भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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८५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ § § अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥ नुसार) नियत कर्म जब कार्य अथवा कर्तव्य समझकर और आसक्ति एवं फलको छोड़कर किया जाता है, तब वह सात्त्विक त्याग समझा जाता है। | [सातवें श्लोकके 'नियत' शब्दका अर्थ कुछ लोग नित्यनैमित्तिक आदि | भेदोंमेंसे 'नित्य' कर्म समझते हैं, किंतु वह ठीक नहीं है "नियतं कुरु कर्म त्वम्" | (गीता ३. ८) पदमें 'नियत' शब्दका जो अर्थ है, वही अर्थ यहाँपरभी करना | चाहिये, और हम ऊपर कह चुके हैं, कि यहाँ मीमांसकोंकी परिभाषा विवक्षित | नहीं है। गीता ३. १९ में 'नियत' शब्दके स्थानमें 'कार्य' शब्द आया है और यहाँ | नवें श्लोकमें 'कार्य' एवं 'नियत' ये दोनों शब्द एकत्र आ गये हैं। इस अध्यायमें | आरंभमें, दूसरे श्लोकमें, यह कहा गया है, कि स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले | किसीभी कर्मको न छोड़कर, उसीको कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिये | (गीता ३. १९), इसीको सात्त्विक त्याग कहते हैं, इतनाही नहीं, तो कर्मयोग- | शास्त्रमें इसीको 'त्याग' अथवा 'संन्यास' कहते हैं, इसी सिद्धान्तका इस श्लोकमें | समर्थन किया गया है। इस प्रकार त्याग या संन्यासके अर्थोंका स्पष्टीकरण हो | चुका; अब इसी तत्त्वके अनुसार बतलाते हैं, कि वास्तविक त्यागी या संन्यासी | कौन है :—] (१०) जो किसी अकुशल अर्थात् अकल्याणकारक कर्मका द्वेष नहीं करता, तथा कल्याणकारक अथवा हितकारी कर्ममें अनुषक्त नहीं होता, उसे सत्त्वशील, बुद्धिमान् और संदेहविरहित त्यागी अर्थात् संन्यासी कहना चाहिये। (११) क्योंकि जो देहधारी है, उससे, कर्मोंका निःशेष त्याग होना संभव नहीं है, अतएव जिसने (कर्म न छोड़कर) केवल कर्मफलोंका त्याग किया हो, वही (सच्चा) त्यागी अर्थात् संन्यासी है : | [अब यह बतलाते हैं, कि उक्त प्रकारसे, अर्थात् कर्म न छोड़कर केवल | फलाशा छोड़करके, जो त्यागी हुआ हो, उसे उसके कर्मके कोईभी फल बंधक | नहीं होते :—] (१२) मृत्युके अनन्तर अत्यागी मनुष्यको अर्थात् फलाशाका त्याग न करनेवाले को तीन प्रकारके फल मिलते हैं – अनिष्ट, इष्ट और (कुछ इष्ट और