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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

अठारहवाँ अध्याय ८६३ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥ विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ अर्थात् निरंतर परिचयसे जिसमें रम जाता है और जहाँ दुःखका अंत होता है, (३७) जो आरंभमें (तो) विषके समान जान पड़ता है, परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है, जो आत्मनिष्ठ-बुद्धिकी प्रसन्नतामे प्राप्त होता है, उस (आध्यात्मिक) सुखको सात्त्विक कहते हैं। (३८) इंद्रियों और उनके विषयोके संयोगमे होनेवाला (अर्थात् आधिभौतिक) सुख राजस कहा जाता है, कि जो पहले तो अमृतके समान होता है पर अंतमें विष-सा रहता है। (३९) और जो आरंभमें एवं अनुबंध अर्थात् परिणाममेंभी मनुष्यको मोहमें फंसाता है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद अर्थात् कर्तव्यकी भूलमे उपजता है, उसे तामस सुख कहते हैं। [ ३७ वें श्लोकके आत्मबुद्धि शब्दका अर्थ हमने ‘आत्मनिष्ठ बुद्धि’ किया है, परंतु ‘आत्म’का अर्थ ‘अपना’ करके, उसी पदका अर्थ ‘अपनी बुद्धि’ भी हो सकेगा। क्योंकि पहले (६.२१) कहा गया है, कि अत्यंत सुख केवल ‘बुद्धि- मेही ग्राह्य’ और ‘अतींद्रिय’ होता है। परंतु अर्थ कोईभी क्यों न किया जाय, तात्पर्य तो एकही है। यदि कहा जावे, कि सच्चा और नित्य सुख इंद्रियोपभोगमे नहीं है, किंतु वह केवल बुद्धिग्राह्य है, तथापि जब विचार करते हैं, कि बुद्धिको यह सच्चा और अत्यंत सुख प्राप्त होनेके लिये क्या करना पड़ता है, तब गीताके छठे अध्यायसे (गीता ६. २१, २२) प्रकट होता है, कि यह परमावधिका सुख आत्मनिष्ठ बुद्धिके हुए बिना प्राप्त नहीं होता। ‘बुद्धि’ एक ऐसी इंद्रिय है, कि वह एक ओरमे त्रिगुणात्मक प्रकृतिके विस्तारकी ओर देखती है, और दूसरी ओर से उसको आत्मस्वरूपी परब्रह्मकाभी बोध हो सकता है, कि जो इस प्रकृतिके विस्तारके मूलमें अर्थात् प्राणिमात्रमें समानतासे व्याप्त है। तात्पर्य यह है, कि इंद्रियनिग्रहके द्वारा बुद्धिको त्रिगुणात्मक प्रकृतिके विस्तारमे हटाकर जहाँ अंतर्मुख और आत्मनिष्ठ किया - और पातंजलयोगके द्वारा साधनीय विषय यही है - तहाँ वह बुद्धि प्रसन्न हो जाती है, और मनुष्यको सत्य एवं आत्यंतिक सुखका अनुभव होने लगता है। गीतारहस्य के ५ वें प्रकरण (पृ. ११६-११७) में आध्यात्मिक सुखकी श्रेष्ठताका विवरण किया जा चुका है। यह बतलाते हैं, कि इस जगतमे सामान्यतः उक्त त्रिविध भेदही भर पड़ा है - ]

८६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥ § § ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ (४०) इस पृथ्वीपर आकाशमें अथवा देवताओंमें अर्थात् देवलोकमेंभी ऐसी कोई वस्तु नहीं कि जो प्रकृतिके इन तीन गणोंसे मुक्त हो । | [ अठारहवें श्लोकसे यहाँतक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके ! भेद बतलाकर, अर्जुनकी आंखोंके सामने इस बातका एक चित्र रख दिया है, कि | संपूर्ण जगतमें प्रकृतिके गुणभेदसे विचित्रता कैसे उत्पन्न होती है, तथा फिर | प्रतिपादन किया है, कि इन सब भेदोंमें सात्त्विक भेद श्रेष्ठ और ग्राह्य है। इन | सात्त्विक भेदोंमेंभी जो सबसे श्रेष्ठ स्थिति है, उसीको गीतामें त्रिगुणातीत अवस्था | कहा है। गीतारहस्यके सातवें प्रकरणमें (पृ. १६८-१६९) हम कह चुके हैं, | कि गीताके अनुसार त्रिगुणातीत अथवा निर्गुण अवस्था कोई स्वतंत्र या चौथा | भेद नहीं है, और इसी न्यायके अनुसार मनुस्मृतिमेंभी सात्त्विक गतिकेही फिर | उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ, ये तीन भेद करके कहा गया है, कि उत्तम सात्त्विक | गति मोक्षप्रद है, और मध्यम सात्त्विक गति स्वर्गप्रद है (मनु. १२. ४८-५०, | ८९-८१)। जगतमें जो प्रकृति है, उसकी विचित्रताका यहाँतक वर्णन किया | गया। अब निरूपण किया जाता है, कि इस गुणविभागसेही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाकी | उत्पत्ति कैसे हुई। यह बात पहले कई बार कही जा चुकी है, कि (गी. १८. ७-९, | -२३; ३. ८) प्रत्येक मनुष्यको स्वधर्मानुसार अपना 'नियत' अर्थात् नियुक्त | किया हुआ कर्म फलाशा छोड़कर, परंतु धृति, उत्साह और सारासार विचारके | साथ साथ करते जाना चाहिये, यही संसारमें उसका कर्तव्य है। परंतु जिस बातसे | यह कर्म 'नियत' होता है, उसका बीज अबतक कहींभी नहीं बतलाया गया। पीछे | एक बार चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाका कुछ थोड़ा-सा उल्लेखकर (४. १३) कहा | गया है, कि कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय शास्त्रके अनुसार करना चाहिये (गीता | १६. २४); परंतु जगतके व्यवहारोंको नियमानुसार जारी रखनेके हेतु | (गीतार. प्र. ११-१२, पृ. ३३६, ३९९-४००, प्र. १५, पृ. ४९६-४९७) जिस | गुणकर्मविभागके तत्त्वपर चातुर्वर्ण्यरूपी शास्त्र-व्यवस्था निर्मित की गयी है, | उसका पूर्ण स्पष्टीकरण उस स्थानमें नहीं किया गया है। अतएव जिस | संस्थासे समाजमें हर एक मनुष्यका कर्तव्य नियत होता है, अर्थात् स्थिर किया | जाता है, उस चातुर्वर्ण्यकी, गुणत्रयविभागके अनुसार, उपपत्ति बतलाकर उसके | साथही साथ अब प्रत्येक वर्णके नियत किये हुए कर्तव्यभी कहे जाते हैं:-] (४१) हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्म, उसके स्वभाव-

