भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 902

अठारहवाँ अध्याय ८५७ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥ | वाले मनुष्यको जिम्मेदार न समझना चाहिये। स्थितप्रज्ञ, अर्थात् शुद्ध-बुद्धिवाले, | मनुष्यकी निष्पापताके इस तत्त्वका वर्णन उपनिषदोंमेंभी है (कौषी ३. १; | पंचदशी. १४. १६, १७) । गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमेंभी (पृ. ३७२- | ३७६) इस विषयका पूर्ण विवेचन किया गया है, इसलिये यहाँपर उसके | अधिक विस्तारकी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार अर्जुनके प्रश्न करनेपर | संन्यास और त्याग शब्दोंके अर्थकी मीमांसा-द्वारा यह सिद्ध कर दिया, कि | स्वधर्मानुसार जो कर्म प्राप्त होते जायें, उन्हें अहंकार-बुद्धि और फलाशा छोड़- | कर करते रहनाही सात्त्विक अथवा सच्चा त्याग है; कर्मोंको छोड़ बैठना सच्चा | त्याग नहीं है। अब सत्रहवें अध्यायमें कर्मके सात्त्विक आदि भेदोंका जो विचार | आरंभ किया गया था, उसीको यहाँ कर्मयोगकी दृष्टिसे पूरा करते हैं। ] (१८) कर्मचोदना तीन प्रकारकी है - ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता; तथा कर्मसंग्रह तीन प्रकारका है - करण, कर्म और कर्ता। (१९) गुणसंख्यानशास्त्रमें अर्थात् कापिल-सांख्यशास्त्रमें कहा है, कि ज्ञान, कर्म और कर्ता ( प्रत्येक सत्त्व, रज और तम इन तीन ) गुणोंके भेदोंसे तीन-तीन प्रकारके हैं। उन (प्रकारों) को ज्यों-के-त्यों (तुझे बतलाता हूँ,) सुन । | [ कर्मचोदना और कर्मसंग्रह पारिभाषिक शब्द हैं। इंद्रियोंके द्वारा कोईभी | कर्म होनेके पूर्व, मनसे उसका निश्चय करना पड़ता है। अतएव इस मानसिक | विचारको 'कर्मचोदना' अर्थात् कर्म करनेकी प्राथमिक प्रेरणा कहते हैं; और | वह स्वभावतः ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञाताके रूपसे तीन प्रकारकी होती है। एक उदाहरण | लीजिये :- प्रत्यक्ष घड़ा बनानेके पूर्व कुम्हार ( ज्ञाता ) अपने मनसे निश्चय | करता है, कि मुझे अमुक बात (ज्ञेय) करनी है, और वह अमुक रीतिसे (ज्ञान) | होगी। यह क्रिया कर्मचोदना हुई। इस प्रकार मनका निश्चय हो जानेपर वह | कुम्हार (कर्ता) मिट्टी, चाक इत्यादि साधन (करण) इकट्ठेकर प्रत्यक्ष घड़ा | (कर्म) तैयार करता है। यह कर्मसंग्रह हुआ। कुम्हारका कर्म घट तो है; पर | उसीको मिट्टीका कार्यभी कहते हैं। इससे मालूम होगा, कि कर्मचोदना शब्दसे | मानसिक अथवा अन्तःकरणकी क्रियाका बोध होता है, और कर्मसंग्रह शब्दसे | उसी मानसिक क्रियाकी जोड़की बाह्यक्रियाओंका बोध होता है। किसीभी | कर्मका पूर्ण विचार करना हो, तो 'चोदना' और 'संग्रह', दोनोंका विचार