें बुद्धिका अर्थ | वही व्यवसायात्मका बुद्धि अथवा निश्चय करनेवाली इंद्रिय अभीष्ट है, कि | जिसका वर्णन दूसरे अध्यायमें (२. ४१) हो चुका है; और उसका स्पष्टीकरण | गीतारहस्यके छठे प्रकरणमे (पृ. १३९-१४३) किया गया है।]
अठारहवाँ अध्याय ८६१ § § बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥ यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥ § § धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ (२९) हे धनंजय ! गुणोंके कारण बुद्धि और धृतिकेभी जो तीन प्रकारके भिन्न भिन्न भेद होते हैं, उन सबको पृथक् पृथक् तुझसे कहता हूँ, सुन । (३०) हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति, अर्थात् किसी कर्मके करने, और निवृत्ति, अर्थात् किसी कर्मके न करनेको जानती है, एवं यह जानती है, कि कार्य अर्थात् करनेके योग्य काम क्या है और अकार्य अर्थात् करनेके अयोग्य क्या है, किससे डरना चाहिये और किससे नहीं, किससे बंधन होता है और किससे मोक्ष, वह ( बुद्धि ) सात्त्विक है । (३१) हे पार्थ ! वह बुद्धि राजसी है, कि जिसमे धर्म और अधर्मका, अथवा कार्य और अकार्यका, यथार्थ निर्णय नहीं होता । (३२) हे पार्थ ! वह बुद्धि तामसी, है कि जो तमसे व्याप्त होकर अधर्मको धर्म समझती है, और सब बातोंमें विपरीत याने उलटी समझ कर देती है । | [ इस प्रकार बुद्धिके विभाग करनेपर सदसद्विवेक-बुद्धि कोई स्वतंत्र | देवता नहीं रह जाती, किंतु सात्त्विक बुद्धिमेंही उसका समावेश करना पड़ता है । | विवेचन गीतारहस्यके प्रकरण ६, पृष्ठ १४२-१४३ में किया गया है। बुद्धिके | भेद हो चुके, अब धृतिके भेद बतलाते हैं :- ] (३३) हे पार्थ ! जिस अव्यभिचारिणी अर्थात् इधर उधर न डिगनेवाली धृतिसे मन, प्राण और इंद्रियोंके व्यापार, (कर्मफल-त्यागरूपी) योगके द्वारा चलाये जाते हैं, वह धृति सात्त्विक है । (३४) हे अर्जुन ! जिस धृतिसे धर्म, काम और अर्थ ( ये पुरुषार्थ ) चलाये जाते हैं और जो प्रसंगानुसार ( धर्म-अर्थ-कामके )
८६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥ § § सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ फलकी इच्छा रखती है, वह धृति राजस है । (३५) हे पार्थ ! जिस धृतिसे मनुष्य दुर्बुद्धि होकर निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद नहीं छोड़ता, वह धृति तामस है । | [ 'धृति' शब्दका अर्थ धैर्य है; परंतु यहाँपर शारीरिक धैर्यसे अभिप्राय | नहीं है, इस प्रकरणमें धृति शब्दका अर्थ मनका दृढनिश्चय है । निर्णय करना | बुद्धिका काम है सही; परंतु इस बातकीभी आवश्यकता है, कि बुद्धिके योग्य | निर्णय करनेपर वह सदैव स्थिर रहे । बुद्धिके निर्णयको ऐसा स्थिर या दृढ करना | मनका धर्म है । अतएव कहना चाहिये, कि धृति अथवा मानसिक धैर्यका गुण | मन और बुद्धि, दोनोंकी सहायतामे उत्पन्न होता है । परंतु इतना कह देनेसे | सात्त्विक धृतिका लक्षण पूर्ण नहीं हो जाता, कि अव्यभिचारी अर्थात् इधर उधर | विचलित न होनेवाले धैर्यके बलपर मन, प्राण और इंद्रियोंके व्यापार करने | चाहिये । बल्कि यहभी बतलाना चाहिये, कि ये व्यापार किसपर होते हैं, अथवा | इन व्यापारोंका कर्म क्या है; और वह कर्मयोगी शब्दसे सूचित किया गया है । | अतः 'योग' शब्दका अर्थ केवल 'एकाग्र चित्त' कर देनेसे काम नहीं चलता । | इसीलिये पूर्वोपर संदर्भके अनुसार, हमने इस शब्दका अर्थ, कर्मफल-त्यागरूपी | योग किया है । सात्त्विक