श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥ § § सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ फलकी इच्छा रखती है, वह धृति राजस है । (३५) हे पार्थ ! जिस धृतिसे मनुष्य दुर्बुद्धि होकर निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद नहीं छोड़ता, वह धृति तामस है । | [ 'धृति' शब्दका अर्थ धैर्य है; परंतु यहाँपर शारीरिक धैर्यसे अभिप्राय | नहीं है, इस प्रकरणमें धृति शब्दका अर्थ मनका दृढनिश्चय है । निर्णय करना | बुद्धिका काम है सही; परंतु इस बातकीभी आवश्यकता है, कि बुद्धिके योग्य | निर्णय करनेपर वह सदैव स्थिर रहे । बुद्धिके निर्णयको ऐसा स्थिर या दृढ करना | मनका धर्म है । अतएव कहना चाहिये, कि धृति अथवा मानसिक धैर्यका गुण | मन और बुद्धि, दोनोंकी सहायतामे उत्पन्न होता है । परंतु इतना कह देनेसे | सात्त्विक धृतिका लक्षण पूर्ण नहीं हो जाता, कि अव्यभिचारी अर्थात् इधर उधर | विचलित न होनेवाले धैर्यके बलपर मन, प्राण और इंद्रियोंके व्यापार करने | चाहिये । बल्कि यहभी बतलाना चाहिये, कि ये व्यापार किसपर होते हैं, अथवा | इन व्यापारोंका कर्म क्या है; और वह कर्मयोगी शब्दसे सूचित किया गया है । | अतः 'योग' शब्दका अर्थ केवल 'एकाग्र चित्त' कर देनेसे काम नहीं चलता । | इसीलिये पूर्वोपर संदर्भके अनुसार, हमने इस शब्दका अर्थ, कर्मफल-त्यागरूपी | योग किया है । सात्त्विक कर्मके और सात्त्विक कर्ता आदिके लक्षण बतलाते समय | जैसे 'फलकी आसक्ति छोड़ने 'को प्रधान गुण माना है, वैसेही सात्त्विक धृतिका | लक्षण बतलानेसमयभी उसीको प्रधान मानना चाहिये; इसके सिवा अगलेही | श्लोकमें यह वर्णन है, कि राजस धृति फलाकांक्षी होती है । अतः उस | श्लोकसेभी सिद्ध होता है, कि सात्त्विक धृति, राजस धृतिके विपरीत | अफलाकांक्षी होनी चाहिये । तात्पर्य यह है, कि निश्चयकी दृढता तो निरी | मानसिक प्रक्रिया है, और उसके भली या बुरी होनेका विचार करनेके अर्थ यह | देखना चाहिये, कि जिस कार्यके लिये इस क्रियाका उपयोग किया जाता है, वह | कार्य कैसा है । नींद और आलस्य आदि कामोंमेंही यदि दृढनिश्चय किया गया | हो; तो वह तामस है; फलाशापूर्वक नित्य व्यवहारके काम करनेमें किया | गया हो तो राजस है; और फलाशा-त्यागरूपी योगमें दृढ निश्चय किया गया | हो, तो वह सात्त्विक है । इस प्रकार धृतिके भेद हुए । अब बतलाते हैं, कि | गुणभेदानुसार सुखकेभी तीन प्रकार कैसे होते हैं :- ] (३६) अब हे भरतश्रेष्ठ ! सुखकेभी तीन भेद बतलाता हूँ, सुन । अभ्याससे