भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 901

८५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । ३४७. ८७ ) अक्षरशः आया है, और वहां उसके पूर्व कापिल-सांख्यके प्रकृति और पुरुष - तत्त्वोंका उल्लेख है, अतः हमारा यह मत है, कि - 'सांख्य' शब्दसे इस स्थानमें कापिल-सांख्यशास्त्रही अभिप्रेत है। गीतामें यह सिद्धान्त पहले अनेक बार कहा गया है, कि मनुष्यको न तो कर्मफलकी आशा करनी चाहिये, और न ऐसी अहंकार-बुद्धि मनमें रखनी चाहिये, कि मैं अमुक करूँगा ( गीता २. १९; २. ४७; ३. २७; ५. ८-११; १३. २० ) ; और यहांपर वही सिद्धान्त यह कहकर दृढ़ किया गया है, कि "कर्मका फल होनेके लिये अकेला मनुष्यही कारण नहीं है" ( गीतार. प्र. ११ ) । चौदहवें श्लोकका अर्थ यह है, कि मनुष्य इस जगतमें हो या न हो, प्रकृतिके स्वभावके अनुसार जगतका अखंडित व्यापार सदैव चलताही रहता है; और जिस कर्मको मनुष्य अपनी करनी समझता है, वह केवल उसीके यत्नका फल नहीं है, वरन् उसके यत्न और संसारके अन्य व्यापारों अथवा चेष्टाओंकी सहायताका परिणाम है। उदाहरणार्थ खेती केवल मनुष्यकेही यत्नपर निर्भर नहीं है, उसकी सफलताके लिये धरती, बीज, पानी, खाद और बैल आदिके गुणधर्म अथवा व्यापारोंकी सहायता आव- श्यक होती है। इसी प्रकार, मनुष्यके प्रयत्नकी सिद्धि होनेके लिये जगतके जिन विविध व्यापारोंकी सहायता आवश्यक है, उनमेंसे कुछ व्यापारोंको जानकर, उनकी अनुकूलता पाकरही मनुष्य यत्न किया करता है। परंतु हमारे प्रयत्नोंके लिये अनुकूल अथवा प्रतिकूल, सृष्टिके औरभी कई व्यापार ऐसे हैं, कि जिनका हमें ज्ञान नहीं है। इसीको दैव कहते हैं; और कर्मकी घटनाका यह पाँचवाँ कारण कहा गया है। मनुष्यका यत्न सफल होनेके लिये जब इतनी सब बातोंकी आवश्यकता है, तथा जब उनमेंसे कई या तो हमारे वशकी नहीं या हमें ज्ञातभी नहीं रहतीं, तब यह बात स्पष्टतया सिद्ध होती है, कि मनुष्यका ऐसा अभिमान रखना निरी मूर्खता है, कि मैं अमुक काम करूँगा; अथवा ऐसी फलाशा रखनाभी मूर्खताका लक्षण है, कि मेरे कर्मका फल अमुकही होना चाहिये (गीतार. प्र. ११, पृ. ३१८-३१९ ) । तथापि सत्रहवें श्लोकका अर्थ योभी न समझ लेना चाहिये, कि जिसकी फलाशा छूट जाय, वह चाहे जो कुकर्म कर सकता है। साधारण मनुष्य जो कुछ करते हैं, वह स्वार्थके लोभसे करते हैं, इसलिये उनका बर्ताव अनुचित हुआ करता है। परंतु जिसका स्वार्थ या लोभ नष्ट हो गया है, अथवा फलाशा पूर्णतया विलीन हो गयी है और जिसे प्राणिमात्र समानही हो गये हैं, उससे किसीकाभी अनहित नहीं हो सकता। कारण यह है, कि दोष बुद्धिमें रहता है, न कि कर्ममें। अतएव सत्रहवें श्लोकका यही तात्पर्य है, कि जिसकी बुद्धि पहलेसे शुद्ध और पवित्र हो गयी हो, उसका किया हुआ कोई कर्म यद्यपि लौकिक दृष्टिसे विपरित भलेही दिखलाई दे; तोभी न्यायतः कहना पड़ता है, कि उसका बीज शुद्धही होगा; फलतः उस कामके लिये फिर उस शुद्ध-बुद्धि-