श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 896, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि संप्रदायोंकी दृष्टिसे इस श्लोकका ठीक ठीक अर्थ नहीं लगता। वास्तवमें इसका अर्थ कर्मयोग-प्रधानही करना चाहिये, अर्थात् फलाशा छोड़कर मरण- पर्यंत सारे कर्म करते जानेका जो तत्त्व गीतामें पहले अनेक बार कहा गया है, उसीके अनुरोधसे यहाँभी अर्थ करना चाहिये; तथा यही अर्थ सरल है और ठीक ठीक जमताभी है। पहले इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि 'काम्य' शब्दसे इस स्थानमें मीमांसकोंका नित्य, नैमित्तिक, काम्य, और निषिद्ध कर्मविभाग अभिप्रेत नहीं है। कर्मयोग-मार्गमें सब कर्मोंके दोही विभाग किये जाते हैं, एक 'काम्य' अर्थात् फलाशासे किये हुए कर्म और दूसरे 'निष्काम' अर्थात् फलाशा छोड़कर किये हुए कर्म; मनुस्मृतिमें उन्हींको क्रमसे 'प्रवृत्त' कर्म और 'निवृत्त' कर्म कहा है (मनु. १२. ८८, ८९)। कर्म चाहे नित्य हों, नैमित्तिक हों, काम्य हों, कायिक हों, वाचिक हों, मानसिक हों, अथवा सात्त्विक आदि भेदके अनुसार और किसी प्रकारके हों, उन सबको 'काम्य' अथवा 'निष्काम' वर्गोंमें इन दो, किसीएक विभागमें आनाही चाहिये। क्योंकि काम अर्थात् फलाशाका होना अथवा न होना, इन दोनोंके अतिरिक्त फलाशाकी दृष्टिसे तीसरा भेद होही नहीं सकता। शास्त्रमें जिस कर्मका जो फल कहा गया है, जैसे, पुत्रप्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि, उस फलकी प्राप्तिके लिये वह कर्म किया जाय, तो वह 'काम्य' है; तथा मनमें उस फलकी इच्छा न रखकर वही कर्म केवल कर्तव्य समझकर किया जाय, तो वह 'निष्काम' हो जाता है। इस प्रकार सब कर्मोंके 'काम्य' और 'निष्काम' (अथवा मनुकी परिभाषाके अनुसार प्रवृत्त और निवृत्त) येही दो भेद सिद्ध होते हैं। अब कर्मयोगी सब 'काम्य' कर्मोंको सर्वथा छोड़ देता है, अतः सिद्ध हुआ, कि कर्मयोगमेंभी काम्य कर्मोंका संन्यास करना पड़ता है। फिर बच रहे निष्काम कर्म। सो गीतामें कर्मयोगीको निष्काम कर्म करनेका निश्चित उपदेश किया गया है सही; परंतु उसमेंभी 'फलाशा'का सर्वथा त्याग करना पड़ता है (गीता ६. २)। अतएव त्यागका तत्त्वभी गीता-धर्ममें स्थिरही रहता है। सारांश अर्जुनको यही बात समझा देनेके लिये, कि सब कर्मोंको न छोड़नेपरभी कर्मयोग-मार्गमें 'संन्यास' और 'त्याग', दोनों तत्त्व बने रहते हैं, इस श्लोकमें संन्यास और त्याग, दोनोंकी व्याख्याएँ यों की गई हैं, कि 'संन्यास'का अर्थ 'काम्य कर्मोंको सर्वथा छोड़ देना' है, और 'त्याग'का यह मतलब है, कि "जो कर्म करना हों, उनकी फलाशा न रखें।" पीछे जब यह प्रतिपादन हो रहा था, कि संन्यास (अथवा सांख्य) और योग ये दोनों तत्त्वतः एकही हैं; तब 'संन्यासी' शब्दका अर्थ (गीता ५. ३-६, ६. १,२) तथा इसी अध्यायमें आगे 'त्यागी' शब्दका अर्थभी (गीता. १८. ११) इसी भाँति किया गया है, और इस स्थानमें वही अर्थ इष्ट है। यहाँ स्मार्तोंका यह मत प्रतिपाद्य नहीं है, कि क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ आश्रमका पालन करनेपर