भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 908, कुल 956 में से

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पृष्ठ 908

अठारहवाँ अध्याय ८६३ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥ विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ अर्थात् निरंतर परिचयसे जिसमें रम जाता है और जहाँ दुःखका अंत होता है, (३७) जो आरंभमें (तो) विषके समान जान पड़ता है, परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है, जो आत्मनिष्ठ-बुद्धिकी प्रसन्नतामे प्राप्त होता है, उस (आध्यात्मिक) सुखको सात्त्विक कहते हैं। (३८) इंद्रियों और उनके विषयोके संयोगमे होनेवाला (अर्थात् आधिभौतिक) सुख राजस कहा जाता है, कि जो पहले तो अमृतके समान होता है पर अंतमें विष-सा रहता है। (३९) और जो आरंभमें एवं अनुबंध अर्थात् परिणाममेंभी मनुष्यको मोहमें फंसाता है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद अर्थात् कर्तव्यकी भूलमे उपजता है, उसे तामस सुख कहते हैं। [ ३७ वें श्लोकके आत्मबुद्धि शब्दका अर्थ हमने ‘आत्मनिष्ठ बुद्धि’ किया है, परंतु ‘आत्म’का अर्थ ‘अपना’ करके, उसी पदका अर्थ ‘अपनी बुद्धि’ भी हो सकेगा। क्योंकि पहले (६.२१) कहा गया है, कि अत्यंत सुख केवल ‘बुद्धि- मेही ग्राह्य’ और ‘अतींद्रिय’ होता है। परंतु अर्थ कोईभी क्यों न किया जाय, तात्पर्य तो एकही है। यदि कहा जावे, कि सच्चा और नित्य सुख इंद्रियोपभोगमे नहीं है, किंतु वह केवल बुद्धिग्राह्य है, तथापि जब विचार करते हैं, कि बुद्धिको यह सच्चा और अत्यंत सुख प्राप्त होनेके लिये क्या करना पड़ता है, तब गीताके छठे अध्यायसे (गीता ६. २१, २२) प्रकट होता है, कि यह परमावधिका सुख आत्मनिष्ठ बुद्धिके हुए बिना प्राप्त नहीं होता। ‘बुद्धि’ एक ऐसी इंद्रिय है, कि वह एक ओरमे त्रिगुणात्मक प्रकृतिके विस्तारकी ओर देखती है, और दूसरी ओर से उसको आत्मस्वरूपी परब्रह्मकाभी बोध हो सकता है, कि जो इस प्रकृतिके विस्तारके मूलमें अर्थात् प्राणिमात्रमें समानतासे व्याप्त है। तात्पर्य यह है, कि इंद्रियनिग्रहके द्वारा बुद्धिको त्रिगुणात्मक प्रकृतिके विस्तारमे हटाकर जहाँ अंतर्मुख और आत्मनिष्ठ किया - और पातंजलयोगके द्वारा साधनीय विषय यही है - तहाँ वह बुद्धि प्रसन्न हो जाती है, और मनुष्यको सत्य एवं आत्यंतिक सुखका अनुभव होने लगता है। गीतारहस्य के ५ वें प्रकरण (पृ. ११६-११७) में आध्यात्मिक सुखकी श्रेष्ठताका विवरण किया जा चुका है। यह बतलाते हैं, कि इस जगतमे सामान्यतः उक्त त्रिविध भेदही भर पड़ा है - ]

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