कर्मके और सात्त्विक कर्ता आदिके लक्षण बतलाते समय | जैसे 'फलकी आसक्ति छोड़ने 'को प्रधान गुण माना है, वैसेही सात्त्विक धृतिका | लक्षण बतलानेसमयभी उसीको प्रधान मानना चाहिये; इसके सिवा अगलेही | श्लोकमें यह वर्णन है, कि राजस धृति फलाकांक्षी होती है । अतः उस | श्लोकसेभी सिद्ध होता है, कि सात्त्विक धृति, राजस धृतिके विपरीत | अफलाकांक्षी होनी चाहिये । तात्पर्य यह है, कि निश्चयकी दृढता तो निरी | मानसिक प्रक्रिया है, और उसके भली या बुरी होनेका विचार करनेके अर्थ यह | देखना चाहिये, कि जिस कार्यके लिये इस क्रियाका उपयोग किया जाता है, वह | कार्य कैसा है । नींद और आलस्य आदि कामोंमेंही यदि दृढनिश्चय किया गया | हो; तो वह तामस है; फलाशापूर्वक नित्य व्यवहारके काम करनेमें किया | गया हो तो राजस है; और फलाशा-त्यागरूपी योगमें दृढ निश्चय किया गया | हो, तो वह सात्त्विक है । इस प्रकार धृतिके भेद हुए । अब बतलाते हैं, कि | गुणभेदानुसार सुखकेभी तीन प्रकार कैसे होते हैं :- ] (३६) अब हे भरतश्रेष्ठ ! सुखकेभी तीन भेद बतलाता हूँ, सुन । अभ्याससे
अठारहवाँ अध्याय ८६३ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥ विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ अर्थात् निरंतर परिचयसे जिसमें रम जाता है और जहाँ दुःखका अंत होता है, (३७) जो आरंभमें (तो) विषके समान जान पड़ता है, परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है, जो आत्मनिष्ठ-बुद्धिकी प्रसन्नतामे प्राप्त होता है, उस (आध्यात्मिक) सुखको सात्त्विक कहते हैं। (३८) इंद्रियों और उनके विषयोके संयोगमे होनेवाला (अर्थात् आधिभौतिक) सुख राजस कहा जाता है, कि जो पहले तो अमृतके समान होता है पर अंतमें विष-सा रहता है। (३९) और जो आरंभमें एवं अनुबंध अर्थात् परिणाममेंभी मनुष्यको मोहमें फंसाता है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद अर्थात् कर्तव्यकी भूलमे उपजता है, उसे तामस सुख कहते हैं। [ ३७ वें श्लोकके आत्मबुद्धि शब्दका अर्थ हमने ‘आत्मनिष्ठ बुद्धि’ किया है, परंतु ‘आत्म’का अर्थ ‘अपना’ करके, उसी पदका अर्थ ‘अपनी बुद्धि’ भी हो सकेगा। क्योंकि पहले (६.२१) कहा गया है, कि अत्यंत सुख केवल ‘बुद्धि- मेही ग्राह्य’ और ‘अतींद्रिय’ होता है। परंतु अर्थ कोईभी क्यों न किया जाय, तात्पर्य तो एकही है। यदि कहा जावे, कि सच्चा और नित्य सुख इंद्रियोपभोगमे नहीं है, किंतु वह केवल बुद्धिग्राह्य है, तथापि जब विचार करते हैं, कि बुद्धिको यह सच्चा और अत्यंत सुख प्राप्त होनेके लिये क्या करना पड़ता है, तब गीताके छठे अध्यायसे (गीता ६. २१, २२) प्रकट होता है, कि यह परमावधिका सुख आत्मनिष्ठ बुद्धिके हुए बिना प्राप्त नहीं होता। ‘बुद्धि’ एक ऐसी इंद्रिय है, कि वह एक ओरमे त्रिगुणात्मक प्रकृतिके विस्तारकी ओर देखती है, और दूसरी ओर से उसको आत्मस्वरूपी परब्रह्मकाभी बोध हो सकता है, कि जो इस प्रकृतिके विस्तारके मूलमें अर्थात् प्राणिमात्रमें समानतासे व्याप्त है। तात्पर्य यह है, कि इंद्रियनिग्रहके द्वारा बुद्धिको त्रिगुणात्मक प्रकृतिके विस्तारमे हटाकर जहाँ अंतर्मुख और आत्मनिष्ठ किया - और पातंजलयोगके द्वारा साधनीय विषय यही है - तहाँ वह बुद्धि प्रसन्न हो जाती है, और मनुष्यको सत्य एवं आत्यंतिक सुखका अनुभव होने लगता है। गीतारहस्य के ५ वें प्रकरण (पृ. ११६-११७) में आध्यात्मिक सुखकी श्रेष्ठताका विवरण किया जा चुका है। यह बतलाते हैं, कि इस जगतमे सामान्यतः उक्त त्रिविध भेदही भर पड़ा है - ]
