भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 915, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 915

८७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥ § § यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ ( ५७ ) मनसे सब कर्मोंको मुझमें 'संन्यस्य' अर्थात् समर्पण करके मत्परायण होता हुआ ( साम्य ) बुद्धियोगके आश्रयसे हमेशा मुझमें चित्त रख । । [ 'बुद्धियोग' शब्द पहले-दूसरेही अध्यायमें ( २.४९ ) आ चुका है; और । वहाँ उसका अर्थ फलाशामें बुद्धि न रखकर कर्म करनेकी युक्ति अथवा समत्व । बुद्धि है। यही अर्थ यहाँभी विवक्षित है और दूसरे अध्यायमें जो यह सिद्धान्त । बतलाया था, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, उसीका यह उपसंहार है। इसीमें । कर्मसंन्यासका अर्थभी इन शब्दोंके द्वारा व्यक्त किया गया है, कि "मनसे । ( अर्थात् कर्मका प्रत्यक्ष त्याग न करके, केवल बुद्धिसे ) मुझमें सब कर्म सम- । र्पित कर ।" और वही अर्थ पहले गीता ३. २० एवं ५. १३ मेंभी वर्णित है । ] ( ५८ ) मुझमें चित्त रखनेपर तू मेरे अनुग्रहसे सब संकटोंको अर्थात् कर्मके शुभाशुभ फलोंको पार कर जावेगा । परंतु यदि अहंकारके वश होकर मेरी न सुनेगा, तो ( निस्संदेह ) नाश पावेगा । । [ ५८ वें श्लोकके अंतमें अहंकारका जो परिणाम बतलाया है, अब यहाँ । उसीका अधिक स्पष्टीकरण करते हैं :- ] ( ५९ ) तू अहंकारसे जो यह मानता ( कहता ) है, कि मैं युद्ध न करूँगा, तेरा वह निश्चय व्यर्थ है । प्रकृति अर्थात् स्वभाव तुझसे वह ( युद्ध ) करावेगा । ( ६० ) हे कौन्तेय ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बद्ध होनेके कारण, मोहके वश होकर तू जिसे करनेकी इच्छा करता है, पराधीन ( अर्थात् प्रकृतिके अधीन ) हो करके तुझे वही करना पडेगा । ( ६१ ) हे अर्जुन ! सब प्राणियोंके हृदयमें रहकर ईश्वर ( अपनी ) मायासे प्राणिमात्रको ( ऐसे ) घुमा रहा है, मानो सभी ( किसी )