अठारहवाँ अध्याय ८६५ शमो दमस्तपःशौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ § § स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ जन्य अर्थात् प्रकृतिसिद्ध गुणोंके अनुसार पृथक् वंटे हुए हैं। (४२) ब्राह्मणका स्वभावजन्य कर्म शम, दम, तप, पवित्रता, क्षान्ति, सरलता (आर्जव), ज्ञान अर्थात् अध्यात्मज्ञान, विज्ञान याने विविध ज्ञान और आस्तिक्य-बुद्धि है। (४३) शूरता, तेजस्विता, धैर्य, दक्षता, युद्धसे न भागना, दान देना और (प्रजापर) शासन करना क्षत्रियका स्वाभाविक कर्म है। (४४) कृषि अर्थात् खेती, गोरक्षा याने पशुओंको पालनेका उद्यम, और वाणिज्य अर्थात् व्यापार वैश्यका स्वभावजन्य कर्म है; और इसी प्रकार, सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है। | [ यह न समझा जाय, कि यह उपपत्ति गीतामेंही पहले बतलायी गयी है, | कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था स्वभावजन्य गुणभेदसे निर्मित हुई है; किंतु महाभारतके | वनपर्वान्तर्गत नहुष-युधिष्ठिर-संवादमें और द्विज-व्याध-संवादमें (वन. १८०, | २११), शांतिपर्वके भृगु-भारद्वाज-संवादमें (शां. १८८), अनुशासनपर्वके | उमा-महेश्वर-संवादमें (अनु. १४३), और अश्वमेधपर्वकी (अश्व. ३९. ११) | अनुगीतामें गुणभेदकी यही उपपत्ति कुछ अंतरसे पायी जाती है। यह पहलेही | कहा जा चुका है, कि जगतके विविध व्यवहार प्रकृतिके गुणभेदसे हो रहे हैं, और | फिर सिद्ध किया गया है, कि जिस चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थासे, यह नियत किया जाता | है, कि किसे क्या करना चाहिये, वह व्यवस्थाभी प्रकृतिके गुणभेदका परिणाम | है। अब यह प्रतिपादन करते हैं, कि उक्त कर्म हरएक मनुष्यको निष्काम बुद्धिसे | अर्थात् परमेश्वरार्पण-बुद्धिसेही करने चाहिये, अन्यथा जगतका कारोबार नहीं | चल सकता; तथा मनुष्यके इस प्रकारके आचरणसेही सिद्धि प्राप्त हो जाती है, | सिद्धि पानेके लिये और कोई दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है :- ] (४५) अपने अपने (स्वभावजन्य गुणोंके अनुसार प्राप्त होनेवाले) कर्मोंमें नित्य रत (रहनेवाला) पुरुष (उसीसे) परम सिद्धि पाता है। सुन, अपने कर्मोंमें गी. र. ५५

८६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥ § § श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ तत्पर रहनेसे सिद्धि कैसे मिलती है (४६) प्राणिमात्रकी जिसमे प्रवृत्ति हुई है और जिसने इस सारे जगतका विस्तार किया है अथवा जिससे यह सब जगत व्याप्त है, उसकी अपने ( स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले ) कर्मोके द्वारा ( केवल वाणी अथवा फूलोंसे नहीं ) पूजा करनेसेही मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है । | [ इस प्रकार प्रतिपादन किया गया, कि चातुर्वर्ण्यके अनुसार प्राप्त होने- | वाले कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे अथवा परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करनाही विराट्- | स्वरूपी परमेश्वरका एक प्रकारका यजन-पूजनही है, तथा उसीसे सिद्धि मिल | जाती है ( गीतार. प्र. १३, पृ. ४३९-४४० ) । अब उक्त गुण-कर्म-भेदानुसार | मनुष्यको स्वभावतःही प्राप्त होनेवाला कर्तव्य किसी दूसरी दृष्टिसे कदाचित् | सदोष, अश्लाघ्य, कठिन अथवा अप्रियभी हो सकता है ( उदाहरणार्थ, इस | अवसरपर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करनेमें हत्या होनेके कारण वह सदोष | दिखायी देगा, तो ऐसे समयपर मनुष्यको क्या करना चाहिये ? क्या वह स्वधर्म | छोड़कर अन्य धर्म स्वीकार कर ले ( गीता ३. ३५ ), या कुछभी हो, स्वकर्मकोही | करता जावें, और यदि स्वकर्मही करना चाहिये, तो कैसे करे ? - इत्यादि | प्रश्नोंका उत्तर उसी न्यायके अनुरोधसे बतलाया जाता है, कि जो इस अध्यायके | आरंभके ( १८. ६ ) यज्ञयाग आदि कर्मोंके संबंधमें कहा गया है :- ] ( ४७ ) यद्यपि परधर्मका आचरण सहज हो, तोभी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्यविहित कर्म, विगुण याने सदोष होनेपरभी अधिक कल्याण- कारक है; स्वभावसिद्ध अर्थात् गुणस्वभावानुसार निर्मित चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था द्वारा नियत किया हुआ अपना कर्म करनेमें कोई पाप नहीं लगता । ( ४८) हे कौन्तेय ! जो कर्म सहज है, अर्थात् जन्मसेही गुण-कर्म-विभागानुसार नियत हो गया है, वह सदोष हो, तोभी उसे ( कभी ) न छोड़ना चाहिये । क्योंकि संपूर्ण आरंभ अर्थात् उद्योग ( किसी न किसी ) दोषसे वैसेही व्याप्त रहते हैं, जैसे कि धुएँसे आग घिरी रहती है । ( ४९ ) . ( अतएव ) कहींभी आसक्ति न रखकर, मनको वशमें करके

अठारहवाँ अध्याय ८६७

निष्काम बुद्धिसे चलनेपर (कर्मफलके) संन्यास-द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त हो जाती है। [इस उपसंहारात्मक अध्यायमें पहले बतलाये हुए उन्हीं विचारोंको अब फिरसे व्यक्त कर दिखलाया गया है, कि पराये धर्मकी अपेक्षा स्वधर्म भला है (गीता ३. ३५), और नैष्कर्म्य-सिद्धि पानेके लिये कर्म छोड़नेकी आवश्य- कता नहीं है (गीता ३. ४), इत्यादि। हम गीताके तीसरे अध्यायके चौथे श्लोककी टिप्पणीमें ऐसे प्रश्नोंका स्पष्टीकरण कर चुके हैं, कि नैष्कर्म्य क्या है और सच्ची नैष्कर्म्य-सिद्धि किसे कहना चाहिये। उक्त सिद्धान्तकी महत्ता इस बातपर ध्यान दिये रहनेसे सहजही समझमें आ जावेगी, कि संन्यास-मार्गवालोंकी दृष्टि केवल मोक्षपरही रहती है, और भगवान्की दृष्टि मोक्ष एवं लोकसंग्रह, दोनोंपरभी समानही है। लोकसंग्रहके लिये अर्थात् समाजके धारण और पोषणके निमित्त ज्ञान-विज्ञानयुक्त पुरुष, अथवा रणमें तलवारका जौहर दिखलानेवाले शूर क्षत्रिय, तथा किसान, वैश्य, रोजगारी, लुहार, बढ़ई, कुम्हार और मांस- विक्रेता व्याधतककीभी आवश्यकता है। परंतु यदि कहा जाय, कि कर्म छोड़े बिना मोक्ष नहीं मिलता, तो इन सब लोगोंको अपना अपना व्यवसाय छोड़कर संन्यासी बन जाना चाहिये! कर्मसंन्यास-मार्गके लोग इस बातकी परवाह नहीं करते, परंतु गीताकी दृष्टि इतनी संकुचित नहीं है। इसलिये गीता कहती है, कि अपने अधिकारके अनुसार प्राप्त हुए व्यवसायको छोड़कर, दूसरेके व्यवसायको भला समझकर, करने लगना उचित नहीं है। कोईभी व्यवसाय लीजिये। उसमें कुछ-न-कुछ त्रुटि अवश्य रहतीही है। जैसे ब्राह्मणके लिये विशेषतः विहित जो क्षान्ति है (गीता १८. ४२), उसमेंभी एक बड़ा दोष यह है, कि "क्षमावान् पुरुष दुर्बल समझा जाता है' (मभा. शां. १६०. ३४); और व्याधके पेशेमें मांस बेचनाभी एक झंझटही है (मभा. वन. २०६)। परंतु कठिनाइयोंसे उकताकर इन कर्मोंकोही छोड़ बैठना उचित नहीं है। किसीभी कारणसे क्यों न हो, जब एक बार, किसी कर्मको अपना लिया, तो फिर उसकी कठिनाई या अप्रियताकी परवाह न करके, उसे आसक्ति छोड़कर रहनाही चाहिये। क्योंकि मनुष्यकी लघुता-महत्ता उसके व्यवसायपर निर्भर नहीं है, किंतु जिस बुद्धिसे वह अपना व्यवसाय या कर्म करता है, उसी बुद्धिपर उसकी योग्यता अध्यात्मदृष्टिसे अवलंबित रहती है (गीता २. ४९)। जिसका मन शांत है, और जिसने सब प्राणियोंके अंतर्गत एकताको पहचान लिया है, वह मनुष्य जाति या व्यवसायसे चाहे व्यापारी हो, चाहे कसाई; निष्काम बुद्धिसे उक्त व्यवसाय करनेवाला वह मनुष्य स्नानसंध्याशील ब्राह्मण अथवा शूर क्षत्रियकी बराबरीका माननीय और मोक्षका अधिकारी है। यही नहीं, वरन् ४९ वें श्लोकमें स्पष्ट कहा है, कि कर्म छोड़नेसे जो सिद्धि प्राप्त की जाती है, वही निष्काम