८६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥ § § ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ (४०) इस पृथ्वीपर आकाशमें अथवा देवताओंमें अर्थात् देवलोकमेंभी ऐसी कोई वस्तु नहीं कि जो प्रकृतिके इन तीन गणोंसे मुक्त हो । | [ अठारहवें श्लोकसे यहाँतक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके ! भेद बतलाकर, अर्जुनकी आंखोंके सामने इस बातका एक चित्र रख दिया है, कि | संपूर्ण जगतमें प्रकृतिके गुणभेदसे विचित्रता कैसे उत्पन्न होती है, तथा फिर | प्रतिपादन किया है, कि इन सब भेदोंमें सात्त्विक भेद श्रेष्ठ और ग्राह्य है। इन | सात्त्विक भेदोंमेंभी जो सबसे श्रेष्ठ स्थिति है, उसीको गीतामें त्रिगुणातीत अवस्था | कहा है। गीतारहस्यके सातवें प्रकरणमें (पृ. १६८-१६९) हम कह चुके हैं, | कि गीताके अनुसार त्रिगुणातीत अथवा निर्गुण अवस्था कोई स्वतंत्र या चौथा | भेद नहीं है, और इसी न्यायके अनुसार मनुस्मृतिमेंभी सात्त्विक गतिकेही फिर | उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ, ये तीन भेद करके कहा गया है, कि उत्तम सात्त्विक | गति मोक्षप्रद है, और मध्यम सात्त्विक गति स्वर्गप्रद है (मनु. १२. ४८-५०, | ८९-८१)। जगतमें जो प्रकृति है, उसकी विचित्रताका यहाँतक वर्णन किया | गया। अब निरूपण किया जाता है, कि इस गुणविभागसेही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाकी | उत्पत्ति कैसे हुई। यह बात पहले कई बार कही जा चुकी है, कि (गी. १८. ७-९, | -२३; ३. ८) प्रत्येक मनुष्यको स्वधर्मानुसार अपना 'नियत' अर्थात् नियुक्त | किया हुआ कर्म फलाशा छोड़कर, परंतु धृति, उत्साह और सारासार विचारके | साथ साथ करते जाना चाहिये, यही संसारमें उसका कर्तव्य है। परंतु जिस बातसे | यह कर्म 'नियत' होता है, उसका बीज अबतक कहींभी नहीं बतलाया गया। पीछे | एक बार चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाका कुछ थोड़ा-सा उल्लेखकर (४. १३) कहा | गया है, कि कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय शास्त्रके अनुसार करना चाहिये (गीता | १६. २४); परंतु जगतके व्यवहारोंको नियमानुसार जारी रखनेके हेतु | (गीतार. प्र. ११-१२, पृ. ३३६, ३९९-४००, प्र. १५, पृ. ४९६-४९७) जिस | गुणकर्मविभागके तत्त्वपर चातुर्वर्ण्यरूपी शास्त्र-व्यवस्था निर्मित की गयी है, | उसका पूर्ण स्पष्टीकरण उस स्थानमें नहीं किया गया है। अतएव जिस | संस्थासे समाजमें हर एक मनुष्यका कर्तव्य नियत होता है, अर्थात् स्थिर किया | जाता है, उस चातुर्वर्ण्यकी, गुणत्रयविभागके अनुसार, उपपत्ति बतलाकर उसके | साथही साथ अब प्रत्येक वर्णके नियत किये हुए कर्तव्यभी कहे जाते हैं:-] (४१) हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्म, उसके स्वभाव-
अठारहवाँ अध्याय ८६५ शमो दमस्तपःशौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ § § स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ जन्य अर्थात् प्रकृतिसिद्ध गुणोंके अनुसार पृथक् वंटे हुए हैं। (४२) ब्राह्मणका स्वभावजन्य कर्म शम, दम, तप, पवित्रता, क्षान्ति, सरलता (आर्जव), ज्ञान अर्थात् अध्यात्मज्ञान, विज्ञान याने विविध ज्ञान और आस्तिक्य-बुद्धि है। (४३) शूरता, तेजस्विता, धैर्य, दक्षता, युद्धसे न भागना, दान देना और (प्रजापर) शासन करना क्षत्रियका