श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥ § § यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ ( ५७ ) मनसे सब कर्मोंको मुझमें 'संन्यस्य' अर्थात् समर्पण करके मत्परायण होता हुआ ( साम्य ) बुद्धियोगके आश्रयसे हमेशा मुझमें चित्त रख । । [ 'बुद्धियोग' शब्द पहले-दूसरेही अध्यायमें ( २.४९ ) आ चुका है; और । वहाँ उसका अर्थ फलाशामें बुद्धि न रखकर कर्म करनेकी युक्ति अथवा समत्व । बुद्धि है। यही अर्थ यहाँभी विवक्षित है और दूसरे अध्यायमें जो यह सिद्धान्त । बतलाया था, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, उसीका यह उपसंहार है। इसीमें । कर्मसंन्यासका अर्थभी इन शब्दोंके द्वारा व्यक्त किया गया है, कि "मनसे । ( अर्थात् कर्मका प्रत्यक्ष त्याग न करके, केवल बुद्धिसे ) मुझमें सब कर्म सम- । र्पित कर ।" और वही अर्थ पहले गीता ३. २० एवं ५. १३ मेंभी वर्णित है । ] ( ५८ ) मुझमें चित्त रखनेपर तू मेरे अनुग्रहसे सब संकटोंको अर्थात् कर्मके शुभाशुभ फलोंको पार कर जावेगा । परंतु यदि अहंकारके वश होकर मेरी न सुनेगा, तो ( निस्संदेह ) नाश पावेगा । । [ ५८ वें श्लोकके अंतमें अहंकारका जो परिणाम बतलाया है, अब यहाँ । उसीका अधिक स्पष्टीकरण करते हैं :- ] ( ५९ ) तू अहंकारसे जो यह मानता ( कहता ) है, कि मैं युद्ध न करूँगा, तेरा वह निश्चय व्यर्थ है । प्रकृति अर्थात् स्वभाव तुझसे वह ( युद्ध ) करावेगा । ( ६० ) हे कौन्तेय ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बद्ध होनेके कारण, मोहके वश होकर तू जिसे करनेकी इच्छा करता है, पराधीन ( अर्थात् प्रकृतिके अधीन ) हो करके तुझे वही करना पडेगा । ( ६१ ) हे अर्जुन ! सब प्राणियोंके हृदयमें रहकर ईश्वर ( अपनी ) मायासे प्राणिमात्रको ( ऐसे ) घुमा रहा है, मानो सभी ( किसी )