भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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अठारहवाँ अध्याय ८६५ शमो दमस्तपःशौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ § § स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ जन्य अर्थात् प्रकृतिसिद्ध गुणोंके अनुसार पृथक् वंटे हुए हैं। (४२) ब्राह्मणका स्वभावजन्य कर्म शम, दम, तप, पवित्रता, क्षान्ति, सरलता (आर्जव), ज्ञान अर्थात् अध्यात्मज्ञान, विज्ञान याने विविध ज्ञान और आस्तिक्य-बुद्धि है। (४३) शूरता, तेजस्विता, धैर्य, दक्षता, युद्धसे न भागना, दान देना और (प्रजापर) शासन करना क्षत्रियका स्वाभाविक कर्म है। (४४) कृषि अर्थात् खेती, गोरक्षा याने पशुओंको पालनेका उद्यम, और वाणिज्य अर्थात् व्यापार वैश्यका स्वभावजन्य कर्म है; और इसी प्रकार, सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है। | [ यह न समझा जाय, कि यह उपपत्ति गीतामेंही पहले बतलायी गयी है, | कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था स्वभावजन्य गुणभेदसे निर्मित हुई है; किंतु महाभारतके | वनपर्वान्तर्गत नहुष-युधिष्ठिर-संवादमें और द्विज-व्याध-संवादमें (वन. १८०, | २११), शांतिपर्वके भृगु-भारद्वाज-संवादमें (शां. १८८), अनुशासनपर्वके | उमा-महेश्वर-संवादमें (अनु. १४३), और अश्वमेधपर्वकी (अश्व. ३९. ११) | अनुगीतामें गुणभेदकी यही उपपत्ति कुछ अंतरसे पायी जाती है। यह पहलेही | कहा जा चुका है, कि जगतके विविध व्यवहार प्रकृतिके गुणभेदसे हो रहे हैं, और | फिर सिद्ध किया गया है, कि जिस चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थासे, यह नियत किया जाता | है, कि किसे क्या करना चाहिये, वह व्यवस्थाभी प्रकृतिके गुणभेदका परिणाम | है। अब यह प्रतिपादन करते हैं, कि उक्त कर्म हरएक मनुष्यको निष्काम बुद्धिसे | अर्थात् परमेश्वरार्पण-बुद्धिसेही करने चाहिये, अन्यथा जगतका कारोबार नहीं | चल सकता; तथा मनुष्यके इस प्रकारके आचरणसेही सिद्धि प्राप्त हो जाती है, | सिद्धि पानेके लिये और कोई दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है :- ] (४५) अपने अपने (स्वभावजन्य गुणोंके अनुसार प्राप्त होनेवाले) कर्मोंमें नित्य रत (रहनेवाला) पुरुष (उसीसे) परम सिद्धि पाता है। सुन, अपने कर्मोंमें गी. र. ५५