भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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८५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥ निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥ एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥ | "अंतमें प्रत्येक मनुष्यको सर्वकर्मत्यागरूपी संन्यास अथवा चतुर्थाश्रम लिये बिना | मोक्षप्राप्तिही हो नहीं सकती ।" इससे सिद्ध होता है, कि कर्मयोगी यद्यपि | संन्यासियोंका गेरुआ भेष धारणकर सब कर्मोंका त्याग नहीं करता, तथापि | वह संन्यासके सच्चे तत्त्वका पालन किया करता है, इसलिये कर्मयोगका स्मृति- | ग्रंथसे कोई विरोध नहीं है । अब संन्यास-मार्ग - और मीमांसकोंके कर्मसंबंधी | वादका उल्लेख करके कर्मयोगशास्त्रका, इस विषयमें अंतिम निर्णय सुनाते हैं :-] ( ३ ) कई पंडितोंका कथन है, कि कर्म दोषयुक्त है, अतएव उसका (सर्वथा) त्याग करना चाहिये; तथा दूसरे कहते हैं, कि यज्ञ, दान, तप और कर्मको कभी न छोड़ना चाहिये । ( ४ ) अतएव हे भरतश्रेष्ठ ! त्यागके विषयमें मेरा निर्णय सुन । हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है । ( ५ ) यज्ञ, दान, तप और कर्मका त्याग न करना चाहिये; इनको ( कर्मों ) करनाही चाहिये । यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानोंके लिये (भी) पवित्र अर्थात् चित्तशुद्धिकारक हैं । ( ६ ) अतएव इन ( यज्ञ, दान आदि ) कर्मोंकोभी बिना आसक्ति रखे, फलोंका त्याग करके ( अन्य निष्काम कर्मोंके समानही लोकसंग्रहके हेतु ) करते रहना चाहिये । हे पार्थ ! इस प्रकार मेरा निश्चित मत ( है, और वही ) उत्तम है : | [ कर्मका दोष अर्थात् बंधकता कर्ममें नहीं, फलाशामें है, इसलिये पहले | अनेक बार जो कर्मयोगका यह तत्त्व कहा गया है, कि सभी कम फलाशा छोड़- | कर निष्काम बुद्धिसे करने चाहिये, उसका यह उपसंहार है । संन्यास मार्गका यह | मत गीताको मान्य नहीं है, कि सब कर्म दोषयुक्त, अतएव त्याज्य हैं ( गीता | १८. ४८, ४९ ), गीता केवल काम्य-कर्मोंका संन्यास करनेके लिये कहती है । | परंतु धर्मशास्त्रमें जिन कर्मोंका प्रतिपादन है, वे सभी काम्यही हैं ( गीता २. | ४२-४४ ) । इसलिये अब कहना पड़ता है, कि उनकाभी संन्यास करना | चाहिये; और यदि ऐसा करते हैं, तो यज्ञ-चक्र बंद हुआ जाता है ( ३. १६) एवं