भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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८६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥ § § श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ तत्पर रहनेसे सिद्धि कैसे मिलती है (४६) प्राणिमात्रकी जिसमे प्रवृत्ति हुई है और जिसने इस सारे जगतका विस्तार किया है अथवा जिससे यह सब जगत व्याप्त है, उसकी अपने ( स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले ) कर्मोके द्वारा ( केवल वाणी अथवा फूलोंसे नहीं ) पूजा करनेसेही मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है । | [ इस प्रकार प्रतिपादन किया गया, कि चातुर्वर्ण्यके अनुसार प्राप्त होने- | वाले कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे अथवा परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करनाही विराट्- | स्वरूपी परमेश्वरका एक प्रकारका यजन-पूजनही है, तथा उसीसे सिद्धि मिल | जाती है ( गीतार. प्र. १३, पृ. ४३९-४४० ) । अब उक्त गुण-कर्म-भेदानुसार | मनुष्यको स्वभावतःही प्राप्त होनेवाला कर्तव्य किसी दूसरी दृष्टिसे कदाचित् | सदोष, अश्लाघ्य, कठिन अथवा अप्रियभी हो सकता है ( उदाहरणार्थ, इस | अवसरपर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करनेमें हत्या होनेके कारण वह सदोष | दिखायी देगा, तो ऐसे समयपर मनुष्यको क्या करना चाहिये ? क्या वह स्वधर्म | छोड़कर अन्य धर्म स्वीकार कर ले ( गीता ३. ३५ ), या कुछभी हो, स्वकर्मकोही | करता जावें, और यदि स्वकर्मही करना चाहिये, तो कैसे करे ? - इत्यादि | प्रश्नोंका उत्तर उसी न्यायके अनुरोधसे बतलाया जाता है, कि जो इस अध्यायके | आरंभके ( १८. ६ ) यज्ञयाग आदि कर्मोंके संबंधमें कहा गया है :- ] ( ४७ ) यद्यपि परधर्मका आचरण सहज हो, तोभी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्यविहित कर्म, विगुण याने सदोष होनेपरभी अधिक कल्याण- कारक है; स्वभावसिद्ध अर्थात् गुणस्वभावानुसार निर्मित चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था द्वारा नियत किया हुआ अपना कर्म करनेमें कोई पाप नहीं लगता । ( ४८) हे कौन्तेय ! जो कर्म सहज है, अर्थात् जन्मसेही गुण-कर्म-विभागानुसार नियत हो गया है, वह सदोष हो, तोभी उसे ( कभी ) न छोड़ना चाहिये । क्योंकि संपूर्ण आरंभ अर्थात् उद्योग ( किसी न किसी ) दोषसे वैसेही व्याप्त रहते हैं, जैसे कि धुएँसे आग घिरी रहती है । ( ४९ ) . ( अतएव ) कहींभी आसक्ति न रखकर, मनको वशमें करके

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