स्वाभाविक कर्म है। (४४) कृषि अर्थात् खेती, गोरक्षा याने पशुओंको पालनेका उद्यम, और वाणिज्य अर्थात् व्यापार वैश्यका स्वभावजन्य कर्म है; और इसी प्रकार, सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है। | [ यह न समझा जाय, कि यह उपपत्ति गीतामेंही पहले बतलायी गयी है, | कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था स्वभावजन्य गुणभेदसे निर्मित हुई है; किंतु महाभारतके | वनपर्वान्तर्गत नहुष-युधिष्ठिर-संवादमें और द्विज-व्याध-संवादमें (वन. १८०, | २११), शांतिपर्वके भृगु-भारद्वाज-संवादमें (शां. १८८), अनुशासनपर्वके | उमा-महेश्वर-संवादमें (अनु. १४३), और अश्वमेधपर्वकी (अश्व. ३९. ११) | अनुगीतामें गुणभेदकी यही उपपत्ति कुछ अंतरसे पायी जाती है। यह पहलेही | कहा जा चुका है, कि जगतके विविध व्यवहार प्रकृतिके गुणभेदसे हो रहे हैं, और | फिर सिद्ध किया गया है, कि जिस चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थासे, यह नियत किया जाता | है, कि किसे क्या करना चाहिये, वह व्यवस्थाभी प्रकृतिके गुणभेदका परिणाम | है। अब यह प्रतिपादन करते हैं, कि उक्त कर्म हरएक मनुष्यको निष्काम बुद्धिसे | अर्थात् परमेश्वरार्पण-बुद्धिसेही करने चाहिये, अन्यथा जगतका कारोबार नहीं | चल सकता; तथा मनुष्यके इस प्रकारके आचरणसेही सिद्धि प्राप्त हो जाती है, | सिद्धि पानेके लिये और कोई दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है :- ] (४५) अपने अपने (स्वभावजन्य गुणोंके अनुसार प्राप्त होनेवाले) कर्मोंमें नित्य रत (रहनेवाला) पुरुष (उसीसे) परम सिद्धि पाता है। सुन, अपने कर्मोंमें गी. र. ५५
८६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥ § § श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ तत्पर रहनेसे सिद्धि कैसे मिलती है (४६) प्राणिमात्रकी जिसमे प्रवृत्ति हुई है और जिसने इस सारे जगतका विस्तार किया है अथवा जिससे यह सब जगत व्याप्त है, उसकी अपने ( स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले ) कर्मोके द्वारा ( केवल वाणी अथवा फूलोंसे नहीं ) पूजा करनेसेही मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है । | [ इस प्रकार प्रतिपादन किया गया, कि चातुर्वर्ण्यके अनुसार प्राप्त होने- | वाले कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे अथवा परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करनाही विराट्- | स्वरूपी परमेश्वरका एक प्रकारका यजन-पूजनही है, तथा उसीसे सिद्धि मिल | जाती है ( गीतार. प्र. १३, पृ. ४३९-४४० ) । अब उक्त गुण-कर्म-भेदानुसार | मनुष्यको स्वभावतःही प्राप्त होनेवाला कर्तव्य किसी दूसरी दृष्टिसे कदाचित् | सदोष, अश्लाघ्य, कठिन अथवा अप्रियभी हो सकता है ( उदाहरणार्थ, इस | अवसरपर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करनेमें हत्या होनेके कारण वह सदोष | दिखायी देगा, तो ऐसे समयपर मनुष्यको क्या करना चाहिये ? क्या वह स्वधर्म | छोड़कर अन्य धर्म स्वीकार कर ले ( गीता ३. ३५ ), या कुछभी हो, स्वकर्मकोही | करता जावें, और यदि स्वकर्मही करना चाहिये, तो कैसे करे ? - इत्यादि | प्रश्नोंका उत्तर उसी न्यायके अनुरोधसे बतलाया जाता है, कि जो इस अध्यायके | आरंभके ( १८. ६ ) यज्ञयाग आदि कर्मोंके संबंधमें कहा गया है :- ] ( ४७ ) यद्यपि परधर्मका आचरण सहज हो, तोभी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्यविहित