८६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥ बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥ । बुद्धिसे अपना अपना व्यवसाय करनेवालोंकोभी मिलती है । भागवतधर्मका । जो कुछ रहस्य है, वह यहीं है; तथा महाराष्ट्रके साधू-संतोंके इतिहाससे स्पष्ट । होता है, कि उक्त रीतिसे आचरण करके निष्काम बुद्धिके तत्त्वको अमलमें । लाना कुछ असंभव नहीं है (गीतार. प्र. १३, पृ. ४४२), अब बतलाते हैं, कि, । अपने अपने कर्मोंमें तत्पर रहनेसेही अंतमें मोक्ष कैसे प्राप्त होता है :- ] (५०) हे कौन्तेय ! (इस प्रकार) सिद्धि प्राप्त होनेपर (इस पुरुषको) ज्ञानकी परम निष्ठा, अर्थात् ब्रह्म जिस रीतिसे प्राप्त होता है, उसका मैं संक्षेपसे वर्णन करता-हूँ, सुन । (५१) शुद्ध बुद्धिसे युक्त हो करके, धैर्यसे आत्मसंयमन कर, शब्द आदि (इंद्रियोंके) विषयोंको छोड़करके, और प्रीति एवं द्वेषको दूरकर, (५२) 'विविक्त' अर्थात् चुने हुए अथवा एकांत स्थलमें रहनेवाला, मिताहारी, काया-वाचा और मनको वशमें रखनेवाला, नित्य ध्यानयुक्त और विरक्त, (५३) (तथा) अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह अर्थात् पाशको छोड़कर शांत एवं ममतासे रहित, (मनुष्य) ब्रह्मभूत होनेके लिये समर्थ होता है। (५४) ब्रह्मभूत हो जानेपर प्रसन्नचित्त हो कर वह न किसीकी आकांक्षा करता है, और न किसीका द्वेषभी; तथा समस्त प्राणीमात्रमें सम होकर मेरी परम भक्तिको प्राप्त कर लेता है। (५५) भक्तिसे उसको मेरा तात्त्विक ज्ञान हो जाता है, कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ; इस प्रकार मेरी तात्त्विक पहचान हो जानेपर वह मुझमेंही प्रवेश करता

अठारहवाँ अध्याय ८६९ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ है; ( ५६ ) और मेराही आश्रयकर, सब कर्म सदैव करते रहनेपरभी उसे मेरे अनुग्रहसे शाश्वत एवं अव्यय स्थान प्राप्त होता है । [ ध्यान रहे, कि सिद्धावस्थाका उक्त वर्णन कर्मयोगियोंका है, कर्मसंन्यास करनेवाले पुरुषोंका नहीं। आरंभमेंही, ४७ वें और ४९ वें श्लोकमें कहा है, कि उक्त वर्णन आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवालोंका है, तथा अंतके ५६ वें श्लोकमें “सब कर्म करते रहनेपरभी” शब्द आये हैं। उक्त वर्णन भक्तोंके अथवा त्रिगुणातीतोंके वर्णनके समानही है। यहाँतक कि, कुछ शब्दभी उसी वर्णनमे लिये गये हैं। उदाहरणार्थ, ५३ वें श्लोकका 'परिग्रह' शब्द छठे अध्यायमें ( ६. १० ) योगीके वर्णनमें आया है; ५४ वें श्लोक 'न शोचति न कांक्षति' पद बारहवें अध्यायके ( १२. १७ ) भक्ति-मार्गके वर्णनमें हैं; और 'विविक्त' अर्थात् “चुने हुए 'एकान्त' स्थलमें रहना” शब्द १३ वे अध्यायके १०वें श्लोकमें आ चुका है। कर्मयोगीको प्राप्त होनेवाली उपर्युक्त अंतिम स्थिति और कर्म- संन्यास-मार्गसे प्राप्त होनेवाली अंतिम स्थिति, दोनों केवल मानसिक दृष्टिसे एकही हैं, इसीसे संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंको यह कहनेका अवसर मिल गया है, कि उक्त वर्णन हमारेही मार्गके हैं। परंतु हम कई बार कह चुके हैं, कि यह सच्चा अर्थ नहीं है। अस्तुः, इस अध्यायके आरंभमें प्रतिपादन किया गया है, कि संन्यासका अर्थ कर्मत्याग नहीं है, किंतु फलशाके त्यागकोही संन्यास कहते हैं। जब संन्यास शब्दका इस प्रकार अर्थ हो चुका, तब यह सिद्ध है, कि यज्ञ, दान आदि कर्म चाहे काम्य हों, चाहे नित्य हों या नैमित्तिक, उनको अन्य सब कर्मोंके समानही फलाशा छोड़कर उत्साह और समतासे करते जाना चाहिये। तदनंतर संसारके कर्म, कर्ता, बुद्धि आदि संपूर्ण विषयोंकी गुणभेदसे अनेकता दिखलाकर उनमें सात्त्विकको श्रेष्ठ कहा है; और गीताशास्त्रका यह इत्यर्थ बतलाया है, कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके द्वारा स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले समस्त कर्मोंको आसक्ति छोड़कर करने जानाही परमेश्वरका यजन-पूजन करना है; एवं इसीसे अंतमें क्रमशः परब्रह्म अथवा मोक्षकी प्राप्ति होती है; मोक्षके लिये कोई दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है, अथवा कर्मत्यागरूपी संन्यासभी लेनेकी ज़रूरत नहीं है, केवल इस कर्मयोगसेही मोक्षसहित सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। अब इसी कर्मयोग-मार्गको स्वीकारकर लेनेके लिये अर्जुनको फिर एक बार अंतिम उपदेश करते हैं:- ]

