भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अठारहवाँ अध्याय ८५५ § § पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥ शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥ § § तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥ कुछ अनिष्ट मिला हुआ ) मिश्र । परंतु संन्यासीको अर्थात् फलाशा छोड़कर कर्म करनेवालेको ( ये फल ) कभी नहीं मिलते, अर्थात् बाधा नहीं कर सकते । | [ त्याग, त्यागी और संन्यासी संबंधी उक्त विचार पहले ( गीता ३. ४-७ ; | ५. २-१० ; ६. १ ) कई स्थानोंमें आ चुके हैं, उन्हींका यहाँ उपसंहार किया | गया है । समस्त कर्मोंका संन्यास गीताको कभीभी इष्ट नहीं है । फलाशाका त्याग | करनेवाला पुरुषही गीताके अनुसार सच्चा अर्थात् नित्य-संन्यासी है ( गीता | ५. ३ ) । ममतायुक्त फलाशाका अर्थात् अहंकार-बुद्धिका त्यागही सच्चा त्याग | है। इसी सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये अब और कारण दिखलाते हैं :- ] (१३) हे महाबाहु ! सब कर्मोंकी सिद्धिके लिये सांख्योंके सिद्धान्तमें जो पाँच कारण कहे गये हैं; उन्हें मैं बतलाता हूँ, सुन । (१४) अधिष्ठान (स्थान), तथा कर्ता, भिन्न भिन्न करण याने साधन या हथियार, (कर्ताकी) अनेक प्रकारकी पृथक् पृथक् चेष्टाएँ अर्थात् व्यापार, और उसके साथही साथ पाँचवाँ (कारण) दैव है । (१५) शरीरसे, वाणीसे अथवा मनसे मनुष्य जो जो कर्म करता है, फिर चाहे वह न्याय्य हो या विपरीत अर्थात् अन्याय्य उसके उक्त पाँच कारण हैं । (१६) ( वास्तविक ) स्थिति ऐसी होनेपरभी, जो संस्कृत बुद्धि न होनेके कारण यह समझे, कि मैंही अकेला कर्ता हूँ, ( समझना चाहिये, कि ), वह दुर्मति कुछभी नहीं जानता । (१७) जिसमें यह भावना नहीं है, कि मैं कर्ता हूँ तथा जिसकी बुद्धि अलिप्त है, वह यदि इन लोगोंको मार डाले, तथापि (समझना चाहिये, कि ) उसने उन्हें नहीं मारा है, और वह ( कर्म ) उसे बंधकभी नहीं होता । | [ कई टीकाकारोंने तेरहवें श्लोकके 'सांख्य' शब्दका अर्थ वेदान्तशास्त्र | किया है। परंतु अगला अर्थात् चौदहवाँ श्लोक नारायणी धर्ममें ( मभा. शां.