भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 956 में से

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पृष्ठ 904

अठारहवाँ अध्याय ८५९ §§ नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ किया गया है। जब यही सात्त्विक ज्ञान मनमें भली भाँति प्रतिबिम्बित हो जाता है, तब मनुष्यके देहस्वभावपर उसके जो परिणाम होते हैं, उनका वर्णन, दैवी- संपत्ति-गुणवर्णनके नामसे, सोलहवें अध्यायके आरंभमें किया गया है, और तेरहवें अध्यायमें (१३. ७-११) ऐसे देहस्वभावकाही नाम 'ज्ञान' बतलाया है। इससे जान पड़ता है, कि 'ज्ञान' शब्दसे (१) एकीकरणकी मानसिक क्रियाकी पूर्णता, तथा (२) उस पूर्णताका देहस्वभावपर होनेवाला परिणाम, - ये दोनों अर्थ गीतामें विवक्षित हैं। अतः गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें (पृ. २४९- २५०) यह बात स्पष्टकर दी गयी है, कि बीसवें श्लोकमें वर्णित ज्ञानका लक्षण यद्यपि बाह्यतः मानसिक क्रियात्मक दिखायी देता है, तथापि उसीमें इस ज्ञानके कारण देहस्वभावपर होनेवाले परिणामका समावेश करना चाहिये। अस्तु; ज्ञानके भेद हो चुके। अब कर्मके भेद बतलाये जाते हैं :- ] (२३) फल-प्राप्तिकी इच्छा न करनेवाला मनुष्य, (मनमें) प्रेम या द्वेष न रख कर, बिना आसक्तिके (स्वधर्मानुसार) जो नियत अर्थात् नियुक्त किया हुआ कर्म करता है, उसको (कर्म) सात्त्विक कहते हैं। (२४) परंतु काम अर्थात् फलाशाकी इच्छा रखनेवाला अथवा अहंकार-बुद्धिका (मनुष्य) बड़े परिश्रमसे जो कर्म करता है, उसे राजस कहते हैं। (२५) तामस कर्म वह है, कि जो इन बातोंका विचार किये बिना मोहसे आरंभ किया जाता है, कि अनुबंधक अर्थात् आगे क्या होगा, पौरुष याने अपनी सामर्थ्य कितनी है, और (होनहारमें) नाश अथवा हिंसा होगी या नहीं। [ इन तीन प्रकारके कर्मोंसे सभी प्रकारके कर्मोंका समावेश हो जाता है। निष्काम कर्मोंकोही सात्त्विक अथवा उत्तम क्यों कहा है, (गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें इस बातका विवेचन किया गया है, उसे देखो) यही सच्चा अकर्मभी है (गीता ४. १६ पर हमारी टिप्पणी देखो)। गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, अतः स्मरण रहे, कि कर्मके उक्त लक्षणोंका वर्णन करते समय बार बार कर्ताकी बुद्धिका उल्लेख किया गया है, कर्मका सात्त्विकपन या तामसपन केवल उसके बाह्य परिणामसेही निश्चित नहीं किया गया है (गीता

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