८७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥ § § यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ ( ५७ ) मनसे सब कर्मोंको मुझमें 'संन्यस्य' अर्थात् समर्पण करके मत्परायण होता हुआ ( साम्य ) बुद्धियोगके आश्रयसे हमेशा मुझमें चित्त रख । । [ 'बुद्धियोग' शब्द पहले-दूसरेही अध्यायमें ( २.४९ ) आ चुका है; और । वहाँ उसका अर्थ फलाशामें बुद्धि न रखकर कर्म करनेकी युक्ति अथवा समत्व । बुद्धि है। यही अर्थ यहाँभी विवक्षित है और दूसरे अध्यायमें जो यह सिद्धान्त । बतलाया था, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, उसीका यह उपसंहार है। इसीमें । कर्मसंन्यासका अर्थभी इन शब्दोंके द्वारा व्यक्त किया गया है, कि "मनसे । ( अर्थात् कर्मका प्रत्यक्ष त्याग न करके, केवल बुद्धिसे ) मुझमें सब कर्म सम- । र्पित कर ।" और वही अर्थ पहले गीता ३. २० एवं ५. १३ मेंभी वर्णित है । ] ( ५८ ) मुझमें चित्त रखनेपर तू मेरे अनुग्रहसे सब संकटोंको अर्थात् कर्मके शुभाशुभ फलोंको पार कर जावेगा । परंतु यदि अहंकारके वश होकर मेरी न सुनेगा, तो ( निस्संदेह ) नाश पावेगा । । [ ५८ वें श्लोकके अंतमें अहंकारका जो परिणाम बतलाया है, अब यहाँ । उसीका अधिक स्पष्टीकरण करते हैं :- ] ( ५९ ) तू अहंकारसे जो यह मानता ( कहता ) है, कि मैं युद्ध न करूँगा, तेरा वह निश्चय व्यर्थ है । प्रकृति अर्थात् स्वभाव तुझसे वह ( युद्ध ) करावेगा । ( ६० ) हे कौन्तेय ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बद्ध होनेके कारण, मोहके वश होकर तू जिसे करनेकी इच्छा करता है, पराधीन ( अर्थात् प्रकृतिके अधीन ) हो करके तुझे वही करना पडेगा । ( ६१ ) हे अर्जुन ! सब प्राणियोंके हृदयमें रहकर ईश्वर ( अपनी ) मायासे प्राणिमात्रको ( ऐसे ) घुमा रहा है, मानो सभी ( किसी )

अठारहवाँ अध्याय ८७१ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ यंत्रपर चढ़ाये गये हों । ( ६२ ) इसलिये हे भारत ! तू सर्व भावमे उसीकी शरणमें जा । उसके अनुग्रहसे तुझे परम शांति और नित्यस्थान प्राप्त होगा । ( ६३ ) इस प्रकार मैंने यह गुह्यातिगुह्य ज्ञान तुझमे कहा है । इसका पूर्ण विचार करके जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर । । [ इन श्लोकोंमें कर्म-पराधीनताका जो गूढ़ तत्त्व बतलाया गया है, उसका । विचार गीतारहस्यके १० वें प्रकरणमें विस्तारपूर्वक हो चुका है । यद्यपि आत्मा । स्वयं स्वतंत्र है, तथापि जगत्के अर्थात् प्रकृतिके व्यवहारको देखनेसे मालूम । होता है, कि उस कर्मके चक्रपर आत्माका कुछभी अधिकार नहीं है, कि जो । अनादि कालसे चल रहा हैं । जिनकी हम इच्छा नहीं करते, बल्कि जो हमारी । इच्छाके विपरीतभी है, ऐसी सैकड़ों-हजारों बाते संसारमें हुआ करती हैं; तथा । उनके व्यापारके परिणामभी हमपर होते रहने है, अथवा उक्त व्यापारोंकाही । कुछ भाग हमें करना पड़ता है । यदि इन्कार करते हैं, तो बनता नहीं है । ऐसे । अवसरपर ज्ञानी मनुष्य अपनी बुद्धिको निर्मलकर, और सुख या दुःखको एकसा । समझकर सब कर्म किया करता है, किंतु मूर्ख मनुष्य उनके फन्देमें फँस जाता । है; यही दोनोंके आचरणमें महत्त्वपूर्ण भेद है । भगवानने तीसरेही अध्यायमें । कह दिया है, कि " सभी प्राणी अपनी अपनी प्रकृतिके अनुसार चलते रहते हैं, । वहाँ निग्रह क्या करेगा ?" ( गीता ३. ३३ ) । ऐसी स्थितिमें मोक्षशास्त्र । अथवा नीतिशास्त्र इतनाही उपदेश कर सकता है, कि कर्ममें आसक्ति मत रखो, । इससे अधिक वह कुछ नहीं कह सकता । अध्यात्म-दृष्टिमे यह विचार हुआ; । परंतु भक्तिकी दृष्टिसे प्रकृतिभी तो ईश्वरकाही अंश है, अतः ६१वें और ६२वें । श्लोकमें यही सिद्धान्त ईश्वरको सारा कर्तृत्व सौंप कर बतलाया गया है । जगत्में । जो कुछ व्यवहार हो रहे हैं, उन्हें परमेश्वर जैसे चाहता है, वैसे करवा रहा है । । इसलिये ज्ञानी मनुष्यको उचित है, कि अहंकार-बुद्धि छोड़कर, अपने आपको । सर्वथा परमेश्वरकेही हवालेकर दे । ६३वें श्लोकमें भगवानने कहा है सही, । कि, " जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर " परंतु उसका अर्थ बहुत गंभीर है । ज्ञान । अथवा भक्तिके द्वारा जहाँ बुद्धि साम्यावस्थामें पहुँची, वहाँ फिर बुरी इच्छा । बचनेही नहीं पाती, अतएव ऐसे ज्ञानी पुरुषका 'इच्छा-स्वातन्त्र्य' ( इच्छाकी । स्वाधीनता ) उसे अथवा जगत्को कभी अहितकारक नहीं हो सकता । इसलिये

८७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥ | उक्त श्लोकका ठीक ठीक भावार्थ यह है, कि “ ज्योंही तू इस ज्ञानको समझ | लेगा ( विमृश्य ), त्योंही तू स्वयंप्रकाश हो जायगा ; और फिर ( पहलेसे नहीं ) | तू अपनी इच्छासे जो कर्म करेगा, वही धर्म्य एवं प्रमाण होगा, तथा तुझे स्थित- | प्रज्ञकी ऐसी अवस्था प्राप्त हो जानेपर तेरी इच्छाको रोकनेकी आवश्यकताही | न रहेगी।” अस्तु, गीतारहस्यके १४ वें प्रकरणमें हम दिखला चुके हैं, कि, गीतामें | ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकोही अधिक महत्त्व दिया गया है। इस सिद्धान्तके अनुसार | अब संपूर्ण गीताशास्त्रका भक्तिप्रधान उपसंहार करते हैं :— ] (६४) (अब) अंतकी यह और एक बात सुन, कि जो गुह्यातिगुह्य है । मेरा अत्यंत प्यारा है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात करता हूँ । (६५) मुझमें अपना मन रख, मेरा भक्त हो, मेरा यजन कर, और मेरी वंदना कर; मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, कि ( इसमे ) तू मुझमेंही आ मिलेगा, ( क्योंकि ) तू मेरा प्यारा ( भक्त ) है । (६६) सब धर्मोंको छोड़ कर तू केवल मेरीही शरणमें आ जा । मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, डर मत । | [ कोरे ज्ञानमार्गके टीकाकारोंको यह भक्ति-प्रधान उपसंहार प्रिय नहीं | लगता । इसलिये वे धर्म शब्दमेंही अधर्मका समावेश करके कहते हैं, कि यह | श्लोक कठोपनिषदके इस उपदेशसे समानार्थक है, कि “ धर्म-अधर्म, कृत-अकृत, | और भूत-भव्य, सबको छोड़ कर उनके परे रहनेवाले परब्रह्मको पहचानो” ( कठ | २. १४ ); तथा इसमें निर्गुण ब्रह्मकी शरणमें जानेका उपदेश है। निर्गुण ब्रह्मका | वर्णन करते समय कठ-उपनिषदका श्लोक महाभारतमेंभी आया है । ( शां. ३३९. | ४०; ३३१. ४४ ) । परंतु इन दोनों स्थानोंपर धर्म और अधर्म, ये दोनों पद | जैसे स्पष्टतया पाये जाते हैं, वैसे गीतामें नहीं हैं। यह सच है, कि गीता निर्गुण | ब्रह्मको मानती है, और उसमें यह निर्णयभी किया गया है, कि परमेश्वरका वही | स्वरूप श्रेष्ठ है ( गीता ७. २४ ) । तथापि गीताका यहभी तो सिद्धान्त है, कि | व्यक्तोपासना सुलभ और श्रेष्ठ है ( १२. ५ ), और यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण | अपने व्यक्त स्वरूपके विषयमेंही कह रहे हैं; इस कारण हमारा यह दृढ मत है, | कि यह उपसंहार भक्तिप्रधानही है । अर्थात् यहाँ निर्गुण ब्रह्म विवक्षित नहीं है,