कर्म, विगुण याने सदोष होनेपरभी अधिक कल्याण- कारक है; स्वभावसिद्ध अर्थात् गुणस्वभावानुसार निर्मित चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था द्वारा नियत किया हुआ अपना कर्म करनेमें कोई पाप नहीं लगता । ( ४८) हे कौन्तेय ! जो कर्म सहज है, अर्थात् जन्मसेही गुण-कर्म-विभागानुसार नियत हो गया है, वह सदोष हो, तोभी उसे ( कभी ) न छोड़ना चाहिये । क्योंकि संपूर्ण आरंभ अर्थात् उद्योग ( किसी न किसी ) दोषसे वैसेही व्याप्त रहते हैं, जैसे कि धुएँसे आग घिरी रहती है । ( ४९ ) . ( अतएव ) कहींभी आसक्ति न रखकर, मनको वशमें करके
अठारहवाँ अध्याय ८६७
निष्काम बुद्धिसे चलनेपर (कर्मफलके) संन्यास-द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त हो जाती है। [इस उपसंहारात्मक अध्यायमें पहले बतलाये हुए उन्हीं विचारोंको अब फिरसे व्यक्त कर दिखलाया गया है, कि पराये धर्मकी अपेक्षा स्वधर्म भला है (गीता ३. ३५), और नैष्कर्म्य-सिद्धि पानेके लिये कर्म छोड़नेकी आवश्य- कता नहीं है (गीता ३. ४), इत्यादि। हम गीताके तीसरे अध्यायके चौथे श्लोककी टिप्पणीमें ऐसे प्रश्नोंका स्पष्टीकरण कर चुके हैं, कि नैष्कर्म्य क्या है और सच्ची नैष्कर्म्य-सिद्धि किसे कहना चाहिये। उक्त सिद्धान्तकी महत्ता इस बातपर ध्यान दिये रहनेसे सहजही समझमें आ जावेगी, कि संन्यास-मार्गवालोंकी दृष्टि केवल मोक्षपरही रहती है, और भगवान्की दृष्टि मोक्ष एवं लोकसंग्रह, दोनोंपरभी समानही है। लोकसंग्रहके लिये अर्थात् समाजके धारण और पोषणके निमित्त ज्ञान-विज्ञानयुक्त पुरुष, अथवा रणमें तलवारका जौहर दिखलानेवाले शूर क्षत्रिय, तथा किसान, वैश्य, रोजगारी, लुहार, बढ़ई, कुम्हार और मांस- विक्रेता व्याधतककीभी आवश्यकता है। परंतु यदि कहा जाय, कि कर्म छोड़े बिना मोक्ष नहीं मिलता, तो इन सब लोगोंको अपना अपना व्यवसाय छोड़कर संन्यासी बन जाना चाहिये! कर्मसंन्यास-मार्गके लोग इस बातकी परवाह नहीं करते, परंतु गीताकी दृष्टि इतनी संकुचित नहीं है। इसलिये गीता कहती है, कि अपने अधिकारके अनुसार प्राप्त हुए व्यवसायको छोड़कर, दूसरेके व्यवसायको भला समझकर, करने लगना उचित नहीं है। कोईभी व्यवसाय लीजिये। उसमें कुछ-न-कुछ त्रुटि अवश्य रहतीही है। जैसे ब्राह्मणके लिये विशेषतः विहित जो क्षान्ति है (गीता १८. ४२), उसमेंभी एक बड़ा दोष यह है, कि "क्षमावान् पुरुष दुर्बल समझा जाता है' (मभा. शां. १६०. ३४); और व्याधके पेशेमें मांस बेचनाभी एक झंझटही है (मभा. वन. २०६)। परंतु कठिनाइयोंसे उकताकर इन कर्मोंकोही छोड़ बैठना उचित नहीं है। किसीभी कारणसे क्यों न हो, जब एक बार, किसी कर्मको अपना लिया, तो फिर उसकी कठिनाई या अप्रियताकी परवाह न करके, उसे आसक्ति छोड़कर रहनाही चाहिये। क्योंकि मनुष्यकी लघुता-महत्ता उसके व्यवसायपर निर्भर नहीं है, किंतु जिस बुद्धिसे वह अपना व्यवसाय या कर्म करता है, उसी बुद्धिपर उसकी योग्यता अध्यात्मदृष्टिसे अवलंबित रहती है (गीता २. ४९)। जिसका मन शांत है, और जिसने सब प्राणियोंके अंतर्गत एकताको पहचान लिया है, वह मनुष्य जाति या व्यवसायसे चाहे व्यापारी हो, चाहे कसाई; निष्काम बुद्धिसे उक्त व्यवसाय करनेवाला वह मनुष्य स्नानसंध्याशील ब्राह्मण अथवा शूर क्षत्रियकी बराबरीका माननीय और मोक्षका अधिकारी है। यही नहीं, वरन् ४९ वें श्लोकमें स्पष्ट कहा है, कि कर्म छोड़नेसे जो सिद्धि प्राप्त की जाती है, वही निष्काम