श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 906, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ८६१ § § बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥ यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥ § § धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ (२९) हे धनंजय ! गुणोंके कारण बुद्धि और धृतिकेभी जो तीन प्रकारके भिन्न भिन्न भेद होते हैं, उन सबको पृथक् पृथक् तुझसे कहता हूँ, सुन । (३०) हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति, अर्थात् किसी कर्मके करने, और निवृत्ति, अर्थात् किसी कर्मके न करनेको जानती है, एवं यह जानती है, कि कार्य अर्थात् करनेके योग्य काम क्या है और अकार्य अर्थात् करनेके अयोग्य क्या है, किससे डरना चाहिये और किससे नहीं, किससे बंधन होता है और किससे मोक्ष, वह ( बुद्धि ) सात्त्विक है । (३१) हे पार्थ ! वह बुद्धि राजसी है, कि जिसमे धर्म और अधर्मका, अथवा कार्य और अकार्यका, यथार्थ निर्णय नहीं होता । (३२) हे पार्थ ! वह बुद्धि तामसी, है कि जो तमसे व्याप्त होकर अधर्मको धर्म समझती है, और सब बातोंमें विपरीत याने उलटी समझ कर देती है । | [ इस प्रकार बुद्धिके विभाग करनेपर सदसद्विवेक-बुद्धि कोई स्वतंत्र | देवता नहीं रह जाती, किंतु सात्त्विक बुद्धिमेंही उसका समावेश करना पड़ता है । | विवेचन गीतारहस्यके प्रकरण ६, पृष्ठ १४२-१४३ में किया गया है। बुद्धिके | भेद हो चुके, अब धृतिके भेद बतलाते हैं :- ] (३३) हे पार्थ ! जिस अव्यभिचारिणी अर्थात् इधर उधर न डिगनेवाली धृतिसे मन, प्राण और इंद्रियोंके व्यापार, (कर्मफल-त्यागरूपी) योगके द्वारा चलाये जाते हैं, वह धृति सात्त्विक है । (३४) हे अर्जुन ! जिस धृतिसे धर्म, काम और अर्थ ( ये पुरुषार्थ ) चलाये जाते हैं और जो प्रसंगानुसार ( धर्म-अर्थ-कामके )