अठारहवाँ अध्याय ८७३ § § इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ § § अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥ | किंतु कहना चाहिये कि यहाँपर धर्म शब्दसे परमेश्वर-प्राप्तिके लिये शास्त्रोंमें | जो अनेक मार्ग बतलाये गये हैं, - जैसे अहिंसा-धर्म, सत्य-धर्म, मातृपितृ- | सेवाधर्म, गुरुसेवा-धर्म, यज्ञयाग-धर्म, दान-धर्म, संन्यास-धर्म, आदि - वेही | अभिप्रेत हैं; और महाभारतके शांतिपर्वमें (शां. ३५४) एवं अनुगीतमें | (अश्व. ४९) जहाँ इस विषयकी चर्चा हुई है, वहाँ धर्म शब्दसे मोक्षके इन्हीं | उपायोंका उल्लेख किया गया है। परंतु इस स्थानपर गीताके प्रतिपाद्य धर्मको | लक्ष करके भगवानका यह निश्चयात्मक उपदेश है, कि उक्त नाना धर्मोंकी | गड़बड़में न पड़ कर 'मुझे अकेलेकोही भज, मैं तेरा उद्धार कर दूंगा, डर मत' | (गीतार. पृ. ४४३) । सार यह है, कि अर्जुनको निमित्त बनाकर भगवान् अंतमें | सभीको आश्वासन देते हैं, कि मेरी दृढ़ भक्ति करके, मत्परायण-बुद्धिसे स्वधर्मा- | नुसार प्राप्त होनेवाले कर्म करते जानेपर, इहलोक और परलोक, दोनों जगह | तुम्हारा कल्याण होगा, डरो मत। यही कर्मयोग कहलाता है; और सब गीता- | धर्मका सारभी यही है। अब बतलाते हैं, कि इस गीता-धर्मकी, अर्थात् ज्ञानमूलक | और भक्ति-प्रधान कर्मयोगकी, परंपरा आगे कैसे जारी रखी जावे :- ] (६७) जो तप नहीं करता, भक्ति नहीं करता और सुननेकी इच्छाभी नहीं रखता, तथा जो मेरी निंदा करता, है, उसे यह (गुह्य) कभी मत बतलाओ। (६८) जो यह परम गुह्य मेरे भक्तोंको बतलावेगा, उसकी मुझमें परम भक्ति होगी और वह निस्संदेह मुझमेंही आ मिलेगा। (६९) और उसकी अपेक्षा मेरा अधिक प्रिय करनेवाला संपूर्ण मनुष्योंमें दूसरा कोईभी न मिलेगा; तथा इस भूमिमें मुझे उसकी अपेक्षा अधिक प्रिय और कोई न होगा। | [ परंपराकी रक्षाके इस उपदेशके साथही अब फल बतलाते हैं :- ] (७०) हम दोनोंके इस धर्म-संवादका जो कोई अध्ययन करेगा, मैं समझूँगा,

८७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ § § कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥ अर्जुन उवाच । नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥ कि उसने ज्ञानयज्ञसे मेरी पूजा की है। (७१) इसी प्रकार दोष न ढूंढ कर श्रद्धाके साथ जो कोई इसे सुनेगा, वहभी (पापोंसे) मुक्त होकर उन शुभ लोकोंमें जा पहुँचेगा, कि जो पुण्यवान् लोगोंको मिलते हैं। | [ यहाँ उपदेश समाप्त हो चुका। अब यह जाँचनेके लिये, कि यह धर्म | अर्जुनकी समझमें ठीक आ गया है या नहीं भगवान् उससे पूछते हैं :- ] (७२) हे पार्थ ! तूने इसे एकाग्र मनमे सुन तो लिया है न ? (और) हे धनंजय ! तेरा अज्ञानरूपी मोह अब सर्वथा नष्ट हुआ कि नहीं ? अर्जुनने कहा :- (७३) हे अच्युत ! तुम्हारे प्रसादसे मेरा मोह नष्ट हो गया; और मुझे (कर्तव्य- धर्मकी) स्मृति हो गई। मैं (अब) निःसंदेह हो गया हूँ। आपके उपदेशानुसार (युद्ध) करूँगा। | [ जिनकी सांप्रदायिक समझ यह है, कि गीताधर्ममेंभी संसारको छोड | देनेका उपदेश किया गया है, उन्होंने इस अंतिम अर्थात् ७३ वें श्लोककी बहुत | कुछ निराधार खींचातानी की है। यदि विचार किया जाय, कि अर्जुनको किस | बातकी विस्मृति हो गयी थी, तो पता लगेगा, कि दूसरे अध्यायमें (२. ७) | उसने कहा है, कि "अपना धर्म अथवा कर्तव्य समझनेमें मेरा मन असमर्थ हो | गया है" (धर्मसंमूढ चेताः); अतः उक्त श्लोकका सरल अर्थ यही है | कि उसी कर्तव्य-धर्मकी अब उसे स्मृति हो आयी है। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त | करनेके लिये गीताका उपदेश किया गया है, और स्थान-स्थानपर कहा गया है, | कि "इसलिये तू युद्ध कर" (गीता २. १८; २. ३७; २. ३०; ८. ७; | ११. ३४), अतएव "आपकी आज्ञानुसार करूँगा" का अर्थ "युद्ध करता | हूँ" ही होता है। अस्तु; श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवाद समाप्त हुआ; अब | महाभारतकी कथाके संदर्भानुसार धृतराष्ट्रको यह कथा सुनाकर संजय | उपसंहार करता है :- ]

अठारहवाँ अध्याय ८७५ संजय उवाच । § § इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥ राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ संजयने कहा :- (७४) इस प्रकार शरीरको रोमांचित करनेवाला वासुदेव और महात्मा अर्जुनका यह अद्भुत संवाद मैंने सुना । (७५) व्यासजीके अनुग्रहसे मैंने यह परम गुह्य, याने योग अर्थात् कर्मयोग, साक्षात् योगेश्वर स्वयं श्रीकृष्णहीके मुखसे सुना है। । [ पहलेही लिख चुके हैं, कि व्यासजीने संजयको दिव्य-दृष्टि दी थी, जिससे । रणभूमिपर होनेवाली सारी घटनाएँ उसे घर बैठेही दिखायी देती थीं, और । उन्हींका वृत्तान्त वह धृतराष्ट्रसे निवेदन कर देता था । श्रीकृष्णने जिस योगका । प्रतिपादन किया, वह कर्मयोग है ( गीता ४. १-३ ), और अर्जुनने पहले उसे । 'योग' (साम्ययोग) कहा है ( गीता ६. ३३); तथा अब इस श्लोकमें संजयभी । श्रीकृष्णार्जुनके संवादको 'योग' ही कहता है। इससे स्पष्ट है, कि श्रीकृष्ण, अर्जुन । और संजय, तीनोंके मतानुसार गीताका प्रतिपाद्य विषय; 'योग' अर्थात् । कर्मयोगही है; और अध्याय-समाप्तिसूचक संकल्पमेंभी वही, अर्थात् योगशास्त्र, । शब्द आया है। परंतु 'योगेश्वर' शब्दमें 'योग' शब्दका अर्थ इससे कहीं अधिक । व्यापक है। योगका साधारण अर्थ कर्म करनेकी युक्ति, कुशलता या शैली है। । इसी अर्थके अनुसार कहा जाता है, कि बहुरूपिया योगसे अर्थात् कुशलतासे अपने । स्वाँग बना जाता है। परंतु जब कर्म करनेकी इन युक्तियोंमें श्रेष्ठ युक्तिको । खोजते हैं, तब कहना पड़ता है, कि परमेश्वर मूलमें अव्यक्त होनेपरभी जिस । युक्तिसे वह अपने आपको व्यक्त स्वरूप देता है, वही युक्ति अथवा योग सबसे । श्रेष्ठ है। इसीको गीतामें 'ईश्वरी योग' (गीता ९. ५; ११. ८) कहा है; । और वेदान्तमें जिसे माया कहते हैं, वहभी यही है ( गीता ७. २५)। यह । अलौकिक अथवा अघटित योग जिसे साध्य हो जाय, उसे अन्य सब युक्तियाँ तो । हाथका मैल है। परमेश्वर इन योगोंका अथवा मायाका अधिपति है, अतएव । उसे योगेश्वर अर्थात् योगोंका स्वामी कहते हैं। 'योगेश्वर' शब्दमे योगका अर्थ । पातंजलयोग नहीं है। ] (७६) हे राजा (धृतराष्ट्र) ! केशव और अर्जुन, दोनोंके इस अद्भुत एवं पुण्य-

