भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 914

अठारहवाँ अध्याय ८६९ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ है; ( ५६ ) और मेराही आश्रयकर, सब कर्म सदैव करते रहनेपरभी उसे मेरे अनुग्रहसे शाश्वत एवं अव्यय स्थान प्राप्त होता है । [ ध्यान रहे, कि सिद्धावस्थाका उक्त वर्णन कर्मयोगियोंका है, कर्मसंन्यास करनेवाले पुरुषोंका नहीं। आरंभमेंही, ४७ वें और ४९ वें श्लोकमें कहा है, कि उक्त वर्णन आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवालोंका है, तथा अंतके ५६ वें श्लोकमें “सब कर्म करते रहनेपरभी” शब्द आये हैं। उक्त वर्णन भक्तोंके अथवा त्रिगुणातीतोंके वर्णनके समानही है। यहाँतक कि, कुछ शब्दभी उसी वर्णनमे लिये गये हैं। उदाहरणार्थ, ५३ वें श्लोकका 'परिग्रह' शब्द छठे अध्यायमें ( ६. १० ) योगीके वर्णनमें आया है; ५४ वें श्लोक 'न शोचति न कांक्षति' पद बारहवें अध्यायके ( १२. १७ ) भक्ति-मार्गके वर्णनमें हैं; और 'विविक्त' अर्थात् “चुने हुए 'एकान्त' स्थलमें रहना” शब्द १३ वे अध्यायके १०वें श्लोकमें आ चुका है। कर्मयोगीको प्राप्त होनेवाली उपर्युक्त अंतिम स्थिति और कर्म- संन्यास-मार्गसे प्राप्त होनेवाली अंतिम स्थिति, दोनों केवल मानसिक दृष्टिसे एकही हैं, इसीसे संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंको यह कहनेका अवसर मिल गया है, कि उक्त वर्णन हमारेही मार्गके हैं। परंतु हम कई बार कह चुके हैं, कि यह सच्चा अर्थ नहीं है। अस्तुः, इस अध्यायके आरंभमें प्रतिपादन किया गया है, कि संन्यासका अर्थ कर्मत्याग नहीं है, किंतु फलशाके त्यागकोही संन्यास कहते हैं। जब संन्यास शब्दका इस प्रकार अर्थ हो चुका, तब यह सिद्ध है, कि यज्ञ, दान आदि कर्म चाहे काम्य हों, चाहे नित्य हों या नैमित्तिक, उनको अन्य सब कर्मोंके समानही फलाशा छोड़कर उत्साह और समतासे करते जाना चाहिये। तदनंतर संसारके कर्म, कर्ता, बुद्धि आदि संपूर्ण विषयोंकी गुणभेदसे अनेकता दिखलाकर उनमें सात्त्विकको श्रेष्ठ कहा है; और गीताशास्त्रका यह इत्यर्थ बतलाया है, कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके द्वारा स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले समस्त कर्मोंको आसक्ति छोड़कर करने जानाही परमेश्वरका यजन-पूजन करना है; एवं इसीसे अंतमें क्रमशः परब्रह्म अथवा मोक्षकी प्राप्ति होती है; मोक्षके लिये कोई दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है, अथवा कर्मत्यागरूपी संन्यासभी लेनेकी ज़रूरत नहीं है, केवल इस कर्मयोगसेही मोक्षसहित सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। अब इसी कर्मयोग-मार्गको स्वीकारकर लेनेके लिये अर्जुनको फिर एक बार अंतिम उपदेश करते हैं:- ]