भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 913, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 913

८६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥ बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥ । बुद्धिसे अपना अपना व्यवसाय करनेवालोंकोभी मिलती है । भागवतधर्मका । जो कुछ रहस्य है, वह यहीं है; तथा महाराष्ट्रके साधू-संतोंके इतिहाससे स्पष्ट । होता है, कि उक्त रीतिसे आचरण करके निष्काम बुद्धिके तत्त्वको अमलमें । लाना कुछ असंभव नहीं है (गीतार. प्र. १३, पृ. ४४२), अब बतलाते हैं, कि, । अपने अपने कर्मोंमें तत्पर रहनेसेही अंतमें मोक्ष कैसे प्राप्त होता है :- ] (५०) हे कौन्तेय ! (इस प्रकार) सिद्धि प्राप्त होनेपर (इस पुरुषको) ज्ञानकी परम निष्ठा, अर्थात् ब्रह्म जिस रीतिसे प्राप्त होता है, उसका मैं संक्षेपसे वर्णन करता-हूँ, सुन । (५१) शुद्ध बुद्धिसे युक्त हो करके, धैर्यसे आत्मसंयमन कर, शब्द आदि (इंद्रियोंके) विषयोंको छोड़करके, और प्रीति एवं द्वेषको दूरकर, (५२) 'विविक्त' अर्थात् चुने हुए अथवा एकांत स्थलमें रहनेवाला, मिताहारी, काया-वाचा और मनको वशमें रखनेवाला, नित्य ध्यानयुक्त और विरक्त, (५३) (तथा) अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह अर्थात् पाशको छोड़कर शांत एवं ममतासे रहित, (मनुष्य) ब्रह्मभूत होनेके लिये समर्थ होता है। (५४) ब्रह्मभूत हो जानेपर प्रसन्नचित्त हो कर वह न किसीकी आकांक्षा करता है, और न किसीका द्वेषभी; तथा समस्त प्राणीमात्रमें सम होकर मेरी परम भक्तिको प्राप्त कर लेता है। (५५) भक्तिसे उसको मेरा तात्त्विक ज्ञान हो जाता है, कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ; इस प्रकार मेरी तात्त्विक पहचान हो जानेपर वह मुझमेंही प्रवेश करता