८७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ।।१८।। कारक संवादका स्मरण होकर मुझे बार बार हर्ष हो रहा है; (७७) और हे राजा ! श्रीहरिके उस अत्यंत अद्भुत विश्वरूपकीभी बार बार स्मृति होकर मुझे बडा विस्मय होता है, और बार-बार हर्ष होता है। (७८) मेरा मत है, कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है, वहीं श्री, विजय, शाश्वत ऐश्वर्य और नीति है। | [ उक्त सिद्धान्तका सार यह है, कि जहाँ युक्ति और शक्ति, दोनों | एकत्रित होती हैं, वहाँ निश्चयही ऋद्धि-सिद्धि निवास करती हैं, कोरी शक्तिसे | अथवा केवल युक्तिसे सदैव काम नहीं चलता। जब जरासंधका वध करनेके लिये | मंत्रणा हो रही थी, तब युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा है, कि "अन्धं बलं जडं | प्राहुः प्रणेतव्यं विचक्षणैः" (मभा. सभा. २०. १६) - बल अन्धा और जड़ है, | बुद्धिमानोंको चाहिये, कि उसे मार्ग दिखलावें; तथा श्रीकृष्णनेभी यह कह कर, कि | "मयि नीतिर्बलं भीमे" (सभा. २०. ३) - मुझमें नीति है और भीमसेनके | शरीरमें बल है; भीमसेनको साथ लेकर उसके द्वारा जरासंधका वध युक्तिसे | कराया है। केवल नीति बतलानेवालेको आधा चतुर समझना चाहिये। अर्थात् | इस श्लोकमें योगेश्वरका अर्थ योग या युक्तिके ईश्वर है और धनुर्धरका योद्धा, | और यहाँ ये दोनों विशेषण हेतुपूर्वक दिये गये हैं।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए- अर्थात् कहे हुए- उपनिषद्में, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग-अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवां अध्याय समाप्त हुआ। | [ ध्यान रहे, कि "मोक्ष-संन्यासयोग 'शब्दमें' 'संन्यास' " शब्दका अर्थ | 'काम्य कर्मोंका संन्यास' है, जैसा कि इस अध्यायके आरंभमें कहा गया है, | यहाँ चतुर्थ आश्रमरूपी संन्यास विवक्षित नहीं है। इस अध्यायमें प्रतिपादन | किया गया है, कि स्वकर्मको न छोड़ कर उसे परमेश्वरमें मनसे संन्यास अर्थात्

अठारहवाँ अध्याय ८७७ । समर्पित कर देनेसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है, अतएव इस अध्यायका मोक्ष- । संन्यासयोग नाम रखा गया है । ] इस प्रकार बाल गंगाधर तिलककृत श्रीमद्भगवद्गीताका रहस्य-संजीवन नामक प्राकृत अनुवाद टिप्पणीसहित समाप्त हुआ । गंगाधर-पुत्र, पूना-वासी, महाराष्ट्र विप्र, वैदिक तिलक बाल बुध ते विधीयमान । 'गीतारहस्य' किया धीश को समर्पित यह, तौर कौल योग भूमि शकमें सुयोग जान । ॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु ॥ ॥ शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ॥

गीताके श्लोकोंकी सूचि श्लोकारम्भः अ० श्लो० पृ० श्लोकारम्भः अ० श्लो० पृ० ॐ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष १२ १६ ७९८ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ८ १३ ७४७ अनादित्वान्निर्गुणत्वात् १३ ३१ ८१२ ॐ तत्सदिति निर्देशो १७ २३ ८४७ अनादिमध्यान्तमनन्त ११ १९ ७८३ अ अनाश्रितः कर्मफल ६ १ ७०७ अकीर्तिं चापि भूतानि २ ३४ ६३३ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च १८ १२ ८५४ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः ८ २४ ७५१ अनुद्वेगकरं वाक्यं १७ १५ ८४३ अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयं २ २४ ६३० अनुबन्धं क्षयं हिंसां १८ २५ ८५९ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा ४ ६ ६७९ अनेकचित्तविभ्रान्ता १६ १६ ८३६ अत्र शूरा महेष्वासा १ ४ ६१० अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं ११ १६ ७८३ अथ केन प्रयुक्तोऽयं ३ ३६ ६७३ अनेकवक्त्रनयनम् ११ १० ७८२ अथ चित्तं समाधातुं १२ ९ ७९५ अन्तकाले च मामेव ८ ५ ७४५ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं २ ३३ ६३३ अन्तवत्तु फलं तेषां ७ २३ ७३७ अथ चैनं नित्यजातं २ २६ ६३० अन्तवन्त इमे देहाः २ १८ ६२८ अथवा बहुनैतेन १० ४२ ७७८ अन्नाद्भवन्ति भूतानि ३ १४ ६६१ अथवा योगिनामेव ६ ४२ ७२३ अन्ये च बहवः शूरा १ ९ ६११ अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा १ २० ६१४ अन्ये त्वेवमजानन्तः १३ २५ ८१० अथैतदप्यशक्तोऽसि १२ ११ ७९५ अपरे नियताहाराः ४ ३० ६९१ अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि ११ ४५ ७८९ अपरयमितस्त्वन्यां ७ ५ ७३१ अदेशकाले यद्दानं १७ २२ ८४४ अपरं भवतो जन्म ४ ४ ६७८ अद्वेष्टा सर्वभूतानां १२ १३ ७९८ अपर्याप्तं तदस्माकं १ १० ६११ अधर्मं धर्ममिति या १८ ३२ ८६१ अपाने जुह्वति प्राणं ४ २९ ६९० अधर्माभिभवात्कृष्ण १ ४१ ६१९ अपि चेत्सुदुराचारो ९ ३० ७६३ अधश्चोर्ध्वं प्रसृताः १५ २ ८२३ अपि चेदसि पापेभ्यः ४ ३६ ६९४ अधिभूतं क्षरो भावः ८ ४ ७४३ अप्रकाशो प्रवृत्तिश्च १४ १३ ८१६ अधियज्ञः कथं कोऽत्र ८ २ ७४३ अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो १७ ११ ८४२ अधिष्ठानं तथा कर्ता १८ ३४ ८६१ अभयं सत्वसंशुद्धिः १६ १ ८३१ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं १३ ११ ८०५ अभिसन्धाय तु फलं १७ १२ ८४३ अध्येष्यते च य इमं १८ ७० ८७३ अभ्यासयोगयुक्तेन ८ ८ ७४६ अनन्तविजयं राजा १ १६ ६१४ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि १२ १० ७९५ अनन्तश्चास्मि नागानां १० २९ ७७६ अमानित्वमदम्भित्व १३ ७ ८०४

