श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ८६७
निष्काम बुद्धिसे चलनेपर (कर्मफलके) संन्यास-द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त हो जाती है। [इस उपसंहारात्मक अध्यायमें पहले बतलाये हुए उन्हीं विचारोंको अब फिरसे व्यक्त कर दिखलाया गया है, कि पराये धर्मकी अपेक्षा स्वधर्म भला है (गीता ३. ३५), और नैष्कर्म्य-सिद्धि पानेके लिये कर्म छोड़नेकी आवश्य- कता नहीं है (गीता ३. ४), इत्यादि। हम गीताके तीसरे अध्यायके चौथे श्लोककी टिप्पणीमें ऐसे प्रश्नोंका स्पष्टीकरण कर चुके हैं, कि नैष्कर्म्य क्या है और सच्ची नैष्कर्म्य-सिद्धि किसे कहना चाहिये। उक्त सिद्धान्तकी महत्ता इस बातपर ध्यान दिये रहनेसे सहजही समझमें आ जावेगी, कि संन्यास-मार्गवालोंकी दृष्टि केवल मोक्षपरही रहती है, और भगवान्की दृष्टि मोक्ष एवं लोकसंग्रह, दोनोंपरभी समानही है। लोकसंग्रहके लिये अर्थात् समाजके धारण और पोषणके निमित्त ज्ञान-विज्ञानयुक्त पुरुष, अथवा रणमें तलवारका जौहर दिखलानेवाले शूर क्षत्रिय, तथा किसान, वैश्य, रोजगारी, लुहार, बढ़ई, कुम्हार और मांस- विक्रेता व्याधतककीभी आवश्यकता है। परंतु यदि कहा जाय, कि कर्म छोड़े बिना मोक्ष नहीं मिलता, तो इन सब लोगोंको अपना अपना व्यवसाय छोड़कर संन्यासी बन जाना चाहिये! कर्मसंन्यास-मार्गके लोग इस बातकी परवाह नहीं करते, परंतु गीताकी दृष्टि इतनी संकुचित नहीं है। इसलिये गीता कहती है, कि अपने अधिकारके अनुसार प्राप्त हुए व्यवसायको छोड़कर, दूसरेके व्यवसायको भला समझकर, करने लगना उचित नहीं है। कोईभी व्यवसाय लीजिये। उसमें कुछ-न-कुछ त्रुटि अवश्य रहतीही है। जैसे ब्राह्मणके लिये विशेषतः विहित जो क्षान्ति है (गीता १८. ४२), उसमेंभी एक बड़ा दोष यह है, कि "क्षमावान् पुरुष दुर्बल समझा जाता है' (मभा. शां. १६०. ३४); और व्याधके पेशेमें मांस बेचनाभी एक झंझटही है (मभा. वन. २०६)। परंतु कठिनाइयोंसे उकताकर इन कर्मोंकोही छोड़ बैठना उचित नहीं है। किसीभी कारणसे क्यों न हो, जब एक बार, किसी कर्मको अपना लिया, तो फिर उसकी कठिनाई या अप्रियताकी परवाह न करके, उसे आसक्ति छोड़कर रहनाही चाहिये। क्योंकि मनुष्यकी लघुता-महत्ता उसके व्यवसायपर निर्भर नहीं है, किंतु जिस बुद्धिसे वह अपना व्यवसाय या कर्म करता है, उसी बुद्धिपर उसकी योग्यता अध्यात्मदृष्टिसे अवलंबित रहती है (गीता २. ४९)। जिसका मन शांत है, और जिसने सब प्राणियोंके अंतर्गत एकताको पहचान लिया है, वह मनुष्य जाति या व्यवसायसे चाहे व्यापारी हो, चाहे कसाई; निष्काम बुद्धिसे उक्त व्यवसाय करनेवाला वह मनुष्य स्नानसंध्याशील ब्राह्मण अथवा शूर क्षत्रियकी बराबरीका माननीय और मोक्षका अधिकारी है। यही नहीं, वरन् ४९ वें श्लोकमें स्पष्ट कहा है, कि कर्म छोड़नेसे जो सिद्धि प्राप्त की जाती है, वही निष्काम