भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 916, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 916

अठारहवाँ अध्याय ८७१ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ यंत्रपर चढ़ाये गये हों । ( ६२ ) इसलिये हे भारत ! तू सर्व भावमे उसीकी शरणमें जा । उसके अनुग्रहसे तुझे परम शांति और नित्यस्थान प्राप्त होगा । ( ६३ ) इस प्रकार मैंने यह गुह्यातिगुह्य ज्ञान तुझमे कहा है । इसका पूर्ण विचार करके जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर । । [ इन श्लोकोंमें कर्म-पराधीनताका जो गूढ़ तत्त्व बतलाया गया है, उसका । विचार गीतारहस्यके १० वें प्रकरणमें विस्तारपूर्वक हो चुका है । यद्यपि आत्मा । स्वयं स्वतंत्र है, तथापि जगत्के अर्थात् प्रकृतिके व्यवहारको देखनेसे मालूम । होता है, कि उस कर्मके चक्रपर आत्माका कुछभी अधिकार नहीं है, कि जो । अनादि कालसे चल रहा हैं । जिनकी हम इच्छा नहीं करते, बल्कि जो हमारी । इच्छाके विपरीतभी है, ऐसी सैकड़ों-हजारों बाते संसारमें हुआ करती हैं; तथा । उनके व्यापारके परिणामभी हमपर होते रहने है, अथवा उक्त व्यापारोंकाही । कुछ भाग हमें करना पड़ता है । यदि इन्कार करते हैं, तो बनता नहीं है । ऐसे । अवसरपर ज्ञानी मनुष्य अपनी बुद्धिको निर्मलकर, और सुख या दुःखको एकसा । समझकर सब कर्म किया करता है, किंतु मूर्ख मनुष्य उनके फन्देमें फँस जाता । है; यही दोनोंके आचरणमें महत्त्वपूर्ण भेद है । भगवानने तीसरेही अध्यायमें । कह दिया है, कि " सभी प्राणी अपनी अपनी प्रकृतिके अनुसार चलते रहते हैं, । वहाँ निग्रह क्या करेगा ?" ( गीता ३. ३३ ) । ऐसी स्थितिमें मोक्षशास्त्र । अथवा नीतिशास्त्र इतनाही उपदेश कर सकता है, कि कर्ममें आसक्ति मत रखो, । इससे अधिक वह कुछ नहीं कह सकता । अध्यात्म-दृष्टिमे यह विचार हुआ; । परंतु भक्तिकी दृष्टिसे प्रकृतिभी तो ईश्वरकाही अंश है, अतः ६१वें और ६२वें । श्लोकमें यही सिद्धान्त ईश्वरको सारा कर्तृत्व सौंप कर बतलाया गया है । जगत्में । जो कुछ व्यवहार हो रहे हैं, उन्हें परमेश्वर जैसे चाहता है, वैसे करवा रहा है । । इसलिये ज्ञानी मनुष्यको उचित है, कि अहंकार-बुद्धि छोड़कर, अपने आपको । सर्वथा परमेश्वरकेही हवालेकर दे । ६३वें श्लोकमें भगवानने कहा है सही, । कि, " जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर " परंतु उसका अर्थ बहुत गंभीर है । ज्ञान । अथवा भक्तिके द्वारा जहाँ बुद्धि साम्यावस्थामें पहुँची, वहाँ फिर बुरी इच्छा । बचनेही नहीं पाती, अतएव ऐसे ज्ञानी पुरुषका 'इच्छा-स्वातन्त्र्य' ( इच्छाकी । स्वाधीनता ) उसे अथवा जगत्को कभी अहितकारक नहीं हो सकता । इसलिये