गीताके श्लोकोंकी सूची ८७९ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य ११ २६ ७८५ अहिंसा समता तुष्टिः १० ५ ७६८ अमी हि त्वां सुरसंघा ११ २१ ७७४ अहो बत महत्पापं १ ४५ ६१९ अयतिः श्रद्धयोपेतः ६ ३७ ७२२ अक्षराणामकारोऽस्मि १० ३३ ७७७ अयनेषु च सर्वेषु १ ११ ६१२ अक्षरं ब्रह्म परमं ८ ३ ७४३ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः १८ २८ ८६० अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च ४ ४० ६९५ अवजानन्ति मां मूढाः ९ ११ ७५६ आ अवाच्यवादांश्च बहून् २ ३६ ६३४ आख्याहि मे को भवान् ११ ३१ ७८५ अविनाशि तु तद्विद्धि २ १७ ६२८ आचार्याः पितरः पुत्राः १ ३४ ६१७ अविभक्तं च भूतेषु १३ १६ ८०६ आढ्योऽभिजनवानस्मि १६ १५ ८३६ अव्यक्तादीनि भूतानि २ २८ ६३१ आत्मसम्भाविताः १६ १७ ८३६ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः ८ १८ ७४९ आत्मौपम्येन सर्वत्र ६ ३२ ७२० अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयं २ २५ ६३० आदित्यानामहं विष्णुः १० २१ ७७४ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः ८ २१ ७५० आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं २ ७० ६५० अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं ७ २४ ७३८ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः ८ १६ ७४८ अशास्त्रविहितं घोरं १७ ५ ८४१ आयुधानामहं वज्रं १० २८ ७७६ अशोच्यानन्वशोचस्त्वं २ ११ ६२४ आयुः सत्त्वबलारोग्य १७ ८ ८४२ अश्रद्दधानाः पुरुषाः ९ ३ ७५४ आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं ६ ३ ७०८ अश्रद्धया हुतं दत्तं १७ २८ ८४७ आवृतं ज्ञानमेतेन ३ ३९ ६७४ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां १० २६ ७७५ आशापाशशतैर्बद्धाः १६ १२ ८३६ असक्तबुद्धिः सर्वत्र १८ ४९ ८६६ आश्चर्यवत्पश्यति २ २९ ६३१ असक्तिरनभिष्वङ्गः १३ ९ ८०५ आसुरीं योनिमापन्ना १६ २० ८३७ असत्यमप्रतिष्ठं ते १६ ८ ८३३ आहारस्त्वपि सर्वस्य १७ ७ ८४२ असौ मया हतः शत्रुः १६ १४ ८३६ आहुस्त्वामृषयः सर्वे १० १३ ७७२ असंयतात्मना योगः ६ ३६ ७२१ इ असंशयं महाबाहो ६ ३५ ७२१ इच्छाद्वेषसमुत्थेन ७ २७ ७३९ अस्माकं तु विशिष्टा ये १ ७ ६११ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं १३ ६ ८०३ अहमात्मा गुडाकेश १० २० ७७४ इति गुह्यतमं शास्त्रं १५ २० ८३० अहंकारं बलं दर्पं १६ १८ ८३७ इति ते ज्ञानमाख्यातं १८ ६३ ८७१ अहंकारं बलं दर्पं १८ ५३ ८६८ इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं १३ १८ ८०८ अहं क्रतुरहं यज्ञः ९ १६ ७५७ इत्यर्जुनं वासुदेवः ११ ५० ७९० अहं वैश्वानरो भूत्वा १५ १४ ८२८ इत्यहं वासुदेवस्य १८ ७४ ८७५ अहं सर्वस्य प्रभवः १० ८ ७७१ इदमद्य मया लब्धं १६ १३ ८३६ अहं हि सर्वयज्ञानां ९ २४ ७६० इदं तु ते गुह्यतमं ९ १ ७५३ अहिंसा सत्यमक्रोधः १६ २ ८३१ इदं ते नातपस्काय १८ ६७ ८७३

८८०    गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इदं शरीरं कौन्तेय  १३ १ ८०१  एतां दृष्टिमवष्टभ्य  १६ ९ ८३५ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य  १४ २ ८१४  एतां विभूति योगं च  १० ७ ७७१ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे  ३ ३४ ६७१  एतैर्विमुक्तः कौन्तेय  १६ २२ ८३७ इन्द्रियाणां हि चरतां  २ ६७ ६४९  एवमुक्तो हृषीकेशो  १ २४ ६१५ इन्द्रियाणि पराण्याहुः  ३ ४२ ६७४  एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये  १ ४७ ६२० इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः  ३ ४० ६७४  एवमुक्त्वा ततो राजन्  ११ ९ ७८२ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं  १३ ८ ८०४  एवमुक्त्वा हृषीकेशं  २ ९ ६२३ इमं विवस्वते योगं  ४ १ ६७६  एवमेतद्यथात्थ त्वं  ११ ३ ७८० इष्टान्भोगान्हि वो  ३ १२ ६६०  एवं परंपराप्राप्तं  ४ २ ६७६ इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं  ११ ७ ७८१  एवं प्रवर्तितं चक्रं  ३ १६ ६६२ इहैव तैर्जितः सर्गः  ५ १९ ७०३  एवं बहुविधा यज्ञाः  ४ ३२ ६९२ ई            एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा  ३ ४३ ६७४ ईश्वरः सर्वभूतानां  १८ ६१ ८७०  एवं सततयुक्ता ये  १२ १ ७९३ उ            एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म  ४ १५ ६८२ उच्चैःश्रवसमश्वानां  १० २७ ७७६  एषा तेऽभिहिता सांख्ये  २ ३९ ६३५ उत्क्रामन्तं स्थितं वापि  १५ १० ८२७  एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ  २ ७२ ६५१ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः  १५ १७ ८२९      क उत्सन्नकुलधर्माणां  १ ४४ ६१९  कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ  १८ ७२ ८७४ उत्सीदेयुरिमे लोकाः  ३ २४ ६६८  कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः  ६ ३८ ७२२ उदाराः सर्व एवैते  ७ १८ ७३५  कट्वम्ललवणात्युष्ण  १७ ९ ८४२ उदासीनवदासीनः  १४ २३ ८१८  कथं न ज्ञेयमस्माभिः  १ ३९ ७१८ उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं  ६ ५ ७११  कथं भीष्ममहं संख्ये  २ ४ ६२१ उपद्रष्टानुमन्ता च  १३ २२ ८१०  कथं विद्यामहं योगिन्  १० १७ ७७३ ऊ            कर्मजं बुद्धियुक्ता हि  २ ५१ ६४४ ऊर्ध्वमूलमधःशाखं  १५ १ ८२१  कर्मणः सुकृतस्याहुः  १४ १६ ८१७ ऊर्ध्वगच्छन्ति सत्त्वस्थाः  १४ १८ ८१७  कर्मणैव हि संसिद्धि  ३ २० ६६६ ऋ            कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं  ४ १७ ६८३ ऋषिभिर्बहुधा गीतं  १३ ४ ८०३  कर्मण्यकर्म यः पश्येत्  ४ १७ ६८३ ए            कर्मण्येवाधिकारस्ते  २ ४७ ६४१ एतच्छ्रुत्वा वचनं  ११ ३५ ७८६  कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि  ३ १५ ६६२ एतद्योनीनि भूतानि  ७ ६ ७३१  कर्मेन्द्रियाणि संयम्य  ३ ६ ६५६ एतन्मे संशयं कृष्ण  ६ ३९ ७२२  कर्षयन्तः शरीरस्थं  १७ ६ ८४१ एतान्न हन्तुमिच्छामि  १ ३५ ६१७  कविं पुराणमनुशासितारं  ८ ९ ७४७ एतान्यपि तु कर्माणि  १८ ६ ८५२  कस्माच्च ते न नमेरन्  ११ ३७ ७८७

