भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 905

८६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च तार्क तामस उच्यते ॥ २८ ॥ | र. प्र. १२, पृ. ३८२-३८३) । इसी प्रकार २५ वें श्लोकमें यहभी सिद्ध है, | कि फलाशाके छूट जाने पर यह न समझना चाहिये, कि अगला-पिछला या सारा- | सार विचार किये बिनाही चाहे जो कर्म किया जाय क्योंकि २५ वें श्लोकमे यह | निश्चय किया है, कि अनुबंध और फलका विचार किये विना जो कर्म किया | जाता है, वह तामस है; न कि सात्त्विक (गीतार. प्र. १२, पृ. ३८२-३८३) । | अब इसी तत्त्वके अनुसार कर्ताके भेद बतलाते हैं :- ] (२६) जिसे आसक्ति नहीं रहती, जो 'मै' और 'मेरा' नही कहता, कार्यकी सिद्धि हो या न हो, (दोनो समय) जो (मनसे) विकाररहित होकर धृति और उत्साहके साथ कर्म करता है, उसे सात्त्विक (कर्ता) कहते हैं। (२७) विषयासक्त, लोभी, (सिद्धिके समय) हर्ष (और असिद्धिके समय) शोकसे युक्त, कर्मफल पानेकी इच्छा रखनेवाला, हिमात्मक और अशुचि कर्ता राजस कहलाता है। (२८) अयुक्त अर्थात् चंचल बुद्धिवाला, असभ्य, गर्वमे फूलनेवाला, ठग, नैष्कृतिक याने दूसरोंकी हानि करनेवाला, आलसी, अप्रसन्नचित्त और दीर्घसूत्री अर्थात् देरी लगाने- वाला या घडी भरके कामको महीने भरमें करनेवाला कर्ता तामस कहलाता है। | [ २८ वें श्लोकमें नैष्कृतिक (निस् + कृत = छेदन करना, काटना) शब्दका | अर्थ दूसरेके कामका छेदन करनेवाला अथवा करनेवाला है। परंतु इसके बदले | कई लोग 'नैकृतिक' पाठ मानते हैं। अमरकोशमें 'निकृत'का अर्थ शठ लिखा | हुआ है। परंतु इस श्लोकमें शठ विशेषण पहले आ चुका है, इसलिये हमने | नैकृतिक पाठको स्वीकार किया है। इन तीन प्रकारके कर्त्ताओंमेंमे सात्त्विक | कर्ताही अकर्ता, अलिप्त कर्ता अथवा कर्मयोगी है। ऊपरवाले श्लोकसे प्रकट है, | कि फलाशा छोड़नेपरभी कर्म करनेका विश्वास, उत्साह और सारासार विचार | उस कर्मयोगीमें बनेही रहते हैं। जगतके त्रिविध विस्तारका यह वर्णनही अब | बुद्धि, धृति और सुखके विषयमेंभी किया जाता है। इन श्लोकोंमें बुद्धिका अर्थ | वही व्यवसायात्मका बुद्धि अथवा निश्चय करनेवाली इंद्रिय अभीष्ट है, कि | जिसका वर्णन दूसरे अध्यायमें (२. ४१) हो चुका है; और उसका स्पष्टीकरण | गीतारहस्यके छठे प्रकरणमे (पृ. १३९-१४३) किया गया है।]