भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 956 में से

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पृष्ठ 898

अठारहवाँ अध्याय ८५३ § § नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥ दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥ कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥ [ उसमे सृष्टिके उद्ध्वस्त होनेकाभी अवसर आ जाता है। प्रश्न होता है, कि फिर करना क्या चाहिये ? गीता इसका यों उत्तर देती है, कि यद्यपि शास्त्रमें कहा है, कि यज्ञ, दान प्रभृति कर्म स्वर्गादि फलप्राप्तिके हेतु करो, तथापि ऐसी बात नहीं है, कि येही कर्म लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे न हो सकते हों, कि यज्ञ करना, दान देना और तप करना आदि मेरा कर्तव्य है (गीता १७ ११, १३. २०)। अतएव लोकसंग्रहकेनिमित्त स्वधर्मके अनुसार जैसे अन्यान्य निष्काम कर्म किये जाते हैं वैसेही यज्ञ, दान आदि कर्मोंकोभी फलाशा और आसक्ति छोड़कर करना चाहिये। क्योंकि वे सदैव 'पावन' अर्थात् चित्तशुद्धिकारक अथवा परोपकार बुद्धि बढ़ानेवाले हैं। मूल श्लोकमें जो 'एतान्यपि – येभी' शब्द हैं, उनका अर्थ यही है, कि "अन्य निष्काम कर्मोंके समान ये यज्ञ, दान आदि कर्मभी करने चाहिये।" इस रीतिसे ये सब कर्म फलाशा छोड़कर अथवा भक्ति-दृष्टिसे केवल परमेश्वरार्पण-बुद्धिपूर्वक किये जावें, तो सृष्टिका चक्र चलता रहेगा। और कर्ताके मनकी फलाशा छूट जानेके कारण ये कर्म मोक्ष-प्राप्तिमेंभी बाधा नहीं डाल सकते, इस प्रकार सब बातोंका ठीक ठीक मेल मिल जाता है। कर्मके विषयमें कर्मयोगशास्त्रका यही अंतिम और निश्चित सिद्धान्त है (गीता २. ४५ पर हमारी टिप्पणी देखो)। मीमांसकोंके कर्म-मार्ग और गीताके कर्मयोगका भेद गीतारहस्यमें (प्र. १०, पृ. २९५-२९७; प्र. ११, पृ. ३४५- ३४८) अधिक स्पष्टतासे दिखाया गया है। अर्जुनके प्रश्न करनेपर संन्यास और त्यागके अर्थोंका कर्मयोगकी दृष्टिसे इस प्रकार स्पष्टीकरण हो चुका; अब सात्विक आदि भेदोंके अनुसार कर्म करनेकी भिन्न-भिन्न रीतियोंका वर्णन करके उसी अर्थको दृढ़ करते हैं। ] (७) जो कर्म (स्वधर्मके अनुसार) नियत अर्थात् स्थिरकर दिये गये हैं, उनका संन्यास याने त्याग करना (किसीकोभी) उचित नहीं है। उनका, मोहसे किया हुआ त्याग तामस कहलाता है। (८) शरीरको कष्ट होनेके डरसे, अर्थात् दुःखकारक होनेके कारणही, यदि कोई कर्म छोड़ दे, तो उसका वह त्याग राजस हो जाता है, (तथा) त्यागका फल उसे नहीं मिलता। (९) हे अर्जुन! (स्वधर्मा-

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