गीताके श्लोकोंकी सूचि ८८१ काम एष क्रोध एष ३ ३७ ६५३ च कामक्रोधवियुक्तानां ५ २६ ७०५ चतुर्विधा भजन्ते मां ७ १६ ७३४ काममाश्रित्य दुष्पूरं १६ १० ८३५ चञ्चलं हि मनः कृष्ण ६ ३४ ७२० कामात्मानः स्वर्गपरा २ ४३ ६३७ चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं ४ १३ ६८२ कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः ७ २० ७३६ चिन्तामपरिमेयां च १६ ११ ८३६ काम्यानां कर्मणां न्यासं १८ २ ८५० चेतसा सर्वकर्माणि १८ ५७ ८७० कायेन मनसा बुद्ध्या ५ ११ ७०१ कार्पण्यदोषोपहत २ ७ ६२२ ज कार्यकारणकर्तृत्वे १३ २० ८०९ जन्म कर्म च मे दिव्यं ४ ९ ६८० कार्यमित्येव यत्कर्म १८ ९ ८५३ जरामरणमोक्षाय ७ २९ ७३९ कालोऽस्मि लोकक्षय ११ ३२ ७८६ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः २ २७ ६३० काश्यश्च परमेष्वासः १ १७ ६१४ जितात्मनः प्रशान्तस्य ६ ७ ७१२ काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धि ४ १२ ६८१ ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ३ १ ६५३ किरीटिनं गदिनं चक्र० ११ ४६ ७८९ ज्योतिषामपि तज्ज्योति. १३ १७ ८०७ किरीटिनं गदिनं चक्रिणं ११ १७ ७८३ किं कर्म किमकर्मेति ४ १६ ६८३ त किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं ८ १ ७४३ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य १८ ७७ ८७६ किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या ९ ३३ ७६४ ततः पदं तत्परिमार्गि० १५ ४ ८२४ कुतस्त्वा कश्मलमिदं २ २ ६२१ ततः शंखाश्च भेर्य्यश्च १ १३ ६१३ कुलक्षये प्रणश्यन्ति १ ४० ६१८ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते १ १४ ६१३ कृपया परयाविष्टो १ २८ ६१६ ततः स विस्मयाविष्टो ११ १४ ७८२ कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं १८ ४४ ८६५ तत्र तं बुद्धिसंयोगं ६ ४३ ७२३ कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतान् १४ २१ ८१८ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् १४ ६ ८१५ क्रोधाद्भवति संमोहः २ ६३ ६४८ तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः १ २६ ६१६ क्लेशोऽधिकतरस्तेषां १२ ५ ७९४ तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं ११ १३ ७८२ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ २ ३ ६२१ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा ६ १२ ७१४ तत्रैव मति कर्तारं १८ १६ ८५५ ग तत्त्वविन्तु महाबाहो ३ २८ ६३० तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च १३ ३ ८०० गतसंगस्य मुक्तस्य ४ २३ ६८७ तदित्यनभिसन्धाय १७ २५ ८८६ गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी ९ १८ ७५८ तद्बुद्धयस्तदात्मानः ५ १७ ७०३ गाण्डीवं संस्रते हस्तात् १ ३० ६१६ तद्बुद्ध्यस्तदात्मानः ५ १७ ७०३ गामाविश्य च भूतानि १५ १३ ८२८ तद्विद्धि प्रणिपातेन ४ ३४ ६९३ गुणानेतानतीत्य त्रीन् १४ २० ८१८ तपस्विभ्योऽधिको योगी ६ ४६ ७२४ गुरून्हत्वा हि महानु० २ ५ ६२२ तपाम्यहमहं वर्ष ९ १९ ७५४ गी. ५६

८८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तमस्त्वज्ञानजं विद्धि १४ ८ ८१५ द तमुवाच हृषीकेशः २ १० ६२३ दण्डो दमयतामस्मि १० ३८ ७७८ तमेव शरणं गच्छ १८ ६२ ८५१ दम्भो दर्पोऽभिमानश्च १६ ४ ८३२ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते १६ २४ ८३८ दंष्ट्राकरालानि च ते ११ २५ ७८५ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय ११ ४४ ७८८ दातव्यमिति यद्दानं १७ २० ८४४ तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ ३ ४१ ६७४ दिवि सूर्यसहस्रस्य ११ १२ ७८२ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो ११ ३३ ७८६ दिव्यमाल्याम्बरधरं ११ ११ ७८२ तस्मात्सर्वेषु कालेषु ८ ७ ७४६ दुःखमित्येव यत्कर्म १८ ८ ८५३ तस्मादसक्तः सततं ३ १९ ६६३ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः २ ५६ ६४५ तस्मादज्ञानसम्भूतं ४ ४२ ६९५ दूरेण ह्यवरं कर्म २ ४९ ६४३ तस्मादोमित्युदाहृत्य १७ २४ ८४६ दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं १ २ ६१० तस्माद्यस्य महाबाहो २ ६८ ६४९ दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं ११ ५१ ७९१ तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं १ ३७ ६१७ देवद्विजगुरुप्राज्ञ १७ १४ ८४३ तस्य संजनयन् हर्षं १ १२ ६१३ देवान्भावयतानेन ३ ११ ६६० तं तथा कृपयाविष्टं २ १ ६२१ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे २ १३ ६२५ तं विद्याद्दुःखसंयोगं ६ २३ ७१३ देही नित्यमवध्योऽयं २ ३० ६३२ तानहं द्विषतः क्रूरान् १६ १९ ८३७ दैवमेवापरे यज्ञं ४ २५ ६८८ तानि सर्वाणि संयम्य २ ६१ ६४७ दैवी सम्पद्विमोक्षाय १६ ५ ८३३ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी १२ १९ ७९८ दैवी ह्येषा गुणमयी ७ १४ ७३४ तेजः क्षमा धृतिः शौचं १६ ३ ८३१ दोषैरेतैः कुलघ्नानां १ ४३ ६१९ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं ९ २१ ७५९ द्यावापृथिव्योरिदं ११ २० ७८३ तेषामहं समुद्धर्ता १२ ७ ७९४ द्यूतं छलयतामस्मि १० ३६ ७७८ तेषामेवानुकम्पार्थं १० ११ ७७१ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा ४ २८ ६९० तेषां सततयुक्तानां १० १० ७७१ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च १ १८ ६१४ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त ७ १७ ७३५ द्रोणं च भीष्मं च ११ ३४ ७८६ त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं ४ २० ६८६ द्वाविमौ पुरुषौ लोके १५ १६ ८२८ त्याज्यं दोषवदित्येके १८ ३ ८५२ द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् १६ ६ ८३३ त्रिभिर्गुणमयैर्भावै ७ १३ ७३३ ध त्रिविधा भवति श्रद्धा १७ २ ८४० धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे १ १ ६०९ त्रिविधं नरकस्येदं १६ २१ ८३७ धूमेनाव्रियते वह्निः ३ ३८ ६७४ त्रैगुण्यविषया वेदाः २ ४५ ६३८ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः ८ २५ ७५१ त्रैविद्या मां सोमपाः पूत ९ २० ७५९ धृत्या यया धारयते १८ ३३ ८६१ त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं ११ १८ ७८३ धृष्टकेतुश्चेकितानः १ ५ ६१० त्वमादिदेवः पुरुषः ११ ३८ ७८७ ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति १३ २४ ८१०