श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥ पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ | करना चाहिये । इनमेंसे ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके (क्षेत्रज्ञ) लक्षण प्रथमही तेरहवें | अध्यायमें (१३. १८) अध्यात्म-दृष्टिसे बतला चुके हैं। परंतु क्रियारूपी ज्ञानका | लक्षण कुछ पृथक् होनेके कारण अब इस त्रयीमेंसे ज्ञानकी, और दूसरी त्रयीमेंसे | कर्म एवं कर्ताकी, व्याख्याएँ दी जाती हैं :- ] (२०) जिस ज्ञानसे यह मालूम होता है, कि विभक्त अर्थात् भिन्न भिन्न सब प्राणियोंमें एकही अविभक्त और अव्यक्त भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान समझ । (२१) जिस ज्ञानसे इस पृथक्त्वका बोध होता है, कि समस्त प्राणिमात्रमें भिन्न भिन्न प्रकारके अनेक भाव हैं, उसे राजस ज्ञान समझ । (२२) परंतु जो निष्कारण और तत्त्वार्थको बिना जाने-बूझे एकही बातमें यह समझ कर आसक्त रहता है, कि यही सब कुछ है, वह अल्प ज्ञान तामस कहा गया है। | [ ये भिन्न भिन्न ज्ञानोंके लक्षण बहुत व्यापक हैं। अपने बाल-बच्चों और | स्त्रीकोही सारा संसार समझना तामस ज्ञान है। इससे कुछ ऊँची सीढ़ीपर पहुँचनेसे | दृष्टि अधिक व्यापक होती जाती है और अपने गाँवका अथवा देशका मनुष्यभी | अपना-सा जँचने लगता है; तोभी यह बुद्धि बनी रहती है, कि भिन्न भिन्न गाँवों | अथवा देशोंके लोग भिन्न भिन्न हैं। यही ज्ञान राजस कहलाता है। परंतु इससेभी | ऊँचे जाकर प्राणिमात्रमें एकही आत्माको पहचानना पूर्ण और सात्त्विक ज्ञान | है। सार यह हुआ, कि 'विभक्तमें अविभक्त' अथवा 'अनेकतामें एकता 'को | पहचाननाही ज्ञानका सच्चा लक्षण है; और बृहदारण्यक एवं कठोपनिषदोंके | वर्णनानुसार जो यह पहचान लेता है, कि इस जगतमें नानात्व नहीं है – “नेह | नानास्ति किंचन ” – वह मुक्त हो जाता है; परंतु जो इस जगतमें अनेकता | देखता है, वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा रहता है – “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति | य इह नानेव पश्यति” ( बृ. ४. ४. १९; कठ. ४. ११) । इस जगतमें जो कुछ | ज्ञान प्राप्त करना है, वह यही है ( गीता १३. १६ ) ; और ज्ञानकी यही परम | सीमा है; क्योंकि सभीके एक हो जानेपर फिर एकीकरणकी ज्ञानक्रियाको आगे | स्थानही नहीं रहता ( गीतार. प्र. ९, पृ. २३२-२३३ ) । एकीकरण करनेकी | इस ज्ञानक्रियाका निरूपण गीतारहस्यके नवे प्रकरण में ( पृ. २१६-२१७ )